Izzat insan ki nahi paison ki hoti hai

 कामिनी अपने पापा की लाड़ली बेटी थी ,उन्होंने उसे बड़े प्यार से पाला था। कामिनी भी, अपने परिवार से बहुत प्रेम करती थी। कामिनी के समय में, उसके पापा का व्यापार ज्यादा अच्छा नहीं चल रहा था। जब कामिनी थोड़ी बड़ी और समझदार हुई,तब उसे अपने घर की परिस्थितियों का एहसास हुआ। तब उसने  अपने पापा का हाथ बंटाने के लिए ,वह कम उम्र में ही नौकरी करने  लगी। पढ़ाई भी करती और नौकरी भी। घर में माँ के काम में हाथ बंटाती और माँ को भी समझाती रहती- मम्मी ! परेशान होने की आवश्यकता नहीं है। कुछ दिनों पश्चात हमारे भाई भी पढ़ -लिखकर क़ाबिल हो जायेंगे और पापा का सहारा बनेंगे। 


कामिनी के इन शब्दों से, उसकी मम्मी को बहुत बल बना मिलता और जीवन में आगे बढ़ने का  प्रोत्साहन मिलता। एक अच्छी उम्मीद के साथ, वे लोग आगे बढ़ रहे थे। कामिनी की छोटी बहन भी, अब नौकरी करने लगी थी। जहां एक- दो इंसान कमा रहे थे वहां पर अब तीन लोग कमाने लगे थे। अपनी पढ़ाई तो ठीक से नहीं हो पाई किन्तु वे भाई को पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करतीं, ताकि वह उन्नति करें और घर - परिवार अच्छे से चलता रहे। 

भाई भी नौकरी करना चाहता था ताकि उस घर को चलाने में अपना सहयोग दे सके किंतु बहन ने मना कर दिया, कि छोटी-मोटी नौकरी तेरे लिए नहीं है, तुझे कुछ बड़ा करना है और तरक्की करनी है, इसीलिए उसे कोई नौकरी नहीं करने दी।

 कुछ वर्षों पश्चात कामिनी के लिए रिश्ता आया था लेकिन पिता के पास देने के लिए दहेज नहीं था। कामिनी के पिता परेशान थे ,तब कामिनी ने लड़के वालों से स्पष्ट कह दिया था, कि यदि आपको मैं पसंद हूं ,ये मेरे लिए सौभाग्य की बात है किन्तु मेरे पिता के पास आपको देने के लिए' दहेज' नहीं है ।

 कामिनी की शिक्षा, कामिनी के परिश्रम,और उसके शील स्वभाव को वे देख चुके थे इसलिए उन्होंने बिना दहेज के ही कामिनी से अपने बेटे का विवाह कर दिया।उन्होंने कहा -हमें कामिनी जैसी सुंदर ,सुगढ़ बेटी मिल रही है ,हमें और कुछ नहीं चाहिए। 

 वे लोग भी ज्यादा अमीर तो नहीं थे किंतु सुख- दुख में, साथ खड़े होना जानते थे। उन्होंने कामिनी के भाईयों की भी बहुत मदद की। धीरे-धीरे कामिनी के परिवार वाले तरक्की करने लगे उसके दोनों भाई भी नौकरी पर लग गए और अच्छा पैसा कमाने लगे। 

कामिनी को तो अभी भी ,वह अपना घर ही लगता था, कामिनी के भाई का विवाह था। कामिनी खुश होते हुए, अपने भाई के विवाह में गई थी, अब उन लोगों को कामिनी अपने स्तर के हिसाब से कम नजर आने लगी थी। वे लोग , उस वक्त को भूल गए, जब कामिनी के ससुराल वालों ने उनका साथ दिया था। उन्होंने अपने बेटे के विवाह में ,खूब दहेज लेकर विवाह किया। कामिनी को इस विषय में कुछ जानकारी नहीं थी।  कामिनी को अब अपने परिवारवालों का व्यवहार बदला हुआ नजर आ रहा था। उन लोगों का व्यवहार देखकर तब कामिनी को एहसास हुआ कि  आज के समय में ''इज्जत इंसान की नहीं, पैसे की होती है'' इन लोगों ने अपनी सोच बदल दी है। 

दूसरी कहानी -  

प्रिया जब अपने भाई के विवाह में आई तो बहुत प्रसन्न थी ,आज उसकी वर्षों की इच्छा जो पूर्ण हो रही थी।कितनी मन्नतें और कितनी बार भगवान से उसने प्रार्थना की थी- कि मेरे भाई पढ़ -लिखकर खूब उन्नति करें। आज उसका यह स्वप्न पूर्ण होने जा रहा है। बड़े अच्छे घर में ,उसके भाई का विवाह तय हुआ है। लड़की भी खूब पढ़ी- लिखी है किंतु प्रिया देख रही थी, जब से वह आई है , तब से सभी के व्यवहार में बहुत परिवर्तन आ गया है। मां अपने ही कार्यों में व्यस्त रहती है,या व्यस्त होने का अभिनय कर रही है।  यदि प्रिया पूछती भी - मम्मी ! मेरी कोई सहायता चाहिए तो मना कर देतीं और चुपचाप अपने कार्यों में व्यस्त रहतीं।  प्रिया ने महसूस किया कि उसकी मम्मी उससे कुछ चीजें  छुपा रही हैं । उन्हें लगता ,ये सब देखकर ,कहीं  प्रिया ये न कहे -''मुझे तो दहेज़ दिया नहीं ,तब भाई के विवाह में दहेज़ क्यों ले रहीं हैं ?''

 भाई के विवाह में आए, सामान को भी उन्होंने उसे नहीं दिखाया।  शायद ,उन्हें लग रहा था -प्रिया यह सब देखेगी तो शायद उसे दुख होगा क्योंकि उसके विवाह में तो उन्होंने 'दहेज' के नाम पर सिर्फ उसे ही उसके ससुराल वालों को सौंप दिया था। प्रिया के ससुराल वाले भी अच्छे थे, उन्होंने प्रिया की सुंदरता और प्रिया के व्यवहार और गुणों को देखकर उससे विवाह किया था। उन्होंने कभी प्रिया को परेशान नहीं किया और न ही कभी दहेज की मांग की। 

किंतु आज जब प्रिया ने अपनी मां को इस तरह उससे, सामान छुपाते हुए, और किसी भी बात में, उससे कोई परामर्श नहीं लिया ,ये सब प्रिया महसूस कर रही थी।  जब उसकी छोटी बहन आई, तब वे लोग बहुत प्रसन्न हुए , क्योंकि उसकी छोटी बहन का एक धनाढ्य परिवार में विवाह हुआ था। काफी महंगे वस्त्र और गहने पहनकर आई थी। उसे देखकर प्रिया भी अत्यंत प्रसन्न हुई लेकिन उसकी छोटी बहन उसे देखकर बोली -आप आज भी वैसी ही हैं, बदली नहीं है, अब तो आपको समय के अनुसार बदलना चाहिए। 

मुझे क्या बदलना है ?'' आदमी की प्रकृति जैसी होती है, वह वैसा ही रहता है ,'' मैं कोई ऋतु नहीं जो बदल जाऊं ''हंसते हुए बोली, किंतु उसकी बहन को तनिक भी हंसी नहीं आई उन सब को लग रहा था , कि जैसे प्रिया, उनके परिवार में ''टाट के पैबंद '' की तरह हो गई है। प्रिया को इस बात का तनिक भी आभास नहीं था कि जो परिवार अब तक इतनी परेशानियों से गुजरा है , जिस परिवार के पास उसका विवाह करने तक का पैसा नहीं था आज वही परिवार, अपने पैसे के दम पर, उसे अपने से अलग समझे बैठा है। ऐसा नहीं कि  प्रिया के पास पैसे की कमी थी किन्तु प्रिया ने हमेशा ज़िंदगी अपने तरीके से जी,कभी दिखावा नहीं किया। 

 धीरे-धीरे प्रिया को आभास होने लगा हो ना हो, अब यहां ''इज्जत इंसान की नहीं, पैसे की होगी।'' इस बात से उसे बहुत धक्का पहुंचा और उसे दुख भी हुआ कि लोग किस तरह, परिस्थितियों के बदलते ही अपनी सोच भी बदल देते हैं ?

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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