Mysterious nights [53]

शिखा को लेकर, दमयंती उसके घर जाती है ,न जाने दमयंती क्या सोचती है ?क्या करना चाहती है ?किन्तु अब हवेली के हालात देखते हुए ,शिखा हवेली वापस नहीं जाना चाहती है, वह अपने माता-पिता से मिलकर एकांत में बात करना चाहती है, उनके साथ कुछ दिन रहना चाहती है किंतु दमयंती ने उसे यह मौका ही नहीं दिया क्योंकि उसके ससुराल वालों ने उसके घर वालों के सामने प्रस्ताव ही कुछ ऐसा रखा था ,गांव वाले और उसके माता-पिता भी, उस बात से इंकार न कर सके और बेटी को, उनके साथ वापस भेज दिया। लौटते समय,शिखा बहुत ही परेशान थी उसकी आंखों में आंसू थे। आज वह समझ नहीं पा रही थी, कि उस समय की बात के लिए उसे पछतावा होना चाहिए या फिर वह ऐसा क्या करें ?जो अपने मन की बात घरवालों से कह सके।  जब उसके माता-पिता उसे रोकना चाहते थे, तो वह रुकना नहीं चाहती थी और आज उसे स्वयं ही भेज रहे हैं।


 शिखा के रुकने की बात को सुनकर दमयंती एकदम से बोल उठी -  अभी नहीं, अभी हमें कुछ महत्वपूर्ण निर्णय लेने होंगे , कहते हुए दमयंती ने उसे न ही सोचने का और न ही बोलने का मौका दिया, और बोली -बहुत देर हो रही है, अब हमें चलना ही होगा। दमयंती के कठोर स्वभाव, और व्यवहार के कारण, किशोरी लाल जी का भी साहस नहीं हुआ कि वह उनसे कुछ देर रुकने के लिए कह सकें। उन्हें भय था ,इतने दिनों पश्चात, बेटी को लेकर, उसकी सास उनके घर आई हैं, उनके लिए तो, यह क्या कम बड़ी बात थी, कि वे यहां तक चल कर आई थीं । हमारे किसी भी व्यवहार से नाराज न हो जाएँ ,यही सोचकर चुप रहे।  

जब वे लोग वापस जा रहे थे, तब शिखा रो रही थी और सोच रही थी - जब उसके माता -पिता रोक  रहे थे ,तो वो जाना चाहती थी ,आज वो रुकना चाहती है , अपने मन का दर्द ,भय सब बाँटना चाहती है,तो अब उसे कोई रोक नहीं रहा है। उस वक़्त वो' तेजस' के प्रेम की आंधी में बही जा रही थी,अब उसे एहसास होने लगा था वो आंधी,उसके जीवन में तबाही लेकर आई थी,वो प्यार नहीं था बल्कि मेरी भावुकता थी।  अब वो अपने घर वापस लौटना चाहती है ,तो लगता है ,उसके लिए अब ये दरवाज़े सदैव के लिए बंद हो गए हैं। उसने वापस आने में  शायद देर कर दी है ,सुबकते हुए नम आँखों से उसने गाड़ी से बाहर अपने से दूर होते परिवार को देखा जो उससे बहुत दूर होता नजर आ रहा था।

आज उसे एहसास हो रहा था ,वो अब पराई हो गयी है। जब पहली बार यहां से गयी थी ,ये एहसास तब भी नहीं हुआ था किन्तु आज लग रहा है।   

 रोती हुई शिखा को देखकर, दमयंती को इस बात पर क्रोध आया, और बोली- हमने क्या तुम्हारे, किसी कार्य में कोई कमी छोड़ी है ? तुम घर में क्या करती हो ,कैसे रहती हो ? कभी भी तुम्हें रोका -टोका नहीं ,फिर यह रोना -धोना किसलिए ? लगता है ,अभी भी तुम्हें उस घर से लगाव नहीं हुआ है।यदि हम तुम्हें वहां छोड़ भी आते, वहां रह कर ही तुम, क्या कर लेतीं ? ठाकुरों के खानदान की बहू का ठप्पा तो तुम पर लग ही गया है। हम तुम्हारे जीवन में बहुत बड़ा परिवर्तन लाने वाले हैं इसीलिए हम तुम्हें, तुम्हारे घर वालों से मिलवाने के लिए लाए थे। दमयंती की यह बात सुनकर, शिखा को आश्चर्य हुआ , मेरे जीवन में कैसा परिवर्तन आने वाला है ? और यही प्रश्न उसने दमयंती से पूछा।

 वह समय आने पर पता चल जाएगा, दमयंती ने जवाब दिया।

अगले दिन अचानक ही, बंदिनी के सामने रंगीन साड़ियां और गहने लाये गए और उससे कहा गया- कि यह सब पहन लीजिए। 

वह सब साज श्रृंगार का सामान देखकर, शिखा आश्चर्यचकित रह गई और बोली -यह सब क्या है ? क्या आप लोग जानते नहीं हैं? कि मैं ''तेजस की विधवा' हूं। 

यह हम जानते हैं, अचानक दमयंती वहां आकर बोली -वह हमारा बेटा था , तुम्हारा विवाह उससे पूर्ण नहीं हुआ था , हम यह भी जानते हैं, तुम 'अधूरी दुल्हन 'बनकर ही रह गई थीं। 'तेजस 'की जो भी छाया तुम पर थी, वह सब गंगा स्नान में, जाकर पूर्ण हो चुकी है। अब तुम नए सिरे से अपने नए जीवन की शुरुआत कर  सकती हो। 

मैं कुछ समझी नहीं, आप कहना क्या चाहती हैं ?

इसमें ना समझने का तो प्रश्न ही नहीं उठता, हमने तुम्हारे घर वालों से भी बात की है , और वह भी इस बात के लिए तैयार है। हमारे चार बेटे हैं, इनमें से तुम किसी को भी अपने वर के रूप में चुन सकती हो।क्या अभी तक तुमने इनमें से किसी को पसंद नहीं किया ? 

दमयंती की बातें सुनकर, शिखा सोच में पड़ गई और सोचने लगी -इनके मन में यह सब चल रहा है , मुझे एक बार भी नहीं बताया, ये मेरे जीवन में कैसा परिवर्तन लाना चाहतीं हैं ?

ज्यादा सोचने की आवश्यकता नहीं है, अब तुम वैधव्य का जीवन नहीं, ब्याहता के रूप में यहां पर रहोगी। अब तुम मुझे बता सकती हो, गर्वित- गौरव और सुमित- पुनीत में से तुम किसे अपने पति के रूप में चुनना चाहोगी। 

शिखा ने सोचा भी नहीं था,वह ऐसा सोच भी कैसे सकती है ?जिस लड़के से उसका विवाह हो रहा था ,अब वह उसको छोड़कर उसके भाइयों के विषय में सोचने लगे। ये कोई व्यापार चल रहा है ,ये तरकारी नहीं मिली, तो दूसरी चुन लो ! यह सब आप क्या कह रही हैं ? मैंने इस विषय में सोचा भी नहीं ,न ही मैं, किसी के विषय में जानती हूं। 

क्यों ? क्या गर्वित और गौरव तुम्हारे पास नहीं आए थे  ?हमने तो सोचा था ,तुमने अब तक निर्णय ले लिया होगा। 

ओह ! तो उनके मन में यह सब चल रहा था, इसीलिए वे लोग, मुझसे मिलने यहां आए थे,इन्होने ही उन्हें भेजा होगा ,इससे पहले तो कभी बात करने का भी प्रयास नहीं किया।  तब वह बोली -जब मैं अपना वर चुनने के लिए स्वतंत्र हूं , तो फिर यह लोग ही क्यों ? इनके लिए तो और भी रिश्ते आ जाएंगे मुझे अभी अपने घर जाना है, कुछ दिन वहां रहकर सोचूंगी कि जीवन में मुझे क्या करना है ? जब मैं अपना वर चुनने के लिए स्वतंत्र हूं तो मैं किसी को भी चुन सकती हूं। 

वही तो कह रही हूं , इन चारों में से ही अब तुम्हें एक को, अपने पति के रूप में चुनना होगा। 

शिखा के जीवन में, दमयंती ये केेसा परिवर्तन लाना चाहती है ?जो उससे स्वयं ही कह रही है -इस वैधव्य आवरण को उतारकर उसे 'सुहागन' बनना है और वो भी उसके अपने अन्य बेटों की ,जो लड़की उसके बेटे की मौत का कारण जिसे समझ रही थी ,और शिखा को भी इसी बात का भय था ,शिखा भी आज तक इसी अपराध बोध में जी रही थी ,आज उसकी सास उससे आकर कह रही है कि वह वर चुनने के लिए स्वतंत्र है आखिर दमयंती क्या चाहती है ?क्या शिखा उनका प्रस्ताव मानेगी या नहीं ?आगे बढ़ते हैं। 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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