Shaitani mann [part 107]

एक दिन ,शिप्रा की सहेली का, उसे वहीँ होटल में फोन आया ,उस दिन पारस को पता चला ,वो अपने घर तो फोन नहीं करती हैं क्योकिं वह अपने घरवालों से नाराज है किन्तु वहां के किसी व्यक्ति के सम्पर्क में अवश्य है। 

क्या मैं जान सकता हूँ ? ये किसका फोन है ?

तुम लोगों को दिखाने के लिए मेरे पति हो ,वैसे तुम मेरे पति नहीं हो ,तो इसीलिए पतियों वाली हरकतें  भी मत करो !उसने जबाब दिया इसीलिए मुझे तुम्हें यह बताने की आवश्यकता नहीं है ,रूखे स्वर में शिप्रा बोली। 


तुम्हारे पति नहीं वरन दुनिया को दिखने वाले पति के नाते ही पूछ रहा हूँ ,इससे तो तुम्हें कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए।  

मेरी सहेली का है ,एक वही तो है ,जो मुझे अपना समझती है ,वरना मेरे घरवाले भी मेरे अपने नहीं हैं।

ऐसा तुम्हें लगता है ,एक वही तो होते हैं, जो हमारे लिए सोचते हैं वरना इतनी बड़ी दुनिया में हर कोई किसी न किसी स्वार्थ से जुड़ा है, कोई किसी की परवाह नहीं करता यह बात कहते -कहते उसका दिल भर आया और बोला -जो हमें अपना समझते हैं ,अपना समझकर प्रेम करते हैं ,वो तो परवाह करेंगे ही ,तुम उनके लिए क्या सोचती हो या समझती हो ?यह तुम्हारी सोच पर निर्भर करता है।कई बार इंसान सच्चे प्यार को भी समझ नहीं पाता।     

शिप्रा लापरवाही से बोली - ऐसा तुम्हें लगता है ,अच्छा ,अब ज़्यादा ज्ञान मत दो ! मुझे उससे बात करनी है ,कहते हुए खिड़की की तरफ चली गयी। पारस मन ही मन सोच रहा था ,न जाने वो कौन ख़ुशनसीब है ?जिसने इसका मन मोह लिया। पता नहीं, इससे प्यार करता भी है या इसे बहका रहा है ,यदि इससे प्यार करता तो सीधे इसके घर जाकर इसका हाथ मांग लेता। पारस उसे देख ख्यालों में डूबा था ,वो खिड़की के करीब खड़े होकर उससे बातें कर रही थी ,शिप्रा के चेहरे पर भाव आ जा रहे थे।  न  जाने, उसकी सहेली ने उसे क्या बताया था ? शिप्रा के चेहरे की चमक गायब थी ,पारस उसके चेहरे पर आये भावों को पढ़ने का प्रयास कर रहा था।   

अचानक ही वह मुस्कुरा उठी,और बोली -चलो !कहीं बाहर घूमने चलते हैं ,उन दिनों बर्फ पड़ रही थी, वह वहां पर खुश थी , हंस रही थी।

 पारस उसके इस व्यवहार को समझने का प्रयास कर रहा था,लग रहा था जैसे जबरन ही मुस्कुराने का प्रयास कर रही है। 

तब पारस ने पूछा -क्या सब ठीक है ?उसके मन में गाने के वही शब्द गूंज रहे थे -''तुम जो इतना मुस्कुरा रहे हो,क्या ग़म है ?जिसको छुपा रहे हो। '' 

  रास्ते में ,तब वह अचानक पारस से बोली -मेरे पापा और तुम जीत गए,कहते हुए उसने पारस की तरफ देखा ,उसकी आँखों में नमी थी, वह कुछ पूछता या कहता ,उससे पहले ही वो बोली -  मैंने एक धोखेबाज से प्यार किया, मैं उसको समझ नहीं पाई। क्या तुम जानते हो, आज मेरी सहेली ने मुझे फोन किया था और उसने मुझे क्या बताया? यही कि वह अपने ही मोहल्ले की किसी लड़की को लेकर भाग गया है कहते हुए हंसने लगी।

 पारस के मन में उसके प्रति सहानुभूति जगी और साथ ही अपने लिए एक उम्मीद भी ,तभी वह बोली -  किंतु तुम यह मत समझना कि पापा और तुम जीत गए और मैं हार गई और मैं हार मानकर तुम्हारे करीब आ जाऊंगी या तुम्हें अपने करीब आने दूंगी। उसने मेरे प्रेम को नहीं समझा,पारस भी कहना चाहता था कि तुमने भी मेरे प्रेम को कब समझा किन्तु उसकी मानसिक स्थिति को देखते हुए शांत रहा। उसने मुझसे प्रेम नहीं किया तो क्या ? मेरे मन में अभी भी, उसके प्रति प्रेम है , मैं उसके प्रेम को झूठला नहीं सकती और ना ही तुमसे झूठ बोल सकती हूं और न ही अपने आप से, और अब मैं जिंदा भी नहीं रहना चाहती कहते हुए उसने उस पहाड़ी से छलांग लगा दी। इससे पहले कि वह कुछ करता या समझता ,वो नीचे खाई की तरफ जा रही थी। 

 उस समय वे किसी पहाड़ पर खड़े हुए थे ,बाहर के नजारे देख रहे थे और वहीं से अन्य लोग भी पहाड़ी नजारों का आनंद उठा रहा थे। उसे पता ही नहीं चला, कि उसके मन में क्या चल रहा है ?वहीं पर शिप्रा ने उसे यह बात बताई  उसके मन में क्या चल रहा है ?  स्वयं पारस भी नहीं समझ पाया कि उसने यह सब इतनी जल्दी  किया देखने वालों को लगा ,शायद पारस  ने उसे धक्का दे दिया ,कुछ ने अंदाजा लगाया और बोले -वो तो खूब मुस्कुरा रही थी ,लगता है ,उसके पति ने धक्का दिया ,कोई कह रहा था -सब अचानक हुआ कोई कुछ समझ नहीं पाया ,कुछ का कथन था -यदि इसे मारना ही होता तो एकांत में लेजाकर भी तो धक्का दे सकता था यहाँ भीड़ में लाने की क्या आवश्यकता थी ?  किसी ने, पुलिस को भी बुला लिया था ,बहुत सवाल -जबाब हुए ,बस जेल जाने से बच गया क्योकिं स्वयं लड़की के माता -पिता ने अपनी गलती स्वीकार की।  पारस को इस सबसे उबरने में समय लग गया । 

जब हमारी मुलाक़ात दफ़्तर में हुई ,तब वो हमेशा शांत और अपने में खोया -खोया सा रहता था। वो अपनी ज़िंदगी में आये परिवर्तन कहें या भूचाल उससे निकलने का प्रयास कर रहा था। उसने ज़िंदगी में इतना कुछ देख लिया था ,अब इस ज़िंदगी से उसका मन उकता गया था। उसके अपने में खोये रहने के कारण ,मेरा ध्यान उसकी ओर गया ,आख़िर ये लड़का इस तरह सबसे कटा -कटा सा क्यों रहता हैं ?तब मैंने उससे बात करनी आरम्भ की ,वो मेरे पीछे नहीं आया था ,मैं उसके पीछे गयी थी। यूँ समझो ,उसकी उदासी और ख़ामोशी ने मुझे अपनी ओर खींच लिया। 

एक नौकरी पेशा लड़का ,ज़िंदगी में आगे बढ़ता है ,अपने परिवार के कहने पर जीवन में कुछ स्वप्न सजाने लगता है। अभी उसने वे स्वप्न ठीक से देखे भी नहीं, और टूट गए। स्वप्न ही नहीं टूटे, बल्कि उसे भी तोड़ गए, उसका  जिंदगी पर से विश्वास तोड़ गए , ऐसे में आदमी क्या करेगा ? दिन भर की थकान, काम की बागडोर, संभाले, वह अपमान और वेदना से गुजर रहा था। धीरे-धीरे मैं उससे बात करने लगी , मैं उसके विषय में जानने के लिए उत्सुक थी और वह बताना नहीं चाहता था। बताता भी क्या ? कि उसने जीवन में, धोखा खाया है और अपने विश्वास को टूटते देखा है। समय के साथ वह खुलने लगा, उसकी और मेरी दोस्ती हो गई। अब वही जीवन उसे अच्छा लग रहा था, उसे एहसास हो रहा था -'जीवन का अंत यहीं  नहीं है, इससे आगे भी एक जिंदगी है इसीलिए तो तुमसे कह रही हूं बिना किसी के विषय में जाने, बिना सोचे- समझे उसका दिल दुखाना भी उचित नहीं है। 

   

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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