Brahamand

 जिसने यह' ब्रह्मांड' बनाया। 

 उसका कोई पार न पाया। 

 देख! इंसान की, जद्दोजहद,

 ब्रह्मांड बनानेवाला मुस्काया। 



इंसा ब्रह्मांड को समझ ना पाया। 

प्रयासरत रहा इंसा, हार न पाया। 

देख इंसा का परिश्रम, हंसता प्रभु!

मुख में ,प्रभु के 'ब्रह्माण्ड 'समाया।

  

तुम मात्र एक'' अंश'' इस ब्रह्मांड का। 

कान्हा ने, ब्रह्मांड  मुख में दिखलाया।

कुदरत की माया,कोई  समझ न पाया।

देख ,प्रभु की लीला हर कोई भरमाया।

      

जाने कैसे उसने  ब्राह्मांड  रचाया ? 

आज तक जहाँ, कोई पहुंच ना पाया। 

छोटा इतना बालक के मुंह में समाया।

खोज़ में इसकी कईयों ने जीवन गंवाया।  

 

क्या जीवन कम था ? समझने को ,

जो प्रभु ने , ब्रह्मांड की रची माया,

न जाने कितने नक्षत्र ?ग्रहों की छाया।

ज्ञात -अज्ञात,कण -कण में वही समाया।   


 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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