जिसने यह' ब्रह्मांड' बनाया।
उसका कोई पार न पाया।
देख! इंसान की, जद्दोजहद,
ब्रह्मांड बनानेवाला मुस्काया।
इंसा ब्रह्मांड को समझ ना पाया।
प्रयासरत रहा इंसा, हार न पाया।
देख इंसा का परिश्रम, हंसता प्रभु!
मुख में ,प्रभु के 'ब्रह्माण्ड 'समाया।
तुम मात्र एक'' अंश'' इस ब्रह्मांड का।
कान्हा ने, ब्रह्मांड मुख में दिखलाया।
कुदरत की माया,कोई समझ न पाया।
देख ,प्रभु की लीला हर कोई भरमाया।
जाने कैसे उसने ब्राह्मांड रचाया ?
आज तक जहाँ, कोई पहुंच ना पाया।
छोटा इतना बालक के मुंह में समाया।
खोज़ में इसकी कईयों ने जीवन गंवाया।
क्या जीवन कम था ? समझने को ,
जो प्रभु ने , ब्रह्मांड की रची माया,
न जाने कितने नक्षत्र ?ग्रहों की छाया।
ज्ञात -अज्ञात,कण -कण में वही समाया।
