ए..... कौन तुम ?
क्यों तुम ? यहाँ झांक रहे हो।
क्या कहूँ ?
बाहर के कोलाहल से व्यथित !
इधर आ गया हूँ।
भटका हुआ, मुसाफिर हूं।
जो यहां आ गया हूं।
झांक कर जो देखा, भीतर !
बाहर से अधिक कोलाहल है।
कौन हूं, क्या हूं ?
प्रश्न पूछता, अपने आप से ,
बाहर जो जीवन जी रहा हूं।
या अंतर्मन का अंतर द्वंद !
प्रतिदिन योजना बना चलता,
उठता , लगता, जीवन में,
अपने ' फेल 'हो गया हूँ।
भीतर, का शोर बढ़ता रहा,
योजना पर योजना बना रहा हूं।
योजनाओं में अपनी ही ,
उलझ कर रह गया हूं।
भीतर- बाहर के कोलाहल में,
फंसकर रह गया हूं।
