Balika vadhu [67]

आज के समाज में, आज की पीढ़ी में क्या बदलाव आया है ? परिणीति और वीरेंद्र के आसपास ही क्या ?जीवन में अब तक, कैसे लोगों की सोच में परिवर्तन आए हैं? इस विषय पर दोनों पति-पत्नी, आपस में वार्तालाप कर रहे हैं। उनके वाद - विवाद का विषय उनकी अपनी सोच और आज की पीढ़ी के बदलते व्यवहार को लेकर चल रहा है। यह उन्हें  सोचने पर विवश करता है। आजकल क्यों, इस तरह रिश्ते टूट रहे हैं ? क्यों लोग आत्महत्या करने के लिए मजबूर हो रहे हैं ,क्यों लोगों में प्यार और विश्वास नहीं रहा है , अनेक प्रश्न उनके मन  को झिंझोड़ते हैं। किसी न किसी व्यक्ति का उदाहरण देकर, एक दूसरे से वार्तालाप करके अपने मन में उठ रहे सवालों का समाधान चाहते हैं।

 आखिर इस सबका कारण क्या है ? इस सब का कारण क्या लड़कियों की आत्मनिर्भरता है अथवा शिक्षा है ? परिणीति पहले से ही, लड़कियों के शिक्षा के प्रति जागरुक रही है इसलिए उसने जब पुनिया गांव में एक बच्ची का विवाह होते देखा तो उसने इसके विरुद्ध लेख लिख डाला जिसके कारण उस गांव के लोगों में, बहुत आक्रोश भर गया। आज भी उसके मन में अनेक प्रश्न उठते हैं , आखिर इन सब का जिम्मेदार कौन है परिवार के लोग, या फिर स्वयं बच्चों की सोच !


जब परिणीति को पता चलता है, कि वीरेंद्र के दोस्त की एक रिश्तेदार की बेटी के साथ क्या हुआ ? तब उसे दुख तो हुआ लेकिन उसके परिणाम पर, कोई अफसोस नहीं हुआ। जैसी परिस्थितियाँ  थीं , उस आधार पर, वह कहती है -ये तो होना ही था ,उस लड़की को न जाने किस बात का गुरुर था ?अपने ही हाथों अपना घर बर्बाद कर लिया ,इससे तो हम पहले लोग ठीक थे ,कम से कम अपने परिवार ,माता -पिता के मान -सम्मान के लिए ,थोड़ा सहन तो कर लेते थे ,तो क्या आज हम साथ नहीं हैं ? झगड़े तो हममें भी हुए हैं किन्तु अलग होने का तो कभी सोचा भी नहीं ,सोचते भी तो ,मायके वाले समर्थन नहीं करते। झगड़े और मनमुटाव किस रिश्ते में नहीं होते ?मुझे एक भी ऐसा रिश्ता बता दीजिये !जिसमें कभी झगड़ा ही न हुआ हो। भाई -बहन ,भाई -भाई ,बाप -बेटा में भी विचारों में अंतर् आ जाता है। तब पति -पत्नी के  रिश्ते का अंजाम तलाक पर आकर ही क्यों रुकता है ?कभी -कभी तो माँ -बेटी के विचार भी नहीं मिलते,तब भी वो उस परिवार को अपना मानती है ,उस परिवार में रहती हैं । शिक्षा से उन्हें सीखना चाहिये,उनके लिए क्या सही है ?क्या गलत है किन्तु शिक्षा से उनके निजी जीवन में उन्हें कोई लाभ नहीं हो रहा है। 

तुम सही कह रही हो ,जब आदमी नौकरी करता है ,बॉस की डांट भी उसे सुननी पड़ जाती है। तो क्या परिवार के किसी बड़े की बात मानने में, क्या जाता है ? बाहर के लोगों की डांट सुन लेंगे किन्तु घर में कोई कुछ कह दे तो कोर्ट -कचहरी तक बात पहुंच जाती है।अच्छा चलो !मैं अब घूमने जाता हूँ। 

ठीक है ,मैं भी अपना काम निपटा लेती हूँ ,आज सुनीता को भी फोन करूंगी। बहुत दिन हो गए ,उसके बच्चों की परीक्षाएं थीं। आजकल उसका मन भी परेशां रहता है। 

क्यों ?

वह कह रही थी -इस नौकरी के कारण ,अपने बच्चों को समय नहीं दे पाती है। 

हाँ ,ये तो है किन्तु संदीप जी तो समझदार हैं ,अब तक बच्चों को वो संभाल ही रहे हैं। ऐसी नौकरी बार -बार नहीं मिलती। 

उनकी ज़िंदगी है ,उन्हें जैसा करना होगा ,कर लेंगे, दोनों समझदार हैं। 

अच्छा !लौटते हुए कुछ लेकर तो नहीं आना है।मैं अरोड़ा जी के यहाँ जा रहा हूँ ,हो सकता है, आने में देरी हो जाये।

 रात्रि के लिए कोई तरकारी ले आना ,जो भी आपकी खाने की इच्छा हो। वीरेंद्र जी के चले जाने के पश्चात ,सुनीता अपने घरेलू कार्यों में व्यस्त हो जाती है। अभी वह आराम करने जा ही रही थी, तभी उसके फोन की घंटी बजी। अब किसका फोन आ गया ?बुदबुदाते हुए फोन उठाती है। फोन पर सुनीता का नाम देखकर ,जैसे अचम्भित सी हो गयी ,खुश होते हुए ,फोन उठाती है ,हैलो !तेरी बड़ी लम्बी उम्र है ,आज मैं तुझे ही याद कर रही थी। 

याद ही कर रहीं थीं ,फोन क्यों नहीं किया ?फोन ही कर लेतीं।

 अभी -अभी काम से निपटकर लेटने जा रही थी। सोचा ,थोड़ा आराम करके तुझसे बात करूंगी। 

फिर तो मैंने गलत समय पर फोन कर दिया। 

नहीं ,मैं अभी अपने बिस्तर पर ही हूँ ,और बताओ !घर में सब ठीक हैं ,बच्चे ठीक हैं। 

हाँ, सब ठीक ही है ,थोड़ी नौकरी के कारण असमंजस में फंसी थी किन्तु संदीप ने समझा दिया कि परेशान होने की आवश्यकता नहीं। 

सही तो कहा है ,जब पत्नी ,पति का सहयोग कर सकती है तो पति क्यों नहीं ?अच्छा ,मुझे एक बात और पूछनी थी। 

क्या ?

क्या इस गांव में ''बालिकाओं को वधु ''बस इसी कारण से ही बनाया जा रहा है ,या फिर कोई और भी कारण हो सकता है।

तुम इस गांव के विषय में सोचना छोड़ दो ! इन लोगो की ज़िंदगी में जो भी चल रहा है। क्यों बुझती  हुई चिंगारी को हवा देने का प्रयास कर रहीं हैं ?इनके माता -पिता हैं ,अपनी बेटियों का भला -बुरा सब समझते हैं ,जो वे करना चाहते हैं ,करने दीजिये। अभी तो उन' समाज -सुधारकों' के कारण ,यह गांव वैसे ही दुनिया की नजर में आ गया। यह लोग सम्मान से जीना चाहते हैं , अपने मान के लिए यह लोग, जान सकते दे भी सकते हैं और जान ले भी सकते हैं।उन्हें तुम पर क्रोध तो बहुत था किन्तु मेरे कारण उन्होंने तुम्हें क्षमा कर दिया।  

नहीं, मैं तो सिर्फ यह पूछना चाहती हूं, कि  क्या एक ही हादसे के सिवा ,दूसरा  ऐसा कुछ हादसा हुआ था  जिसके कारण इन्होंने इस प्रथा का समर्थन किया। 

मैं, उन लोगों के विषय में जानने की ज़्यादा इच्छुक नहीं हूँ और न ही ,जानना चाहती हूँ। उन लोगों का मुझ पर  जो विश्वास बना हुआ है उसे मैं तोड़ना भी नहीं चाहती। 

ठीक है, जैसी तुम्हारी इच्छा ! कभी समय मिले, तो उस गांव के ऐसे पुराने व्यक्ति से यह बात जानने का प्रयत्न करना कि इस गांव में और ऐसा क्या हुआ था ? जिसके कारण लोग, अपनी बेटियों का '' बालपन''छीनने  के लिए तैयार हो गए। 

परिणीति का दिल रखने के लिए, सुनीता ने उससे कहतो  दिया -जब भी कभी मौका मिलेगा, तो मैं  इस विषय में जानने का, प्रयास करूंगी किंतु कोई भी जल्दबाजी नहीं और तुम  भी वादा करो ! किसी से कुछ नहीं कहोगी। 

हां हां, बस मेरे मन में जानने की इच्छा प्रबल हो रही है, कि ऐसा उन लोगों ने क्यों किया ? बाकी मैं किसी से कुछ और नहीं कहूंगी। 

परिणीति में सुनीता से वादा तो कर दिया किंतु अभी भी उसे परिणीति पर विश्वास नहीं था। कहीं  ऐसा न हो,उससे ये सब कुछ पूछकर कोई लेख या कहानी ही लिख डाले और वो फिर से किसी झंझट में फंस जाये। परिणीति भी आसानी से हार मानने वालों में से नहीं थी।  किसी विषय में जानने का मन बना लेती है तो फिर जानकर ही रहती है। 

वो उसे आते हुए ,कॉलेज की दूसरी मंजिल से देख रहा था ,दूर से ही उसकी छवि उसे मोहक लगी। न जाने क्यों ?उससे रुका नहीं गया ,उसकी ,उस छवि को जानने और देखने की प्रबल इच्छा हुई ,जी तो चाह रहा था कि यहीं से छलांग लगा दे ,किन्तु उसने नीचे जाने के लिए ,दौड़ लगा दी। 

 


  

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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