Balika vadhu [68]

हे!!!!! तुम कौन  हो !इस कॉलिज में क्या कर रही हो ?

जी ,मैं यहाँ पढ़ती हूँ,उसने उस लड़के की तरफ देखा ,जो दो -चार लड़कों को साथ लेकर आया था। देखने से तो उन सबसे बड़ा लग रहा था। उसने मन ही मन सोचा -शायद ,ये इनका सीनियर होगा ,या फिर एक ही क्लास में कई साल से पड़ा होगा। मन ही मन उसने सोचा ,और उसे हंसी आ गयी। 

ऐ....... तुम मुस्कुरा क्यों रही हो ?उस लड़के को गुस्सा आया ,तुम्हारा यह सूट, कपड़े, और यह चोटी यह सब देखकर तो लगता है, किसी गांव से आई हो। उसको अपमानित करने के उद्देश्य से बोला -कौन सा ईयर है ?


सहमी, सिकुडी सी, दामिनी, धीमे स्वर में बोली - फर्स्ट ईयर !

इस तरह झेंपने के कारण, समीर को और अकड़ आ गयी और अकड़ कर बोला -अंग्रेजी भी बोल लेती हो। 

साइंस  या कॉमर्स !

साइंस !

देखने से तो नहीं लगता,तुम साइंस की छात्रा हो। 

क्या साइंस वालों के, चेहरे पर लिखा रहता है, कि वह साइंस का छात्र है ?तपाक से दामिनी बोली - तुम्हारे चेहरे और तुम्हारी अकड़ को देखकर तो लगता है, तुम आर्ट्स के छात्र भी नहीं हो। 

एकाएक दामिनी के मुंह से, यह शब्द सुनकर , उसके साथ खड़े मित्र हंसने लगे और बोले -सही पकड़ा है, ये तो यहां के स्टूडेंट ही नहीं है। ये  तो अपने दोस्त का बड़े भाई हैं , हम लोगों को सीखा  रहे  थे  कि लड़की से  कैसे बात की जाती है ? कैसे उसे डराया जाता है ? किंतु उन लड़कों की बातें सुनने से पहले ही दामिनी वहां से निकल गई। 

सालों !!! तुम मेरी बेइज्जती करवाने के लिए यहां लाए थे। 

हमने तो आपसे नहीं कहा था, दामिनी वहां से चली तो गई किंतु समीर के ह्रदय अपना एहसास छोड़ गई।उसे लग रहा था -उस लड़की में शहरी चमक तो नहीं थी फिर भी उसमें कुछ तो था। दूर से ही खड़ा वह उसे जाते देख रहा था। न जाने , कैसा आकर्षण समीर को,उस ओर खींचकर ले जा रहा था। या फिर उसने दामिनी को गांव की भोली -भाली लड़की समझा जिसको सताने में ,बहुत मज़ा आएगा।  इस तरह अकेले उससे मिल तो नहीं सकता किंतु उसने सोचा अपने भाई के दोस्तों के संग मिलकर उससे बातचीत करने का बहाना मिल जायेगा किन्तु उसे लग रहा था ,जैसे उसका ही अपमान हो गया हो। 

समीर पढ़ाई करने के पश्चात, इसी शहर में, एक कंपनी में कार्यरत इंजीनियर है। आज वह अपने भाई, के परीक्षा परिणाम के लिए, उसकी अध्यापिका, से मिलने आया था। संयोग से उसका सामना, दामिनी से हो गया। दामिनी रहन -सहन से ,एकदम गांव की लड़की लग रही थी। किन्तु घरवालों के कारण ,अभी उस पर शहर का असर नहीं हुआ है क्योकि उसे शिक्षा मिली है। तुम वहां पढ़ने जा रही हो ,न कि कपड़ों की नुमाइश करने।'' सादा जीवन ,उच्च विचार'' रखने चाहिए। इसीलिए अभी तक दामिनी ऐसे ही रह रही है। हालाँकि उसे लगता है ,उसने समीर को ''मुँह तोड़ जबाब दे दिया ''लेकिन उसके मन में भी ,अपने घरवालों के प्रति क्रोध आया। आजकल ऐसे कपड़े कौन पहनता है ?किन्तु मेरे घरवालों को तो जैसे मेरा अपमान करवाने में ख़ुशी मिलती है। 

यही सब बातें वह अपने हॉस्टल और कॉलिज की दोस्त तन्वी से कह रही थी।

 तुम नाहक ही परेशान हो रही हो,तुम अपने इस रहन -सहन के लिए अपने माता -पिता को व्यर्थ में ही दोष दे रही हो। यदि तुम्हें अपने आपको बदलना है ,तो यह तुम पर निर्भर करता है। तुम्हें ही इस तरह रहने की आदत पड़ गयी है। वरना यहां क्या तुम्हारे घरवाले रहते हैं ?वे क्या तुम्हें देखने आ रहे हैं ?क्या तुम अपने को बदलना चाहती हो ?दामिनी ने हाँ  में अपनी गर्दन  हिलाई। तब ठीक है ,मैं तुम्हें ऐसा बना दूंगी ,अपने आपको भी नहीं पहचान पाओगी। उसके लिए जैसा मैं कहती हूँ ,तुम्हें वैसा ही करना होगा। 

लगभग उसी कॉलेज में 4 महीने पश्चात, आज फिर से पेरेंट्स मीटिंग हुई है। एक लड़का दो मंजिली पर खड़ा हुआ था अचानक एक परछाई सी को देखकर, हाथ प्रभु रह गया। उसे वह चेहरा जाना पहचाना लग रहा था किंतु बिल्कुल ही अलग उसके चेहरे पर आकर्षण था। वह भूल गया यहां किस लिए आया है ? और उसे चेहरे को स्मरण करने का प्रयास करने लगा। जानना चाहता था आखिर में छवि कौन है ? अपनी स्मृति दौड़ा रहा था। उसका बस चलता तो उसे देखने के लिए वह दो मंजिली से ही छलांग लगा देता। किंतु वह सीढ़ियों  से नीचे आने का प्रयास करने लगा तभी उसके भाई की आवाज आई। भैया -कहां जा रहे हो ? अभी मेरा नंबर आने वाला है। 

वह अपने को नियंत्रित कर, उसके साथ कक्षा में गया , किंतु उस छवि को नहीं भूल पा रहा था। आखिर यह कौन हो सकती है ? चेहरा कुछ जाना पहचाना लग रहा है।

 देखिए, आपके भाई के नंबर अभी काम आ रहे हैं, क्या आप उनकी शिक्षा पर ध्यान नहीं दे रहे हैं ? 

उसके कानों में स्वर्ग गुंजा, तभी उसके भाई ने उसका हाथ पड़कर उसको हिलाया। जैसे किसी गहराई से निकलकर वह वापस आया हो, अचकचा कर बोला-यह पढ़ता तो है, न जाने, कहां कमी रह जाती है ?

आप उसे बैठ कर अपने साथ एक घंटा पढ़ाएंगे तब भी वह अच्छे से पढ़ लेगा। आपकी मम्मी नहीं आईं। 

जी नहीं मेरी मम्मी, ने ही भाई को भेजा है , उसका जवाब उसके छोटे भाई ने ही दे दिया। 

लीजिए यह परीक्षा परिणाम है, आप इसके नंबर देख लीजिए और इस रजिस्टर पर हस्ताक्षर कर दीजिए। समीर ने फटाफट कुछ रजिस्टर पर साइन किये और बाहर की तरफ भागा। तो उसे लग रहा था जैसे वह लड़की अभी भी जैसे उसकी प्रतीक्षा में ही खड़ी होगी वह नीचे गया इधर-उधर देखा किंतु उसे वह छवि कहीं नहीं दिखलाई दी. इसे मैंने कहीं ना कहीं तो देखा ही है। उसकी नज़रें इधर-उधर घूम रही थी। मन में एक एहसास हो रहा था शायद वह अब दिख जाए अब दिख जाए। 

भैया आप किसे ढूंढ रहे हैं ?

नहीं, नहीं किसी को नहीं, चलो घर चलते हैं , तभी रुका और बोला-क्या कुछ खाओगे ? वह सोच रहा था, शायद इसी बहाने वह कहीं दिख जाए किंतु वह अनजान लड़की उसे कहीं नजर नहीं आई। 


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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