Sazishen [part 140]

इंस्पेक्टर विकास को ,कुछ  समझ नहीं आ रहा है, आखिर यह कत्ल किसने किया होगा ? सभी के चेहरों पर एक प्रश्नचिन्ह नजर आता है। बिना सबूत के तो वह किसी पर हाथ नहीं डाल सकता, और इस घर में कोई भी अपना अपराध स्वीकार करने के लिए भी तैयार नहीं है। पहले तो वह समझ रहा था कि यह कार्य नीलिमा का हो सकता है। परिस्थितियाँ यही बतला रही थीं किंतु अब लगता नहीं है ,कि उसने ऐसा किया होगा। कहीं मैं गलत राह पर तो नहीं जा रहा, मेरी छानबीन हीं गलत हो ,सीताराम से कहता है। 

 तब इंस्पेक्टर जावेरी प्रसाद जी के समीप  जाता है और उनसे ही कुछ सवाल -जवाब करता है।उस समय वे हॉल में एकांतवास कर रहे थे। विकास सोच  रहा था ,कुछ लोगों के घर इतने छोटे होते हैं ,कम आदमी होने पर भी भीड़ का एहसास होता है और एक ये हैं ,घर में बहु -बेटा ,पोता सब हैं किन्तु कितने अकेले हैं ?विकास ,जावेरी प्रसाद जी से प्रश्न करता है, जिस समय आपकी पत्नी गायब हुई, उस समय आप कहां थे  ?


जावेरी प्रसाद जी कहते हैं- मैं अपने घर पर ही था। मुझे क्या मालूम वो कब गायब हुई ?जब वो नहीं दिखी ,तब मैंने पूछा ,तब मुझे पता चला कि वो घर में ही नहीं है ,उसका फोन भी घर पर ही था। 

क्या, आपको मालूम ही नहीं था ? कि वह कहां जा रही है?और  किससे  मिल रही है ?

 मैंने कभी इस और ध्यान ही नहीं दिया। 

 कहीं आपका , वही नौकर तो....... 

नहीं, ऐसा कुछ भी नहीं है,इंस्पेक्टर की बात काटते हुए जावेरी जी बोले। 

यह आप इतने विश्वास के साथ कैसे कह सकते हैं ? हो सकता है, आपको पता न हो। अच्छा ये बताइये ! उस दिन आपसे ,उनका कोई झगड़ा या घर में कोई ऐसी बात हुई हो। 

ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था। तब तो मुझे लगता है, यह कार्य आपके बेटे- बहू का हो सकता है, मुझे उन्हें गिरफ्तार करना होगा। 

मेरे बेटे- बहु ने, ऐसा कुछ भी नहीं किया है,वो भला ऐसा क्यों करेंगे ? पहले आप सबूत लाइए ! आप उन्हें इस तरह से नहीं ले जा सकते। 

आपके  नौकर ने भी, कुछ नहीं किया है, आपके  बहू- बेटा भी बेगुनाह हैं, सीसीटीवी कैमरे से पता चलता है कि आपकी पत्नी घर से बाहर नहीं गई है, जिसका सबूत आपको यहीं  मिल गया , आप दोनों में ही, कोई तो  अनबन तो नहीं हो गई थी। अचानक से इंस्पेक्टर उठा और सभी नौकरों के पास गया, उनसे एक -एक कर कुछ बातचीत की। जावेरी प्रसाद ,उसकी एक-एक हरकत पर नजर रखे हुए थे।किन्तु विकास पर इस बात का कोई असर नहीं पड़ा। तब इंस्पेक्टर, जावेरी प्रसाद से कहता है -एक बार मैं आपके कमरे की छानबीन करना चाहूंगा। 

शौक से कीजिए, आपको कुछ नहीं मिलेगा। 

क्यों, क्या सारे सबूत अपने मिटा दिए ?इंस्पेक्टर व्यंग्य से , कह कर आगे बढ़ गया। उसने दुबारा कमरे का मुआयना  किया। अभी तक तो वह जावेरी प्रसाद को, सही इंसान समझता आया था किंतु धीरे-धीरे,उसकी सोच बदलने लगी और सम्पूर्ण तस्वीर उसके सामने, स्पष्ट होती चली गई। उस कमरे का दरवाजा , दीवार पर लगे खून के धब्बे , नौकर का गायब होना या गायब कर दिया गया। सभी सवालों के जवाब, अब जावेरी प्रसाद जी से ही मिलेंगे।

 तब वह, जावेरी प्रसाद जी के पास जाता है और पूछता है -आप दोनों के बीच ऐसा क्या हुआ था ? जो बात यहां तक आ पहुंची ?

 क्या मतलब ? मैं कुछ समझा नहीं !

 आप इतने नादान भी नहीं हैं , मैंने आपकी अलमारी के, कोने में खून के धब्बे देखे हैं ,''पोस्ट मार्टम ''रिपोर्ट में भी यही आया है ,किसी नुकीली चीज से सिर में चोट ही मृत्यु का कारण बतलाया है। आपकी अलमारी का वो कोना , जिनको की बहुत ही सफाई से साफ करने का प्रयास किया गया है और वह  दरवाजा जो बड़ी होशियारी से आईने से छुपाया गया था। आपके कमरे का ही दरवाजा है , जो बाहर के बगीचे की तरफ जाता है , आपको कुछ और भी सबूत चाहिए या आप मुझे सच्चाई बताएंगे, उस दिन ऐसा क्या हुआ था ? मैंने  आपके सभी नौकरों से पूछा था, सब का जवाब यही था, सभी को नौकरी देने से पहले ''वेरिफिकेशन'' कराया जाता है और आप जानबूझकर, मुझसे  उसके विषय में छुपा रहे थे।वह भी तभी, अपने गाँव चला गया ,जब आपकी पत्नी ग़ायब हुई ,ताकि सच्चाई उसके साथ ही मिटटी में दफ़्न हो जाये।  

जावेरी प्रसाद जी को महसूस हो रहा था कि अब इंस्पेक्टर से कुछ भी छुपाना व्यर्थ है, तब भी उन्होंने पैसे के बल पर इंस्पेक्टर को खरीदना चाहा। इंस्पेक्टर तुमने  इतना, पैसा अपने अब तक के करियर में भी नहीं कमाया होगा जितना तुम अब कमा लोगे, अपनी कीमत बोलो !

 मेरी कीमत यही है, कि आप अपना अपराध स्वीकार कर लें। 

मैं जाने-माने लोगों में आता हूं, आप यूं ही मुझ पर हाथ नहीं डाल सकते। 

जब आपने गुनाह किया है, तो आपको स्वीकारना तो करना ही होगा,' मीडिया' प्रतिदिन हमारे विषय में कुछ न कुछ लिखती रहती है -पुलिस नाकारा है, पुलिस बिकी  हुई है, हमारे ऊपर बहुत प्रेशर होता है। आप हमें सच्चाई बताइए ! तब तक तुषार भी आ चुका था , तुषार के सामने, ही इंस्पेक्टर जावेरी प्रसाद जी से बात कर रहा था और उसने वह आखरी के शब्द सुन लिए थे-आखिर आपने, चांदनी जी का खून क्यों किया ? 

यह सुनते ही तुषार के कदम वहीं पर जम गए , और सोचने लगा -इंस्पेक्टर यह क्या कह रहा है ? क्या पापा ऐसा कर सकते हैं ? उसे अपने कानों पर विश्वास ही नहीं हुआ। वह भड़कते हुए, हाल में आया और बोला -इंस्पेक्टर साहब !आप यह क्या कह रहे हैं ? मेरे पापा और कत्ल ! बोलने से पहले कुछ सोच तो लिया कीजिए। 

सच्चाई  हर किसी को हज़म नहीं होती, किंतु यही सत्य है , तुम्हारे पापा का मानना आवश्यक है उनके कमरे से सभी सबूत  मिल गए  हैं। 

कैसे सबूत ?

तब इंस्पेक्टर ने संपूर्ण बातें तुषार को भी विस्तार से बताईं  -अब तक जावेरी प्रसाद जी चुपचाप सभी बातें सुन रहे थे , एकदम से बोल उठे , उसे मारता नहीं तो और क्या करता ? वैसे उसे मैंने जानबूझकर नहीं मारा था, उस समय परिस्थिति ऐसी हो गई थी। यह मात्रक दुर्घटना थी, वह बाहर पार्टी से शराब पीकर आई थी, उसे तुषार और कल्पना के यहां रहने से परेशानी महसूस हो रही थी वह नहीं चाहती थी कि यह लोग यहां रहें , और अब तो उनका बेटा भी हो गया था। आए दिन मुझसे कहती रहती थी -यह लोग यहां से कब जाएंगे ? मैंने उसे कितना समझने का प्रयास किया ? वर्षों पश्चात मेरे घर में रौनक हो गई थी किंतु वह प्रतिदिन, झगड़ती थी। 

मैंने उसे हर चीज की सुविधा दी, किंतु उसे ,इससे भी संतुष्टि नहीं थी। उसे ,मैंने कभी घूमने- फिरने से नहीं रोका किन्तु वह चाहती थी-' कि ये लोग, यहां से चले जाएं,इतना ही नहीं ,उसने बहु और बहु की बहन में झगड़ा करवाया। इसीलिए मैंने,अपना पोता होने पर, नीलिमा जी को यहाँ बुलाया ताकि वो परिस्थितियों को समझकर आपस में सुलह करवा दें ,मैंने एक दिन उनकी बातें सुनी भी थीं कि वे उसे पहले से ही जानती हैं और उसने उनका घर भी बर्बाद कर दिया था। 

अब आप ही सोचिये ! तुषार भी तो मेरा ही बेटा है। माना कि  उस समय मुझसे गलती हो गयी,मैंने उससे विवाह कर लिया और यह नाराज होकर चला गया था ,उस समय मैं  कितना अकेला हो गया था ? चांदनी की रोज-रोज की हरकतों से मैं तंग आ चुका था। उस दिन, उसने शराब के नशे में मुझ पर हाथ उठाया और मेरा गला दबाने लगी, तब मैंने उसे धक्का दे दिया। धक्का लगते ही, उसका सर अलमारी के कोने में जाकर लगा। जिसके कारण उसका सिर फट गया और खून बहने लगा। वह बेहोश हो गई थी, खून अधिक बह रहा था। मैंने सुंदरलाल को बुलाया, ताकि वह डॉक्टर को फोन करें ! जब उसने चांदनी को देखा तो बोला  -वह मर चुकी है, मेरा उसे मारने का इरादा नहीं था। मैं, घबरा गया था कि अब क्या किया जाए ? तब मैंने सोचा-क्यों न, इसकी लाश को यहीं पर, दफना दिया जाए ? पीछे क्या हो रहा है ,ज्यादातर घरवाले  उधर जाते ही नहीं है? नहीं ध्यान देते हैं ,इसलिए मैंने सुंदरलाल को कुछ पैसे दिए और यह काम करवाया किंतु मुझे डर था कि  सुंदरलाल कहीं मुंह ना खोल दे ! इसीलिए उसे ढेर सारे पैसे दिए ! ताकि वह पैसे लेकर अपना मुंह बंद रखें और पैसे लेकर वह अपने गांव चला गया। 

कुछ दिन तक तो उसने अपना मुंह बंद रखा, उसके पश्चात वह मुझे बार-बार फोन पर धमकी देने लगा और पैसे की मांग करने लगा। उन दिनों आपका भी केस के सिलसिले में आना -जाना लगा रहता था।  एक दिन मैंने उसे पैसे देने के लिए,एक जंगल में बुलाया और उसको , वहीं सुला दिया। 

अपनी बहू -बेटे को उसके परिवार को, अपने पास और अपने साथ देखना चाहता था , वह ऐसा नहीं चाहती थी , मुझसे आए दिन ,इनके लिए झगड़ा करती थी। घर से बाहर निकालने के लिए लड़ती थी। मैंने बहुत समझाया, किंतु वह सुनने को तैयार ही नहीं थी। जावेरी प्रसाद जी ने, सब बातें स्वीकार कर लीं। इंस्पेक्टर खुश था, आखिर उसका केस जो सॉल्व हो गया था। 

तुषार और कल्पना को यह सुनकर बहुत दुख हुआ, कि हमारे कारण पापा के हाथ से, बहुत बड़ा अनर्थ हो गया। जावेरी प्रसाद जी के जेल में, जाने की सूचना अगले दिन अखबार की मुख्य ख़बर थी। नीलिमा शांत थी, परिस्थितियाँ  इंसान को न जाने कहां से कहां पहुंचा देती हैं और क्या से क्या करने पर मजबूर कर देती हैं ? जीवन में उसने, जो कुछ सोचा भी नहीं होता , वह उसे करना पड़ जाता है, अपने बेटे- बहू के लिए, जा वेरी प्रसाद जी को मजबूरी में यह कदम उठाना पड़ा था। मेरी भी तो मजबूरी ही थी, मैं यह नहीं मानती, कि  हर कोई मजबूरी में, किसी की हत्या कर दे यह गलत कदम उठाए ! हम तो दोषी हैं ही, किंतु जो उन्हें इस कदर मजबूर कर देता है कि उन्हें उचित- अनुचित के लिए, ऐसा कदम उठाना पड़ जाए। वह भी कम दोषी नहीं हैं। 

समाज की नजर में, जावेरी प्रसाद जी अपनी पत्नी के कातिल हैं किंतु क्या यह हत्या उन्होंने जानबूझकर योजना के तहत की थी ? यह मात्र एक दुर्घटना थी किंतु सुंदरलाल का क़त्ल तो उन्होंने जानबूझकर ही किया है। कत्ल एक हुए हो या दो सजा तो दोनों की एक ही है।' उम्रकैद की सज़ा 'जज ने अपना निर्णय सुनाया,  

नीलिमा की जिंदगी में धीरेंद्र तो आया ही था, किंतु साथ में चंपा भी आई थी, जिसने उसकी जिंदगी को तहस-नहस करके रख दिया था, और वही चंपा, चांदनी बनकर, जावेरी प्रसाद जी को गुनहगार बना गई। कुछ लोग, ऐसे होते हैं जो न ही स्वयं खुश रहते हैं ,न ही रहने देते हैं, दूसरों को भी, अपनी उसी  कीचड़ में धकेल लेते हैं। इस कहानी से किसी को सबक मिलता है ?तो किसी को विभिन्न चेहरे, जो मुखोटों में आज भी समाज में घूम रहे हैं,नजर आते हैं,  कहीं त्याग है तो कहीं विश्वासघात ,कुछ लोग तो अपनी सोच के कारण ही,ज़िंदगी को अपनी ही नहीं दूसरों की ज़िंदगी को भी मुश्किल बना देते हैं। 

इस समाज में ये एक नीलिमा  ही नहीं न जाने कितनी निलिमाएँ ऐसी घूम रही होंगी, जो अपनों के ही व्यवहार ,उनके शब्दों से लहूलुहान हुई होंगी ,कारण कोई भी रहा हो ,सभी को अपने -अपने हिस्से की यात्रा पूरी करनी होती है फिर चाहे वो खुशियां बांटकर उस सफर को पूरा करें  या जहर घोलकर किन्तु ये याद रहे ,एक न एक दिन वह ज़हर स्वयं भी पीना पड़ सकता है। नीलिमा और उसकी बेटियां आज अपने -अपने घर में हैं। जावेरी प्रसाद जी जेल में अपने अपराध की सजा काट रहे हैं ,जो उन्होंने सबसे पहले चम्पा से इस उम्र में विवाह करके किया ,पछता रहे हैं। मेरी अगली कहानी -शैतानी मन !और बालिका वधु को भी अपना स्नेह दीजियेगा। धन्यवाद !

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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