अग्रवाल जी के यहाँ से ऑनलाइन कार्ड आया है ,वो भी पत्नी के फोन पर ,मैंने सोचा ,इनकी सहेली है इसीलिए दिया होगा किन्तु कुछ देर पश्चात मैंने देखा ,वो भी परेशान घूम रही थीं। मैंने इसका कारण जानना चाहा ,तो बोलीं -शारदा ने मुझे कार्ड तो दिया है, किन्तु एक बार भी यह नहीं कहा -आ जाना।भला ऐसे भी कोई ''निमंत्रण पत्र'' देता है।
मैंने कहा - जब उन्होंने कार्ड दिया है तो इसका अर्थ यही है कि बुलाया है।
वो तो मैं भी समझती हूँ किन्तु कल वो मुझे किट्टी में मिली थी तो एक बार भी नहीं कहा -भाईसाहब ,के साथ शादी में आ जाना। लग रहा है ,औपचारिकता वश कार्ड दे दिया किन्तु दिया किस उद्देश्य से हैं ,ये नहीं मालूम ! क्या मैं अकेली ही जाऊंगी ? किट्टी में भी सभी आपस में यही चर्चा कर रहीं थीं।
मतलब !
मतलब यही ,पहले शादी के कार्ड पर 'विद फैमिली ''लिखा होता था किन्तु उसने फोन पर ''निमंत्रण पत्र '' देकर औपचारिकता निभाई है ,उसके पति आपको भी तो जानते हैं किन्तु उन्होंने आपसे कुछ कहा।
नहीं।
तब हम इस तरह कैसे जा सकते हैं ? तुम्हें बुलाया है ,तुम चली जाना,मैंने मुस्कुराते हुए कहा।
इस तरह मैं अकेली कैसे जा सकती हूँ ?'' जब हमारा जोड़ा है तो अपने जोड़े के संग ही जाउंगी'' ,कहते हुए उनके चेहरे पर थोड़ी मुस्कान आई। ये कोई किट्टी पार्टी है ,उसे पता होना चाहिए कि मेरा परिवार है ,पति है, बेटा है ,अकेली थोड़े ही चली जाऊंगी।
तुम्हारी इच्छा !जैसा तुम चाहो ! बाहर आकर में बरामदे में बैठ गया और अपने उन दिनों को सोचने लगा -जब हमारे गांव में किसी का विवाह होता था, तो सभी को'' चूल्हे नोत '' बुलाया जाता था।'' चूल्हे नोत ''से मतलब था , घर - परिवारों के सभी सदस्यों का निमंत्रण है। उस दिन घर में चूल्हा नहीं जलता था। सभी के दिलों में उमंग रहती थी, सभी उस विवाह में, भोजन करेंगे ,बच्चे भी खुश रहते थे और पत्नी भी कि आज उन्हें खाना नहीं बनना पड़ेगा। गांव में ज्यादातर परिवार ऐसे ही होते थे कि सभी परिवार मिलजुल कर विवाह में शामिल होते थे। बाहर से कोई वेटर या किसी कामगार को नहीं बुलाया जाता था सबके कार्य बांट दिए जाते थे और सब मिलजुल करते थे और मिलजुल कर ही, उस कार्यक्रम में शामिल होते थे। सभी कुछ अच्छे से निपट जाता था।
किंतु समय के साथ, लोगों के रहन-सहन में परिवर्तन आया। पढ़ -लिखकर कमाने के लिए,कुछ लोग शहरों में जाने लगे। जो लोग शहरों में शादी करते थे, वह भी जब'' निमंत्रण पत्र'' बाँटने जाते थे , तो उस 'निमंत्रण पत्र '' पर'' सपरिवार '' लिख दिया करते थे। किसको 'सपरिवार' बुलाया गया है और किसको नहीं। किसको बारात में जाना है, किसको नहीं, यह अपनी आपसदारी पर निर्भर करता था किंतु समय बदला, कुछ और बदलाव आए और, लोग कम होने लगे, परिवार टूटने लगे। जहां आठ से दस लोगों का परिवार होता था, अब परिवारों में, तीन से चार, अधिक से अधिक पांच सदस्य ही दिखाई देते थे। हर चीज, पर महंगाई हो गई, लोगों के खर्चे बढे, रहन-सहन का स्तर भी बढा, किंतु सोच संकीर्ण होती चली गई। अपने तक ही सीमित रह गई।''स्व के लिए कमा रहे हैं ,दुनिया को थोड़े ही खिलाना है।'' हाँ ,ये बात अवश्य है कोई उन्हें बुलाये तो स्वयं सपरिवार जाने के लिए तत्पर रहते हैं। अब किसी दोस्त या रिश्तेदार को बुलाने से पहले, उसमें अपना लाभ और हानि देखने लगे। समय के साथ, लोगों ने यह सब भी स्वीकार किया।
पहले लोग घर-घर जाकर कार्ड बाँटते थे,'' निमंत्रण पत्र ''देकर आते थे और कहकर भी आते थे कि सभी को आना है ,सम्मान के साथ निमंत्रण दिया जाता था, किंतु अब ''निमंत्रण पत्र'' फोन पर ही देने लगे हैं । इस स्थिति को भी लोगों ने समझा, कि अब करने वाले हाथ कम रह गए हैं ,काम ज्यादा है समय अभाव के कारण, इस तरह' निमंत्रण पत्र' फोन पर देना भी उचित है, साथ में व्यक्तिगत तौर पर भी कह दिया करते थे। लोगों की आमदनी बढ़ी है, खर्चे भी बढे हैं किंतु अब लाभ -हानि ज्यादा देखने लगे हैं। क्योंकि अब बड़े-बड़े होटलों में, विवाह करने लगे हैं। जहां पर, इंसान की ख़ुराक को भी गिना जाता है। प्लेट के आधार पर, पैसे दिए जाते हैं। वह इतना महंगा पड़ता है, इतने में पांच लोग आराम से खा सकते हैं।खिलाने वाला भी, बुलाने से पहले चार बार सोचता है और खानेवाला भी हिचकिचाता है, इसीलिए लोग, कुछ लोगों को ही ''निमंत्रण पत्र'' देने लगे हैं और उसमें भी,'' सपरिवार'' लिखने का तो मतलब ही नहीं बनता। एक या दो सदस्यों को बुलाने का प्रयास रहता है।
यह सिर्फ औपचारिकताएं ही रह गई हैं, अग्रवाल जी को नहीं बुलाना होगा, तभी तो उनकी पत्नी ने,मेरी पत्नी को नहीं टोका। महिलाएं तो ऐसी ही होती हैं,जब तक आसपास की खबर न ले लें ,मानती नहीं, उन्होंने भी आसपास से पूछने पर पता लगाया कि हर किसी के मन में यही शंका है कि यह'' निमंत्रण पत्र '' किस आधार पर दिया गया है। सपरिवार तो क्या ?हमसे भी नहीं कहा है यदि हमें ही बुलाया है और मंडप दूर है , तो बिना पति या बिना किसी की सहायता के, इतनी दूर हम कैसे जा सकते हैं ? सभी के मन में एक प्रश्न था। उनका बुलाने का उद्देश्य था भी या औपचारिकता निभाना चाहती थीं।
अब परिवार छोटे हो गए हैं , करने वाले हाथ भी कम है, ऐसे में अकेला व्यक्ति, इवेंट वालों से संपर्क करता है , पैसा खूब लेगा जो उन्हें हर सुविधा देगा। ऐसे समारोह में पैसा भी बहुत लगता है, किंतु अपने आसपास के पड़ोसी या रिश्तेदार, समझ नहीं पाते कि क्या करना है ? जाना है या नहीं जाना है, जाना भी है, तो कितने लोग जाएंगे ? बुलाने वाला भी सोचता है, यदि इस परिवार से चार सदस्य भी आते हैं, 1200 की प्लेट बन जाती है, और कन्यादान में मुश्किल से 5 या 2000 देकर जाते हैं। इससे तो मेरा नुकसान ही होगा। अब यह रिश्ते, मोल भाव के हो गए हैं। ज्यादातर तो लोग ऐसे लोगों को ही बुलाते हैं, जिनसे अपना कुछ, व्यापारिक लाभ हो या बहुत ज्यादा ही करीबी हों।
वे भी क्या दिन थे ? एक समारोह होता था , परिवार और रिश्तेदार सभी प्रसन्न रहते थे। जितने भी गरीब आते थे ,उन्हें भी भोजन मिल जाता था। दो दिन पहले से ही हलवाई लग जाते थे ,देखकर ही लगता था ,विवाह वाला घर है। चहल -पहल रहती थी ,सभी कार्य बड़े ही प्रेम से,सभी संस्कार पूर्ण हो जाते थे किन्तु आज कार्यक्रम होते हैं ,जो बहुत ही पैसे वाले हैं ,उनका तो फेसबुक ,गूगल या यू ट्यूब पर आ जाता है किन्तु कुछ लोगों के पास पैसा होते हुए भी हिसाब -किताब लगाते हैं , उनके कार्यक्रमों का ये हाल है ,जैसे -'एक हाथ से हो रहा है दूसरे हाथ को पता भी नहीं चलेगा।
कैसे रिश्ते हो गए हैं ?संशय पैदा करते हैं ,पैसा भी जाता है किन्तु समझ नहीं आता है ।
