Bachapan ki sardiyan

बचपन ! ठिठुरन भरी सर्दी से अनजाना था। 

ठंडी- गर्मी क्या होती?बचपन इससे बेगाना था। 

मां का हृदय, अपने लाल के वास्ते  हैरान था।

बचपन, मौसमों की उलझनों से नादान  था। 


 

अपना खिलौना साथ ले,अपने पास रखती,

कभी उसके वस्त्र बुनती और  बदलती।  

 कभी अपने आंचल में छुपा,'लेती'गोद में । 

मुस्कुराता बचपन झांकता मां की गोद से।  

खिलखिला उठता, नंगे पांव दौड़ लगाता। 

मां पीछे दौड़ती, पुकारती-ठंड में न जाना।  

टोपा ओढ़ ले ,मेरे लाल! सर्दी लग जाएगी। 

तेरी दादी ,तुझे ,बाहर घूमा कर लायेगी। 

निश्चिंत था,मेरा बचपन, परवाह किसे थी ?

सर्दी हो या गर्मी माँ ही मेरी ,मेरे पास  थी। 

नहीं स्कूल है, जाना,धुंध देख वापस आना। 

दोस्तों संग, डींगें हांकना, बातों से इठलाना। 

होठों को गोल कर सिगरेट का धुआं दिखाना।

मुंगफली के छिलकों में' गिरी 'ढूंढकर लाना।  

बचपन में सर्दी -गर्मी क्या या फिर हो बरसात !

बचपन का कार्य हर मौसम का लुत्फ़ उठाना ।



बदलते चेहरे -

ग़ैरों के मुखौटे क्यों ?तुम अपने आपको ही क्यों नहीं देखते ?

आईने में ,हर दिन, एक नया चेहरा नजर आता है। 

ज़िंदगी के हर एक पड़ाव पर फितरत ही नहीं, रूप बदल जाता है। 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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