Sazishen [part 136]

नीलिमा, इंस्पेक्टर विकास खन्ना की पूछताछ में बाधा डाल रही थी, तब विकास खन्ना ने शिवांगी को थाने में बुलाया। जब शिवांगी थाने में जाती है, वहां एक महिला अधिकारी सुनीता सिंह उससे कुछ सवाल -जबाब करती है। साथ में इंस्पेक्टर विकास भी था। क्या तुम पहली बार, सच में ही, दीदी के विवाह में मिली थी , या वहां पहली बार तुषार से मिली थीं। 

हां, तुषार जीजा जी से मैं, पहली बार वहीं पर मिली थी, हमने तो सुना है, कि वह भी वही पढ़ता था जहां तुम पढ़ रही थीं। तुम दोनों एक दूसरे को पहले से जानते थे और तुम्हें यह सब मालूम नहीं था कि जिसको तुम पहले से जानती हो, उसका विवाह तुम्हारी बहन से हो रहा था। कहीं ऐसा तो नहीं कि तुम, तुषार से प्रेम करती थीं , और जब तुम्हें पता चला कि उसका विवाह तो तुम्हारी दीदी से ही हो रहा है तो तुम्हें बहुत धक्का  लगा।


इंस्पेक्टर की बात सुनकर, शिवांगी एकदम अचंभित सी रह गई ,उसे कुछ सूझ ही नहीं रहा था कि वह क्या कहे ? वह चुपचाप बैठी इंस्पेक्टर की बातें सुनती जा रही थी।  

मैं सही कह रहा हूं ना...... तब तुमने, उसकी मां से अपना संपर्क बनाया ताकि तुम अपनी बहन को, चांदनी के साथ मिलकर अपने रास्ते से हटा सको !

नहीं, ऐसा कुछ भी नहीं है, मैं इतना सोच भी नहीं सकती थी कि मैं अपनी दीदी के रास्ते में कांटे बोऊंगी। 

यदि ऐसा नहीं था तो तुम्हारी दीदी ने तुम्हें घर से बाहर क्यों निकाला ? वह तुम्हें, अपने घर से अलग क्यों कर देना चाहती थी ?

 वह तो दीदी को हम पर शक हो रहा था कि शायद तुषार और मैं ज्यादा करीब आ रहे हैं।

क्या उनका शक बेबुनियाद था ?सुनीता सिंह अकड़ते हुए बोली।  

उस शक की वजह भी तो कुछ होगी, और इसी शक की वजह के कारण, उसने तुम्हें घर से बाहर निकालने का प्रयास किया क्योंकि तुम, चांदनी की सह पर तुषार के करीब रहना चाहती थीं और इस सब में तुम्हारा साथ चांदनी दे रही थी। इसलिए सभी को लगता था कि चांदनी तुम्हारी दीदी को पसंद नहीं करती तुम्हें पसंद करती है और एक बार उसने यह भी कहा था कि यदि तुम्हारी बहन का विवाह तुषार से न हुआ होता तो आज तुम मेरे घर की बहू होतीं,इंस्पेक्टर के मुँह से सच्चाई सुनकर शिवांगी हतप्रभ रह गयी। 

तुम उस दिन बगीचे में क्या करने गई थीं ? अचानक से सुनीता सिंह ने पूछा।

उसके इस प्रश्न पर, शिवांगी अब थोड़ा, घबरा गई और सोचने लगी बिन सच्चाई बताये,ये कुछ भी अर्थ निकालकर ,कहीं ऐसा न हो,हमें ही फंसा दें मतब वो बोली - मैं उस दिन आत्महत्या करने गई थी , इंस्पेक्टर साहब सही कह रहे हैं, मैं तुषार को तब से ही जानती थी जब से मैं, विदेश में पढ़ रही थी किंतु कभी उसे अपने दिल की बात नहीं कर पाई , सोचा था, पढ़ाई पूरी करके जब अपने देश वापस जाऊंगी , तब तुषार से, अपने प्रेम का इजहार करूंगी, किंतु यहां आकर देखा तो मेरी दुनिया लुट चुकी थी, तब मुझे कुछ भी नहीं सूझ रहा था। मैं चांदनी जी से, दीदी के विवाह में नहीं मिल पाई थी, क्योंकि मैं तो इस सदमे को बर्दाश्त ही नहीं कर पा रही थी , कि जिसके लिए मैं, अपने जीवन भर के प्यार के सपने सजाए बैठी हूं वह मेरी बहन का पति होने जा रहा है। 

तो क्या तुषार ने तुम्हें प्रेम में धोखा दिया ? 

नहीं, धोखा भी नहीं कह सकते, क्योंकि उसे तो स्वयं ही मालूम नहीं था, कि मेरे मन में उसके क्या लिए   क्या भाव थे ?

तब ऐसे समय में चांदनी ने तुम्हें सहारा दिया, और तुषार की तरफ तुम्हारा झुकाव बढ़ाया और यही उसके कत्ल का कारण बन गया और जब तुम्हारी मां नीलिमा ने यह सब देखा , तो उससे बर्दाश्त नहीं हुआ। वह पहले ही, तुम्हारी मां की जिंदगी बर्बाद कर चुकी थी। अब वह तुम दोनों बहनों की जिंदगी से खेल रही थी यह देखकर तुम्हारी मां को अपने पर नियंत्रण नहीं रहा और उसने, चांदनी का खून कर दिया। 

क्रोध से, शिवांगी कुर्सी से उठ खड़ी हुई और बोली -आप यह सब क्या कह रही हैं ? मम्मा को तो, इस विषय में कुछ भी मालूम नहीं है, मेरी मां भला ऐसा क्यों करेगीं  ?

यह तुम नहीं जानती, मैं जानता हूं, वह बहुत कुछ कर सकती है। 

चिल्लाते हुए ,शिवांगी बोली -हां, मैं मानती हूं, मेरी बहन और मेरी मां को, हम पर शक हो गया था और उन्हें पता भी चल गया था कि मेरा झुकाव तुषार के प्रति बढ़ाने का कार्य चांदनी का ही है। तब उन्होंने उसे समझाया था और मुझे भी समझाया था किंतु मेरी मां किसी का खून नहीं कर सकती। 

उसने तुम्हें, तुम्हारे सामने समझाया होगा, और चांदनी को अलग समझाया होगा और जब चांदनी नहीं मानी होगी तो उसका कत्ल कर दिया। 

नहीं, यह सच नहीं है, मैं मानती हूं, मुझसे गलती हुई है ,रोते हुए ,शिवांगी स्वीकार करती है। मैंने  चांदनी के बहकावे में आकर, अपनी ही बहन का घर तोड़ने का प्रयास किया। मैं यह भी मानती हूं, कि मैं तुषार से, पहले से ही प्रेम करती थी किंतु मेरी इस भावना का चांदनी ने लाभ उठाया और इस बात का मुझे बाद में पता चला कि वह मेरी भावनाओं से खेल रही है। 

जब तुम्हें पता चला, कि  चांदनी तुम्हें, अपनों के खिलाफ ही, किसी शतरंज की गोटी की तरह, प्रयोग कर रही है, तब तुम्हें उस पर बहुत क्रोध आया, और तुम अपने सवालों का जवाब लेने के लिए ,उसके पास गईं  और जब तुम्हें हकीकत का एहसास हुआ तो तुमने क्रोध में आकर उसे मार दिया। 

यह सब क्या बकवास है ? कभी कहते हैं-' मेरी मां ने उसे मारा है। कभी कहते हैं -'मैंने उसे मारा है। ' जबरदस्ती गुनाह कबूल करवाने का प्रयास कर रहे हैं ,जो कि हमने किया ही नहीं। 

तुम हत्या क्यों नहीं कर सकतीं , तुम्हारे पास उसको मारने का कारण था , क्योंकि उसने तुम्हारी भावनाओं का लाभ उठाया , तुम्हारी मां के पास भी, उसको मारने का कारण था , यदि तुम दोनों ने नहीं मारा, हो सकता है, तुम्हारी बहन ने ही उसे मार दिया हो। वह तुम लोगों की जिंदगी में जहर तो घोल ही रही थी , और जो संपत्ति तुम्हारे बहन और जीजा की है उस पर भी अधिकार जमाये बैठी थी। तुम सबके पास ही उसको मारने का कोई न कोई कारण तो रहा है। 

आपको क्या लगता है ?चांदनी उर्फ़ चम्पा की हत्या किसने की होगी ?घर का ही कोई  सदस्य  रहा होगा या फिर बाहर का। चलिए, पता लगाने के लिए आगे बढ़ते हैं। 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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