अपने उद्गम से बाहर आ.... ,
वो !चली इठलाती ,बलखाती !
लहराती सी, घूमती चहुँ ओर।
जाना कहाँ ? उसे,और न छोर।
जीवन उसका, आसान नहीं।
कभी बनती, विस्तृत-विशाल !
कभी लघु बन,आगे बढ़ जाती।
कभी काँच सी,कभी माटी मिली।
ठहर सकती नहीं ,सतत चलती।
राह में आये , पहाड़ या पठार !
राह बना, निरंतर आगे बढ़ जाती।
सर्दी -गर्मी या वर्षा , रुत कोई हो,
राह में न...... कोई व्यवधान हो।
उछलती,गिरती,पाहन सेआहत हो।
निर्मल ,स्वच्छ धार बन आगे बढ़ती।
जहाँ जाती ,फैला, ख़ुशियाँ देती।
निरंतर आगे बढ़ती जाती,न रूकती।
प्यास बुझाती ,न एहसान जताती।
जलचर ,थलचर सबके काम आती।
बालक उसकी गोद में करते किलौल !
नदी के जल का नहीं है , कोई मोल !
जीने का,आगे बढ़ने का संदेश सुनाती।
कितने रहस्य ? जीवन में, शांति देती।
जहां भी जाती,सभी पर स्नेह बरसाती।
