कागज़ का जहाज ,कमज़ोर ही सही,
मेरे उड़ने का हौसला बुलंद है।
सपने मेरे , अभी सपने ही हैं।
उन्हें पूर्ण करने की इच्छा बुलंद है।
बचपन का ,यह खेल निराला था।
वो बचपन........ , बहुत प्यारा था।
आज भी वो , उड़ान जारी है।
पांव जमीन पर,नजरें मंजिल पर हैं।
आसमानों की उड़ान बुलंदी पर है।
छोटे-छोटे कदमों से आगे बढ़ते ,
मंजिल की ओर उड़ता रहा।
बचपन , ने यह खेल खूब खिलाया।
ले सहारा,नाजुक़ पंखों से उड़ान भरता रहा।
पहुंच पाऊं मंजिल तक, विनती करता रहा।
