Kanch ka rishta [part 47]

आज बहुत दिनों के पश्चात, करुणा ने निधि को फोन किया। निधि ,उसकी सगी भाभी तो नहीं है, किंतु सम्मान सगी भाभी से भी बढ़ कर देती है। निधि ने फोन उठाया -हैलो !

और कहो ,भाभी कैसी हो ?मैं करुणा बोल रही हूँ। 

ठीक ही हूं , निधि की आवाज में कोई उत्साह नहीं था ,ऐसा लग रहा था ,जैसे वह बीमार हो। किंतु इतने छोटे से वाक्य से करुणा उसकी मनःस्थिति को नहीं समझ पाई थी इसीलिए बोली -और मनु कैसी है ? उसकी ससुराल में सब ठीक है, ससुराल वाले सब अच्छे हैं। 

हां, वह भी ठीक हैं। 



बहुत दिनों से आपको फोन नहीं किया था, सोचा -आज फोन कर लेती हूं।

 अच्छा किया, वरना आजकल तो सब मतलब से बात करते हैं, दूसरों के लिए किसी के पास समय ,रहता ही कहां है ? अब सभी रिश्ते, बेमानी होते जा रहे हैं। अब इतना मेलजोल कहां रहा ? अब तो औपचारिकताएं ही रह गई हैं। मतलब निकल जाता है ,तो कोई पहचानता भी नहीं चाहता। 

उसकी आवाज में दर्द था, जो करुणा ने अब महसूस किया -क्या हुआ ?भाभी !कुछ बात हुई है ,क्या ?अपने लिए सोचकर बोली -भाभी ,मैं अपनी ही ,परेशानियों में उलझी थी इसीलिए फोन नहीं कर पाई। 

कोई बात नहीं ,मैं तुम्हारी बात नहीं कर रही हूँ ,आजकल रिश्तों का यही चलन चल रहा है। 

मैं कुछ समझी नहीं ,क्या ,घर में कुछ झगड़ा या कुछ और बात हुई  है?

नहीं, कुछ भी नहीं हुआ है,कहते हुए अपनी सिसकियों को रोक नहीं सकी। 

आपको मेरी सौगंध है , कुछ तो हुआ है ,तभी आप उदास हो और रो भी रही हो , क्या भैया ने कुछ कहा है?उनसे झगड़ा हुआ है या फिर बच्चों के कारण आहत हुई हो। 

तुम्हारे भैया क्या कहेंगे ? अब तो मैं ही, उनसे कुछ भी कहने लायक नहीं रही। 

क्यों, ऐसा क्या हो गया ?भाभी !कुछ भी मत छुपाओ ! करुणा घबराते हुए बोली -यदि आप मुझे अपनी सगी ननद मानती हो , तो अपनी  छोटी बहन की तरह ही ,मुझे अपनी परेशानी बता सकती हो। मन का दर्द भी हल्का हो जाएगा। उस बोझ को लिए बैठी रहोगी तो न जाने ,कब तक परेशान रहोगी ?

बोझ बहुत बड़ा भी है और कुछ भी नहीं, यह दर्द भी, अपनों का ही दिया है। अब कैसे ,किस तरह अपनों की शिकायत किससे करूं ?

मैं भी तो तुम्हारी अपनी ही हूं ,किसी की शिकायत नहीं ,अपना दर्द ही बांट लो ! हम सभी महिलाएं, चक्की में पीस रहे ,गेहूं के समान है ,कोई मोटा पिसता है ,कोई बारीक़ ,किन्तु  पिसता अवश्य है। हम सभी के गम एक दूसरे से मिलते -जुलते हैं क्योंकि हमारी दुनिया ही कितनी बड़ी है ?ससुराल या मायका !थोड़ा दर्द बांट लेने से मन हल्का हो जाता है। 

कह तो तुम ठीक ही रही हो , किंतु कहूं भी तो क्या ?कि मेरा मायका अब नहीं रहा ?कहते हुए वह फफ़क -फफ़ककर रो पड़ी। 

 मतलब ! क्या हुआ ?आपके मायके वालों को, उन्हें कुछ हुआ तो नहीं ,घबराकर करुणा ने पूछा। '' मेरा मायका मुझसे छूट गया ''करुणा को अब तक निधि की बात ठीक से समझ नहीं आई थी। भाभी !मैं इतना तो जानती हूं , कि पूछकर उस दर्द को क्यों बढ़ाना ? इसीलिए मैंने मनु के विवाह में भी नहीं पूछा था कि आपके  भाई क्यों नहीं आए ? क्योंकि आपस में भाई -बहनों में अनबन होती रहती है , किंतु कुछ ज्यादा ही गहरी बात हो गयी होगी ,जो ऐसे कार्यक्रम में भी नहीं आये। मैं ,ये बात पूछकर, आपके दिल को भी नहीं दुखाना चाहती थी इसीलिए पूछा ही नहीं, किंतु आज पूछ रही हूं,- आप बहन -भाइयों में क्या कुछ हुआ है ?

वही झगड़ा था ,वो विवाह में क्यों नहीं आया ? किंतु इस बार का तो झगड़ा ही ऐसा था, उसी झगड़े को निपटाने ही गई थी, मन में आई दरारों को भरने गई थी , उसके मन में ,कोई गांठ थी ,जिसे खोलने  गई थी किंतु जैसे ही गांठ खोली तो पता चला वह धागा ही अलग हो गया।'' मैंने पुनीत को बहुत समझाने का प्रयास किया किंतु उसने तो कुछ सोचना- समझना ही नहीं चाहा। उसने तो मम्मी और पापा के मन में भी न जाने क्या भर दिया ? पापा को तो फिर भी, अपनी बेटी से लगाव रहता है, किंतु मम्मी और भाई के सामने वह भी कुछ नहीं कह पाए ,कई बार ऐसा हुआ है कि मम्मी को बहुत परेशानी पड़ी है ,मैं ,अपने बच्चों को छोड़कर उन्हें देखने गई थी ,उनके लिए परेशान रही हूं, भाई के लिए परेशान रही हूं,उनके साथ खड़ी रही हूँ। सोचती थी - मेरे मायके वाले संभल जाएं ,तो सब ठीक हो जायेगा , किंतु उन्होंने तो संभलते ही, वे रिश्तों  से भी संभल गए ,उन्हें अब लगता है- उनका बेटा ,अब कमाने लगा है, कहीं मेरी नज़र या अन्य रिश्तों की नजर उसके पैसे पर तो नहीं। जैसे ,आज तक किसी ने पैसा नहीं देखा है, अब सब उसकी कमाई पर नजर गड़ायें बैठे हैं। 

तुम्हारे भैया को तो मालूम ही नहीं है, वह तो अपने काम से, शहर से बाहर गए थे, तब मैंने सोचा-खराब हो रहे रिश्तों को, संभाल लेती हूं ,हालांकि मुझे पुनीत से नाराज होना चाहिए था क्योंकि वह मेरी बेटी के विवाह में नहीं आया फिर भी मैं उसे मनाने गई ,उसे समझाने गई कि इस तरह से रिश्ते नहीं टूटते हैं। रिश्तों का और उम्र का लिहाज किया जाता है किंतु पुनीत को तब समझाती ,उससे पहले ही मम्मी भड़क गईं , और बोलीं  -'जब से आई है ,तब से घर में क्लेश मचा रखा है , ऐसा कौन सा हमने तेरा मान सम्मान नहीं किया ? जब हम मान -सम्मान नहीं करते हैं, तो आई ही क्यों है ? जब से लड़के की नौकरी लगी है , हाय -तौबा !मचा रखी है। न जाने उसकी नौकरी भी बचेगी या नहीं , हमारे घर में तो अब यही कमाने वाला बचा है , इसको भी चैन से नहीं जीने दे रही।'

क्या ऐसी स्थिति में, करुणा अपने रिश्तों को संभाल पायेगी ? क्या परिवार वालों के मन में, एक सकारात्मक सोच पैदा कर पाएगी ? ऐसा क्या हुआ ? जो उसका मायका ही उसे छूट गया , मिलते हैं अगले भाग में -कांच का रिश्ता !

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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