Kanch ka rishta [part 46]

निधि अपने भाई पुनीत से पूछती है - वह उसकी बेटी मनु के विवाह में नहीं आया ,क्या उसका यह व्यवहार सही था ? पुनीत ने मम्मी -पापा को भी समझा दिया था, दीदी ! के घर में किसी चीज की कमी नहीं है , तब हम क्यों अपनी मेहनत से कमाया पैसा उन पर लुटाएं ? उसकी ये बात मम्मी को भी सही लगी थी। उन्हें लगता सिर्फ ,उनका बेटा ही मेहनत करके कमा रहा है। वे भी अपने बेटे के पक्ष में थी ,ये हालात तो तब थे जब पुनीत और उसकी पत्नी ने कभी उन्हें खुश नहीं रखा। निधि चाहती थी कि मेरे परिवार के लोग ,अन्य लोगों की तरह ही, आएं  और अपनी रस्में भी निभाएं। यदि बेटी को वर्ष में एक दो बार कुछ दे भी दिया, तो क्या उनके घर में कमी आ जाएगी ? अब तो बेटी का भी अधिकार अपने पिता की संपत्ति पर बनता है किंतु बेटियां यह नहीं चाहती कि वह संपत्ति का बंटवारा करके उसकी मालकिन बनें  बल्कि वह यह चाहती है, कि उसके परिवार वाले, समय पर उसके साथ खड़े दिखलाई दें।


 संपत्ति का क्या है ? आती -जाती रहती है,  क्या परिवार वालों का प्यार और अपनापन , उस घर में भी अपना अधिकार दिखलाता है। उस घर में आकर अपना बचपन जी सके,थकान और उत्तरदायित्वों भरी अपनी ससुराल की ज़िंदगी से ,कुछ दिन के लिए अपने परिवार में आकर सुकून से रह सके। फिर से नई ताजगी के साथ ,अपने उत्तरदायित्वों का निर्वहन कर सके।  किंतु वही माता-पिता जिन्होंने पाल-पोषकर  इतने वर्षों तक उसे बड़ा किया और उसका विवाह किया। वहीं  परायापन दिखाने लगते हैं, तब बहुत दुख होता है। क्या माँ की ममता, बेटी का विवाह होते ही सूख जाती है ?हालाँकि सभी माँयें ऐसी नहीं होतीं ,वह स्वयं भी तो एक माँ है। 

अपने घरवालों का ,पराया सा व्यवहार देखकर ,सोचने लगती है -क्या यह मेरे अपने हैं ? आज ऐसा  व्यवहार कर रहे हैं ,जैसे मुझे जानते ही नहीं , तब निधि को पुनीत की बातों पर क्रोध आ जाता है और वह कहती है -जब तुम्हारी नौकरी नहीं थी और तुम पढ़ रहे थे , तब मैंने कब तुम्हारा साथ नहीं दिया ? तुम्हें कुछ पैसों की आवश्यकता पड़ती थी, तो मैं चुपचाप तुम्हारे पर्स में पैसे रख देती थी। जैसा अपने बच्चों को खिलाया ऐसा ही तुम्हें बनाकर भी खिलाया कभी तुम्हारे जीजा जी ने यह नहीं कहा -'कि तुम्हारा भाई आकर यहां पर खा रहा है , मेरी कमाई का पैसा लग रहा है।' इतनी छोटी बातों पर तो कभी मैंने ध्यान ही नहीं दिया। तू जब भी आया, चुपचाप तेरी मुट्ठी में, मेवे भर देती थी, इस तमन्ना से कि मेरा भाई मेहनत कर रहा है ,पढ़ रहा है , यदि यह कामयाब हो गया। इसकी उन्नति में ही ,हमारे घर की उन्नति है, कभी मैंने यह नहीं सोचा -कि इसके पढ़ने से मुझे क्या लाभ होगा ? मैं क्यों इसके लिए सोचती हूं और क्यों इसके लिए कर रही हूं ? किंतु तेरी जैसी स्वार्थी सोच -सोचकर ही मुझे आज बहुत दुख होता है। आज ऐसा प्रतीत हो रहा है, जैसे मैंने'' नाग को दूध पिलाया ''

तू तो मेरा भाई है, किंतु मेरे प्रति तू तेरा क्या व्यवहार रहा ?तू मुझे देखकर बाहर चला गया, और अपने  ससुराल वालों के लिए, नाश्ते का प्रबंध कर रहा था ,तूने एक बार भी अपनी पत्नी से कहा -कि दीदी आई हैं , बाहर निकाल कर, उनके पैर छुओ! पैर छूना तो दूर की बात है ,नमस्ते भी कर लेती इनके लिए चाय -नाश्ते का प्रबंध करो !

तू जब मेरे घर गया था, तुझे हमेशा ताजा भोजन बनाकर खिलाती थी , तेरी नौकरी के लिए ही मैं और तेरे जीजा जी चढ्ढा साहब से, अक्सर वार्तालाप करते थे ताकि उनकी सिफारिश से ही, तेरी कहीं नौकरी लग जाए। उस दिन भी जब तू घर आया था ,हमने तेरा कौन सा अपमान किया था ? क्या तुझे समय पर भोजन नहीं दिया ? तू तीन दिन रहा था , यदि तुझे अपमान लग रहा था तभी क्यों वापस लौटकर अपने घर क्यों नहीं आ गया ? तेरी जींस की जेब में मैंने, हजार रुपए रखे थे। तू मेरे लिए कुछ सामान लेकर आया था किंतु उससे ज्यादा तो मैंने पैसे रख दिए थे। मैं हमेशा तेरे लिए सोचती रहती थी, मेरा भाई है ,अभी कमाता नहीं है उसके पास पैसे कहां से आएंगे ? तेरे जीजा जी से बिना बताए ही मैं, चुपचाप तेरी पेंट में पैसे रख देती थी। तब तूने एक बार भी नहीं कहा, कि दीदी यह सब क्यों कर रही हो ? आगे मैं आपके किसी भी काम आने वाला नहीं हूं। 

तेरा ही विवाह नहीं हुआ है, मेरा विवाह भी तो हुआ है किंतु मैंने अपने परिवार वालों से या ससुराल वालों से संबंध नहीं तोड़ लिए , ससुराल वालों के कारण कभी तुझे, अपमानित नहीं किया। अपनी जिम्मेदारियां समझ कर, मैं यहां आती थी। अपने पैसों से ही, कुछ साड़ियां और सामान खरीद कर ले जाती थी ताकि ससुराल वालों को दिखा सकूं, यह मेरे मायके वालों ने दिया है ,तुम लोगों का मान -सम्मान बना रहे, इसके लिए मैंने क्या-क्या नहीं किया ? यह मैं ही जानती हूं ,हालांकि तेरे जीजा जी भी जानते हैं , किंतु आज तेरे  व्यवहार के कारण उनसे मेरी नज़रें नहीं मिल पातीं हैं , क्योंकि अक्सर  उनकी आंखों में प्रश्न होता है - क्या यही वह तेरे घर वाले हैं, जिनके लिए इतनी परेशान रहती थी। 

ऐसा तूने क्या कर दिया ? यदि अपने पैसे से सामान ले जाती थी तो अपने लिए ले जाती थी ? मां तुनककर बोली। 

वे  रीति -रिवाज निभाने का, तुम लोगों का फर्ज नहीं था , क्या तुम्हें देना नहीं पड़ता ? अब प्रिया के मायके वाले क्या उससे पैसे लेकर ? उसे सामान देते हैं। प्रिया के सामने मैं, यह सब कहना नहीं चाहती थी, इसलिए तब से चुपचाप अपने मन, पर, एक बोझ लिए बैठी हूं किंतु तुमने अपनी बहू के सामने भी मेरा मान -सम्मान नहीं रखा। क्या उसके मायके वाले नहीं देते हैं ? रीति- रिवाज रस्में नहीं निभाते हैं। तब तुम क्यों चुपचाप लेकर रख लेते हो ? क्यों उससे एक बार भी नहीं कहा। न ही ,हमने बेटियों को दिया है और न ही ,हम लेंगें।   तुम कैसे सभी रिश्ते -नातों  को तोड़कर ताक पर रख सकते हो। तुमने रिश्ते -नाते सभी से नहीं तोड़े......  सिर्फ मुझसे तोड़े हैं क्योंकि अब तुम लोगों को लगता है। अब हम दे सकते हैं किन्तु नियत नहीं है इसीलिए कोई भी बहाना बना इससे रिश्ता ही तोड़ देते हैं। 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

Post a Comment (0)
Previous Post Next Post