आज अचानक ही किशोर जी ने, करुणा से उसकी सहेली के विषय में पूछा - करुणा उन्हें, प्रभा की कहानी सुनाती है और तभी, उनसे एक प्रश्न भी पूछती है -यदि आप उस लड़के की जगह होते ,तब आप क्या करते ?
करुणा के इस तरह के प्रश्न से, पहले तो किशोर घबरा गया, और सोचने लगा , कहीं इसे मुझ पर शक तो नहीं हो गया है , अपने को संभालते हुए, किशोर बोला - यह मैं नहीं कह सकता, उस समय की परिस्थितियाँ किसके साथ, क्या रही होगीं ? यह तो उन परिस्थितियों पर ही निर्भर करता है , हो सकता है ,मैं उसका साथ देता और यह भी हो सकता है ,शायद मैं, उस किशोर की तरह ही करता क्योंकि वह भी तो कम उम्र का था, उत्तरदायित्व को निभाने में उस समय सक्षम नहीं था। ऐसे में उसकी क्या गलती है ?
गलती तो है उसकी, एकदम से करुणा क्रोधित होते हुए बोली -यदि उसे प्रभा से प्रेम नहीं था, या फिर उस रिश्ते को निभा नहीं सकता था। तब उसे बढ़ावा नहीं देना चाहिए था, उसके साथ घूमने क्यों गया ? उसके पैसे पर ऐश क्यों किया ? मेरी नजर में तो वह पूर्णतः लालची था ,मौक़ापरस्त !और जब उस पर जिम्मेदारी आकर पड़ी तो ''पीठ दिखाकर भाग गया। '' करुणा के तेवर देखकर किशोर कांप गया और मन ही मन सोच रहा था -यदि इसे सच्चाई का पता चल गया, तो न जाने यह क्या करेगी ? किंतु अभी भी उसके प्रश्न का जवाब उसे नहीं मिला था। उसे लग रहा था, करुणा कुछ अत्यधिक भावुक हो गई है यदि मैंने इससे और कुछ सवाल -जवाब किया तो शायद न जाने क्या कर बैठे ?
तब वह बातों का रुख बदलने का प्रयास करते हुए कहता है -तुमने उसके पति के विषय में पता नहीं लगाया, आखिर उसके पति ने उसे क्यों नहीं अपनाया ? किंतु करुणा इतनी भावुक हो चुकी थी, उसका आगे कहानी सुनाने का मन नहीं हुआ , और बोली -अभी रात बहुत हो गई है, मुझे सुबह जल्दी भी उठना होता है , मैं आपसे कल बात करती हूं।
किशोर समझ गया था, कि करुणा परेशान हो गई है , तब वह उसे समझाने का प्रयास करते हुए कहता है -उसकी अपनी जिंदगी है ,तुम क्यों परेशान हो रही हो ?अब तो उसकी जिंदगी में कोई परेशानियां नहीं है। अब तो वह ठीक है , तब तुम क्यों अपना खून जला रही हो ?
मैं खून नहीं जला रही हूं, बल्कि यह सोचकर परेशान हूं, कि लोग किसी की मजबूरी का किस तरह से लाभ उठा लेते हैं ? यदि वह लड़का आज उसकी जिंदगी में होता ,तो आज उसकी जिंदगी कुछ और होती।
''यह सब तो जिंदगी में चलता रहता है, 'इंसान गलतियों का पुतला है , कुछ गलतियां स्वयं करता है, कुछ कारणवश हो जाती हैं और कुछ दूसरों की गलतियों का भुगतान करते हैं। यही तो जिंदगी है। '' किंतु हमें आगे बढ़ते रहना चाहिए। तुमने उसकी कहानी सुनी ,अच्छी बात है, किंतु उसका अर्थ यह नहीं है कि अपने खुशहाल जीवन में परेशानी खड़ी करो ! उसकी कहानी को कहानी की तरह ही सुन लो ! उसका मन भी हल्का हो जाएगा किंतु उसको दिल से नहीं लगाना है, जो उसकी जिंदगी में हो गया, उसको तुम दोबारा तो नहीं ला सकतीं , न ही ,सुधार कर सकती हो। इसलिए उसकी कहानी को सुनो ! यदि तुम्हें कुछ लगता है कि उसको अच्छी सलाह दी जा सकती है तो वह भी दे सकती हो, किंतु उसकी कहानी से हमारे जीवन पर कुछ फर्क नहीं पड़ना चाहिए।
किशोर की बात सुनकर, करुणा सोचती है -कि सही तो कह रहे हैं , मैं कुछ ज्यादा ही भावुक हो गई थी , किशोर के शब्दों ने उसके जलते मन पर, मरहम का कार्य किया। उसे किशोर की बातों से उस पर लाड़ आया और वह किशोर के और करीब आकर उसके सीने पर अपना सर रखकर लेट गई।
किशोर मन ही मन सोच रहा था - कुछ गलतियां मुझसे हुई है ,किंतु मैं अब उनकी भरपाई नहीं कर सकता किंतु जो उसका पति उसके साथ था ,जिससे उसका विवाह हुआ था उसने भी क्या उसका साथ नहीं निभाया ? सोचते हुए, करुणा के बालों को सहलाने लगा।
मन ही मन करुणा सोच रही थी, काश !कि वह किशोर भी मेरे किशोर जैसा ही होता। ये कितने सुलझे हुए हैं, कितने अच्छे तरीके से इन्होंने मुझे समझाया ? आंखें बंद किए हुए ,मन ही मन मुस्करा दी, अपने आप को किशोर की पत्नी के रूप में पाकर अपने को धन्य समझ रही थी। अपने आपको किशोर के अंदर छुपा लेना चाहती थी, उसके करीब कुछ और सिमट सी गई।
निधि को अपने मायके में आए हुए, आज दूसरा दिन है एक दिन में ही उसे, अपने परिवार के व्यवहार से पता चल गया था कि वह लोग उसके आने पर प्रसन्न नहीं है किंतु टूटते रिश्तों को वह संभालना चाहती थी। मैं समझा देना चाहती थी, विवाह हुआ तो क्या हुआ ?कि मैं भी ,इस परिवार का एक हिस्सा हूं किंतु उसे लग रहा था या फिर उसे एहसास कराया जा रहा था कि वह जबरदस्ती ही अपना अधिकार जतला रही है। अपने सीने पर दर्द का बोझ लेकर भी, उन टूटते -बिखरते रिश्तों को समेट लेना चाहती थी। वह अपने भाई से उसकी नाराजगी का कारण जानना चाहती थी, ताकि उसकी गलतफहमियों को वह दूर कर सके। होना तो यह चाहिए था कि निधि नाराज होती कि जब उसे आवश्यकता पड़ी उसका भाई, उसके साथ नहीं खड़ा था किंतु उसे तो ऐसा कुछ भी एहसास नहीं था कि उसने कोई गलती भी की है। उसे गलतियों का एहसास दिलाने के लिए, उसे समझाने के लिए ही ,वह यहां आई थी किंतु यहां भी उसे, दिल दुखाने वाला वही व्यवहार नजर आया। माता-पिता भी जैसे उसके '' रंग में रंगे थे।''
प्रिया के भाभी -भैया के चले जाने के पश्चात, तब निधि पुनीत से पूछती है -तुमने मेरे साथ ऐसा क्यों किया ?
मैंने क्या किया ? पुनीत लापरवाही से बोला।
क्यों ,क्या तुम कुछ जानते नहीं हो ? क्या तुम्हारी यह गलती नहीं थी कि तुम अपनी सगी भांजे के विवाह में नहीं आए जबकि तुम्हारा कर्तव्य बनता था। अब तो तुम्हारी नौकरी भी लगी है, तब क्या आपत्ती थी ?
बस ,अब क्या मेरा यही काम रह गया है ? मैं अपने बच्चों पर ध्यान नहीं दूं , तुम्हारे बच्चे बड़े हो गए हैं, उनका विवाह हो रहा है, मेरे बच्चों की तो अभी शिक्षा भी पूर्ण नहीं हुई।
यह तुम्हारा क्या जवाब है ? जब उनका समय आएगा तो उनके भी, सभी कार्य पूर्ण होंगे ? तब तक क्या तुम अन्य रिश्तों से नाता तोड़ लोगे ,अन्य रिश्तो से भी नाता तोड़ना है या सिर्फ मुझसे ही........ उसका इशारा प्रिया के मायके वालों की तरफ भी था। न चाहते हुए भी ,प्रिया के परिवारवाले बीच में आ ही जाते हैं।
अब पुनीत ,निधि के सवालों का क्या जबाब देगा ?क्या उनके संबंध सुधरेंगे या और बिगड़ जायेंगे ?आइये !मिलते हैं ,अगले भाग में -''कांच का रिश्ता ''
