प्रभा अपने मन का दर्द ,अपनी सहेली करुणा से कहती है, करुणा बीच-बीच में उसे समझाने भी लगती है कि वह कहां गलत थी ? किंतु बार-बार टोकने पर प्रभा को बुरा लगता है। तब करुणा उससे कहती है- अच्छा, बाबा !अब मैं ,तुझे तेरी कहानी के बीच में नहीं रोकूंगी। इस बात पर दोनों मुस्कुरा देती हैं किंतु यह कहानी अभी समाप्त नहीं हुई थी। करुणा को घर के कार्य भी करने होते हैं इसीलिए वह उस कहानी को अधूरा छोड़कर ,अपने घरेलू कार्यों में व्यस्त हो जाती है, शाम को जब किशोर आते हैं। अपने हाथ -मुँह धोकर,चाय पीने की इच्छा से,मेज पर आकर बैठ गए। चाय बनने में अभी समय था क्योंकि करुणा आटा गूँथ रही थी।
आज अचानक ही न जाने क्यों? किशोर जी प्रभा के विषय में पूछ बैठे -तुम्हारी उस सहेली का फोन आया या नहीं। अब तो उसे फोन नंबर भी मालूम है ,क्या तुम दोनों ने बातें कीं ।
आटा गूंथते हुए करुणा ने एक नजर किशोर की तरफ देखा,वह मन ही मन सोच रही थी -उस दिन मैं बताने के लिए उत्सुक थी , तब इन्होंने कोई ध्यान नहीं दिया और आज स्वयं ही पूछ रहे हैं, कोई भी जवाब देने से पहले, करुणा ने किशोर से ही प्रश्न कर डाला -क्यों ,आज क्या बात हो गई ? अचानक प्रभा का स्मरण कैसे हो आया ? करुणा ने किशोर के व्यवहार से के कारण ही, मन ही मन सोच लिया था ,कि जब तक यह नहीं पूछेंगे , तब तक मैं इन्हें कुछ नहीं बताऊंगी।
आज ऐसे ही बैठा हुआ था, अचानक उसका स्मरण हो आया ,मैं सोच रहा था -क्या तुम्हारी सहेली ने , आज तक फोन नहीं किया।
मैं उस दिन आपको बताना तो चाहती थी किंतु आपने कोई उत्सुकता नहीं दिखाई इसलिए मैं भी शांत हो गई, करुणा ने किशोर के सामने चाय और बिस्किट रखते हुए कहा।
हो सकता है ,मैं किसी और कार्य में उलझा हूं या कहीं और ध्यान था ,इसलिए मैं तुम्हारी बातों को नहीं समझ पाया, या ध्यान नहीं दे पाया था। ये बात किशोर भी जानता है ,उस दिन प्रभा का जिक्र होते ही ,वह घबरा गया था कि कहीं उसने कुछ ऐसी बात न कह दी हो !इसीलिए वह उस चर्चा को टालना चाहता था ,किन्तु आज इतने दिनों पश्चात ,उसे लगा ,जैसे कुछ नहीं हुआ ,उसके अंदर का भय समय के साथ कम हो गया था। क्या उसका कोई फोन आया था ? दरअसल किशोर, प्रभा से उस वाक्य के विषय में भी जानना चाहता था जो उसने अपनी बेटी की शादी के वक्त कहे थे। वह वाक्य रह-रह करकर उसके कानों में गूंज रहे थे -'' तुमने मुझे खोकर बहुत कुछ खो दिया। '' उसका आशय शायद धन से होगा, किंतु फिर भी यह शब्द उनके मन -मस्तिष्क पर हथौड़े की तरह ठक -ठक करते रहते हैं।
हां, उसका फोन अक्सर आता रहता है, आपको पता नहीं है, उसने बहुत परेशानियां झेली हैं और बहुत धोखे खाए हैं।
इससे बड़ा धोखा और क्या हो सकता है ? न जाने उसका पति, उसे छोड़कर कब चला गया ? मन ही मन करुणा सोच रही थी- मुझे प्रभा की यह कहानी किशोर को बतानी चाहिए या नहीं , शायद इन्हें लगे, इसकी सहेली कैसी है ?
कैसा भी लगे, सबकी अपनी -अपनी जिंदगी है , इसमें मैं क्या कर सकती हूं ? अपने आप ही, अपने प्रश्न का उत्तर भी दे दिया। सहेली साथ होने से, मेरा उसकी जिंदगी पर या उसका मेरी जिंदगी पर अधिकार तो नहीं हो जाता है। आज मैं आपको जो बताने जा रही हूं, वह बेहद ही दर्दनाक, और सोचनीय है।
सोचनीय है ,कैसे ?
सोचनीय इसीलिए है -यदि परिवार में एकता हो, आपस में एक -दूसरे का ध्यान रखें ,एक -दूसरे की भावनाओं को समझें !तो वो विपत्तियां टल सकतीं हैं ,जिनका सामना मेरी सहेली प्रभा ने किया। बेटियां पैदा तो हो जाती हैं, किंतु उनके प्रति जो उत्तरदायित्व होते हैं, उनको हर कोई निभाना नहीं चाहता। ऐसा ही मेरी सहेली प्रभा के साथ भी हुआ, बेचारी के भाई ! अपने पिता के ऐशो -आराम पर जी तो रहे थे किंतु बहनों के प्रति उनका कोई उत्तरदायित्व नहीं था। न ही, निभाना चाहते थे। बहन -भाइयों के ऊपर बड़ी-बड़ी फिल्में बनी हैं और बहुत ही भावुक कर देने वाले, गाने भी बने हैं -''भैया मेरे राखी के बंधन को निभाना। '' और एक हिंदी फिल्म का भाई! चाहे कितनी भी परेशानियां हों ? वह अपनी बहन के सभी कर्तव्य ,निभाने के लिए तत्पर रहता है। चाहे कितनी भी परेशानियां आएं लेकिन बहन के लिए, हर तरह से तैयार रहता है। किंतु क्या वास्तव में ऐसा होता है ? या वे पहले समय के भाई थे,' जो राखी की डोरी को , कभी न टूटने वाला ,एक मजबूत धागा बना देते थे ''किंतु आज , आज के भाइयों को अपनी बहन के दर्द और परेशानी का आभास ही नहीं होता वह किस मानसिक स्थिति से गुजर रही हैं ? हो सकता है, भाई को भी कोई परेशानी हो किंतु बहन पहले परख लेगी लेकिन भाई उसकी परेशानी को नहीं परख पाता है कहते हुए ,करुणा भावुक हो उठी।
तुम इतनी सारी भूमिका क्यों बना रही हो ? ऐसा उसके साथ क्या हुआ था ? स्पष्ट रूप से बताओ !
वही तो बताने जा रही हूं, भूमिका बनाने का मेरा उद्देश्य , आप उसकी कहानी को अच्छे से समझ पाएंगे। तब उसने वह कहानी, जो प्रभा की जुबानी थी , किशोर को सुनायी ,अभी वह थोड़ी कहानी ही सुना पाई थी ,जिसे सुनकर किशोर को लगने लगा था -'वास्तव में ही ,उसने बहुत बड़ी गलती कर दी है किंतु मैं भी क्या करता ? उस समय पर परिस्थितियाँ ठीक नहीं थीं। मैं भी तो बच्चा ही था ,पढ़ रहा था। मैं कैसे ?उसका उत्तरदायित्व उठा सकता था? इसलिए मुझे पलायन करना पड़ा। किशोर अनेक सवाल -जवाबों से, जूझ रहा था।
करुणा को लगा, शायद प्रभा की कहानी सुनकर यह भी भावुक हो गए हैं , तब वह किशोर से पूछती है -यदि उसके किशोर की जगह आप होते , तो ऐसी स्थिति में आप क्या करते ?
