Shaitani mann [part 1]

नितिन अपने घर का लाडला और प्यारा बेटा है, हर बच्चा उसके जैसा हो ! ऐसे बच्चों की चाहत हर माता-पिता करते हैं ,व्यवहार में ,संस्कार में ,उसका कोई जोड़ नहीं था। कितना आज्ञाकारी बेटा है ?रिश्तेदार भी उसके व्यवहार को ,उसकी सोच को देखते हुए माता-पिता के साथ-साथ अन्य लोग भी उससे प्रसन्न रहते थे। सभी रिश्तेदार उसके पिता को एहसास करा देते थे -कि बेटा हो तो नितिन जैसा !

माता-पिता को भी, उस पर गर्व होता। नितिन पढ़ने में होशियार और मेहनती  था। बेटा, रात -दिन पढ़ाई में मेहनत करता,यही वर्ष और पूर्ण करना है। उसके पश्चात कॉलिज में चला जायेगा ,किसी भी मनपसंद विषय से स्नातक करके अपनी ज़िंदगी की ऊंचाइयों को छूने का प्रयास करेगा। माता -पिता उसके स्वभाव को देखते हुए ,उसकी तरफ से निश्चिंत हो गए थे। अब तो उसके विवाह के स्वप्न सजाने लगे थे। 



लगता है ,समय तो जैसे पलक झपकते ही,निकल गया और बेटे का अच्छे से विश्वविद्यालय में दाखिला भी हो गया किन्तु समय ,बुद्धि और जीवन को बदलते देर नहीं लगती जब ''शैतान की कुदृष्टि '' पड़ जाये तो मन ,मन नहीं रहता। ''शैतानी मन ''बन जाता है। ग्रह चाल भी विपरीत हो जाती है ,कहते हैं -''होनी को कोई नहीं टाल सकता। ''नक्षत्र भी अपनी चाल बदल देते हैं। ऐसा ही कुछ नितिन के साथ हुआ। नितिन अपनी पढ़ाई में रहता किन्तु उसके कमरे में, जो दो अन्य लड़के रहते थे। उनका पढ़ाई में मन नहीं लगता था। सदैव ही ,गलत बातें सोचते और ऐसी ही बातें करते। न ही पढ़ते ,न ही पढ़ने देते ,शायद उनके माता -पिता ने भी उनकी हरकतों से तंग आकर,उन्हें उस छात्रावास में भेज दिया। हो सकता है ,सुधरने के लिए भेजा हो किन्तु यहाँ रहकर तो वो और भी आवारा हो गए थे। उन्हें किसी का ड़र -भय नहीं। उनकी हरकतों को देखकर अध्यापक भी उन्हें नजरअंदाज कर जाते। 

आरम्भ में नितिन उनसे बहुत परेशान रहा और उसने कॉलिज वालों से शिकायत भी की और कमरा भी बदलने की प्रार्थना की किन्तु कुछ लाभ न हुआ। तब नितिन ने सोचा ,जब इन्हीं लोगों के साथ रहना है तो क्यों न...... मैं अपना कर्म करूं और ये अपना !जो भी इन्हें करना है ,फिर सोचा -क्यों न ,इन्हें ही अच्छा इंसान बना दिया जाये ?बस ,यही सोच उसे ले डूबी। वो उन्हें समझाता और वे उसे। 

क्या रक्खा है ?ऐसी ज़िंदगी में....... न ही कोई मौज मस्ती !न ही कोई रोमांच !सम्पूर्ण ज़िंदगी पहले पढ़ते रहो !फिर नौकरी पर लग जाओ !कहाँ है ?मस्ती ! विवाह हो गया तो ,परिवार को पालते -पालते बूढ़े हो जाओ !तमाम उम्र !अपनी इच्छाओं को मारते रहो !न ही ,कोई मनोरंजन !न ही कोई लड़की !न ही घूमना ,बस आज्ञाकारी का तमगा टांगकर,किसी पालतू कुत्ते की तरह ,संस्कारों के पट्टे को गले में लटकाये घूमते रहो !कभी हमारे बाप ने भी इतनी पढ़ाई की है ।'' पेट के लिए 'तो वो भी कमा लेता है ,फिर हम पर ही पढ़ाई का ये दबाब क्यों ?

अब तू ही अपनी ज़िंदगी में झांककर देख !ऐसी ज़िंदगी से तूने क्या पाया ?कभी अपनी ज़िंदगी जी है ,अपने घरवालों का आज्ञाकारी बेटा ही बनकर रहा। अपनी ज़िंदगी का क्या ?कभी सोचा है ,कभी रातों को पार्टी का मज़ा नहीं लिया ,कभी किसी लड़की की तरफ नहीं देखा ,उसको महसूस नहीं किया ,दूसरे ने भी उसके कान  भरे। 

इस सबसे क्या होगा ? ठीक से पढ़ाई करके नौकरी करके भी ,तुम अच्छे से ,सुकून से ज़िंदगी जी सकते हो !विवाह के पश्चात दाम्पत्य सुख का आनंद ले सकते हैं। यदि हम अपने माता-पिता का कहना भी मानते हैं, तो उससे हमें भी सुकून मिलता है , और उनके मन को भी आनंद मिलता है। किसी को सुख और सुकून देने में, कोई बुराई भी नहीं है। मानव जीवन का धर्म ही है , दूसरों के लिए जीवन जीना सीखो ! अपने लिए तो जानवर भी जी लेते हैं। उसका [ईश्वर का ]हमें धन्यवाद करना चाहिए ,ईश्वर ने हमें, इतना सक्षम बनाया है , हम अपंग नहीं है। मानव जीवन का उद्देश्य तो यही है, अपनों को और अपने साथ रहने वालों को,'' जियो और जीने दो। ''

प्रभु !तुम्हारे बहुत अच्छे विचार हैं, कहते हुए दोनों दोस्त हंसने लगे। तुम यहां धूनी क्यों नहीं रमा  लेते, आसन लगाओ ! और प्रवचन दो !या सन्यास ग्रहण करो !

''इतना सब करने की आवश्यकता नहीं है, संसार में रहकर भी ,हम सात्विक कार्य कर सकते हैं ,संन्यास के लिए बाहर क्यों जाना ? सभी कर्म करते हुए ,हम सन्यासियों की तरह भी रह सकते हैं। संसार त्यागने के लिए नहीं है, बल्कि संसार की कर्तव्यों को निभाते हुए, आगे बढ़ने के लिए है ''नितिन ने उन्हें समझाना चाहा। 

प्रभु ,प्रभु !आपकी माया अपरंपार है, आप, कोई सत्संग ज्वाइन क्यों नहीं कर लेते ? कथावाचक क्यों नहीं बन जाते? तुम तो ज्ञान का भंडार हो किंतु यह ज्ञान हमें प्रभावित न कर पाएगा , कहते हुए दोनों हंसने लगे प्रभु !तुम्हारे चरण कहां है ? कहते हुए उसके चरणों की तरफ झुके !

दोनों ने ही, आंखों ही आंखों में कुछ इशारा किया, रात्रि में जब नितिन सो रहा था अचानक कोई आहट सुनकर, उसकी आंख खुल गई। उसने घड़ी में समय देखा, रात्रि के 12:00 बज रहे थे , उसने अपने पास के बिस्तर पर देखा। उसके दोनों ही दोस्त बिस्तर पर नहीं थे। शायद वह लोग आज फिर, बाहर निकल गए। एक मन किया कि इन्हें '' रंगे हाथों पकड़वा दूं'' किंतु दूसरे ही पल सोचा -एक बार देखकर तो आना चाहिए यह लोग कहां जाते हैं ? वह अपने कमरे से बाहर आया, उसने अंधेरे में कई परछाइयां देखीं। जो दीवार फांदकर दूसरी तरफ जा रही थी। नितिन का मन किया कि वापस जाकर, अपने बिस्तर पर लेट कर सो जाए किंतु दूसरे ही पल विचार आया। दीवार से उस पार ऐसा क्या है ? जिसके लिए यह लोग इतनी रात्रि को परेशान  हो रहे हैं , अर्धरात्रि को भी जा रहे हैं। यही जिज्ञासा, उसे उनके पीछे ले गई। वे लोग एक आलिशान होटल में पहुंच जाते हैं जहां पर मध्यम रोशनी में, संगीत बज रहा था। सुंदर-सुंदर नर और नारी  घूम रहे थे। उनके वस्त्र भी आकर्षक थे। अपने दोस्तों का पीछा करते हुए, उस स्थान के मध्य में पहुंच गया। एक से एक सुंदर अप्सराएं वहां अर्धनग्न होकर नृत्य कर रही थीं। 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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