एक विस्तृत ,विशाल खुला,आकाश थी ,
ममतामयी,बरसती प्रेम की फुहार थी।
सहनशील प्रकृति की इक मिसाल थी।
प्रसन्नचित्त उसका, वो पापा की माँ थी।
विशाल आँचल फैलाये समेटती तमाम दर्द ,
गरीबों के लिए तो....... भावों का भंडार थी।
दुबली -पतली गौर वर्ण काया प्रभु का वरदान थी।
कम पढ़ी -लिखी होकर भी अनुभवों की खान थी।
मुझे कहानी सुनाती, उसकी महानता विशाल थी।
मेरी परवाह रहती , कभी संग मेरे, मस्ती करती।
उसे मुझसे ,बहुत आशाएं थीं ,प्रेम था ,उम्मींदें थीं।
''मेरी दादी ''ही नहीं ,वो मेरी प्यारी सहेली भी थीं।
'' कलयुग आया'' ,जो दादी के रहने लायक नहीं रहा।
हंसती -मुस्कुराती ''मेरी दादी ''की उसे भी तलाश थी।
हमारे लिए ही नहीं ,मेरी दादी उसके लिए भी ख़ास थी।
परिश्रमी ,प्रेमपूर्ण ,साहसी ,गुणों की खान थी ''मेरी दादी ''
