Rasiya [part 45]

बालपन में और खेल -खेल में ,बच्चे कभी -कभी ,बड़ों जैसी बातें कर जाते हैं या फिर उनकी सोच और भविष्य उनकी सोच और कर्म में नजर आने लगता है। आज एक लड़के की ''घुड़चढ़ी ''को देखकर,अनजाने ही ,मयंक भी अपने दोस्तों से कुछ इसी तरह के प्रश्न पूछता है -कि कौन इस लड़के की तरह एक दिन का राजा बनना चाहता है ? तब तन्मय अपने दोस्तों से कहता है -मैं तो हवा का रुख देखकर चलने वाला हूँ ,जैसा समय होगा ,उसी के आधार पर बहता चला जाऊंगा। 

यानि कि तेरा कोई चरित्र नहीं , हँसते हुए सतीश बोला। 


इसमें चरित्र न होने की बात कहाँ से आ गयी ? यही तो चरित्र हुआ ,कि मैं शायद ,समय के बहाव के साथ मुड़ जाऊँ या फिर उसे ही अपने अनुसार मोड़ लूँ ,यह तो समय ही बताएगा। 

तुम्हारा जवाब मुझे बहुत अच्छा लगा, चतुर ने कहा,ज़िंदगी में लचीलापन तो होना ही चाहिए वरना विपरीत परिस्थिति में तुम्हारा अहं ही तुम्हें तोड़ डालेगा।  

मयंक तुम सबसे प्रश्न पूछ रहे हो किन्तु तुमने तो अपने विषय में ,कुछ भी नहीं कहा सतीश बोला। 

मैं क्या कह सकता हूं? फ़ीकी सी हंसी से हँसते हुए मयंक बोला -मैं कोई सपना नहीं देखता , किसी भी कार्य को पूर्ण करने  का प्रयास करता हूं ? ताकि पूर्ण होने पर मुझे वह इक सपना सा नजर आए। रही बात ,एक दिन का राजा बनने की, वह तो मैं अवश्य बनूंगा कहकर हंसने लगा ,जब सभी लड्डू खायेंगे तो मैं ही क्यों वंचित रहूं ?बिना खाये भी पछताना है तो खाकर ही क्यों न पछता लिया जाये। किंतु उस राजा के पद को संभालने के काबिल होने के पश्चात ही राजा बनूँगा। 

हम तुम्हारा तात्पर्य नहीं समझ पाए, इसमें समझना क्या है ?? जब कोई राजा बनता है ,तो उसे उस पद के लायक भी तो होना चाहिए। 

यानी 

 यानी क्या ? उस पद को ,संभालने की हममें क्षमता भी तो होनी चाहिए ,राजा तो बन गए, किंतु उसको संभालने की हममें क्षमता नहीं है ,तो वही जिंदगी भर का रोना है और यह रोना क्यों होता है ?क्योंकि हम उस जिंदगी को संभाल नहीं पाते ,घबरा जाते हैं और उसको संभालने के लिए ,हमें उसके काबिल होना होगा, आर्थिक रूप से और मानसिक रूप से मजबूत भी होना होगा। चलो ! अब हमारा गांव भी आ गया है, कल फिर मिलते हैं , कहते हुए सभी दोस्तों ने ,अपनी -अपनी साइकिल अपनी -अपनी गली में दौड़ा दी।

 अपने दोस्तों की बातों से और दोस्तों से दूर होते ही ,चतुर को फिर से कस्तूरी की यादों ने घेर लिया। मन ही मन तय किया कल अवश्य ही कस्तूरी से मिलकर रहूंगा ,सोचते हुए घर के सामने अपनी साईकिल खड़ी कर दी।

तू आ गया ,उसे देखते ही रामप्यारी ने पूछा और बोली -आ बैठ !रोटी खा ले !चूल्हा अभी ठंडा हुआ है। भोजन करते समय ,मन भी न जाने कहाँ -कहाँ कुलांचे भरता रहता है ? इस प्रकार चतुर का चित्त भी,कस्तूरी के पत्र के शब्दों में खो गया। वह फिर से बेचैन हो उठा उसने ,शीघ्र ही अपना भोजन समाप्त किया और अपने कमरे में जा पहुंचा। एक पैन ढूंढ़कर लिखने बैठा-

मेरे सपनों की रानी ,मेरी जान !

तुम क्यों इतना परेशान होती हो ? तुम्हारे पत्र ने मुझे भी ,परेशान कर दिया। तुम्हें ऐसे स्थान पर नहीं आना चाहिए। तुम पर मेरे दोस्त की दृष्टि पड़ गयी थी। मैं जानता हूँ ,तुमने बहुत ही साहस का कार्य किया। एक लड़की के लिए यह बहुत ही कठिन राह है। मैं बार -बार तुम्हारे घर भी तो नहीं आ सकता। अब तुम्हारा वो भाई भी इतना छोटा नहीं कि उसे बहका सकें। मैं तो एक बात जानता हूँ ,हमें थोड़ा धैर्य से कार्य करना होगा। अभी तुम्हारे घरवाले भी ,तुम्हारा विवाह नहीं करेंगे और मेरी पढ़ाई भी पूरी तो नहीं होगी किन्तु माता -पिता की नजर में ,बड़ा और विवाह लायक तो हो ही जाऊँगा।तब अपने घरवालों से बात करूंगा ,अभी तुम भी अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो !सच कहता हूँ ,पढ़ने बैठता हूँ तो तुम ही तुम नजर आती हो। मुझे तो लगता है इस वर्ष इम्तिहान पास कर भी पाउँगा या नहीं और हाँ ,एक बात और....... कभी जान देने की बात मत कर ना ,हमें साथ रहना है ,साथ -साथ जीना है, समझी ! तुमसे एक बात और कहनी है ,तुम मुझे जानती हो ,मैं तुम्हें, तब नाम लिखने की यह अक्लमंदी अब मत करना। तुम नहीं जानती हो ,एक बार लड़की की बदनामी हो जाये तो उसके साथ -साथ ,उसके घरवालों को भी बहुत कुछ झेलना पड़ जाता है। अब इस तरह का कार्य ही क्यों करना ?इस पत्र को देने ,मैं तुम्हारे घर ही आऊंगा और फिर तय करेंगे कि जब तक हम  एक नहीं हो जाते ,तब तक इन पत्रों को कैसे एक दूजे तक पहुंचाना है ?तुम्हारा सिर्फ तुम्हारा -मास्टरजी ! 

लिखकर चतुर मुस्कुरा दिया ,अब उसके मन को थोड़ी शांति मिली थी। अब पत्र को अपने बस्ते में सहेजकर चतुर संतुष्ट हो गया और पढ़ने का प्रयास करने लगा ,किन्तु कस्तूरी तो जैसे उसकी यादों में ,उसी बातों में समा गयी थी। पुस्तक पढ़ने के लिए उठाई किन्तु मन नहीं लगा ,सोचा -यहाँ रहकर ही क्या हो जायेगा ?इससे तो अपने दोस्तों संग ही खेल लिया जाये। बहुत दिन हो गए ,''क्रिकेट का मैच ''नहीं हुआ क्यों न आज एक मैच ही हो जाये ,सोचते हुए घर से निकल गया और अपने दोस्तों को इकट्ठा करने लगा। सबसे पहले उसे कलुआ ही मिला था ,कलुवे को चतुर के साथ देखकर हरिराम ने पूछा -क्यों रे कल्वे  कहां जा रहा है ?

चाचा !आज सोच रहे हैं ,बड़े मैदान में, एक मैच हो जाए। 

क्या क्रिकेट खेलने जा रहे हो ? तुम्हारी टीम कहां है ? वही तो लेने जा रहे हैं, जब लड़के लायेंगे  तभी तो टीम बनेगी। 

ठीक है, जब मैच शुरू हो जाए तो हमें भी बुला लेना। कुछ इनाम वगैरा रखे हो या नहीं। 

यह तो बाद में ही तय होगा, कहते हुए कलुवा और चतुर आगे बढ़ गए। वैसे कलवे का नाम ''कलवा ''नहीं है , नाम तो उसका मोहित है किंतु उसके काले रंग को देखते हुए, सभी उसे' कलवा' ही कहते हैं और एक बार गांव में जो नाम पड़ गया ,सो पड़ गया। 

चिराग ! ओ चिराग ! क्या घर में है ?

कौन है ? चिराग की बहन यह देखने के लिए बाहर आई , और पूछा- क्या बात है ? उसे क्यों बुला रहे हो ?

हमें उससे ही कुछ पूछना था ? चतुर ने उसकी बहन से खेल के विषय में कोई बात ही नहीं की, न जाने वह उसे जाकर क्या उल्टा -सीधा समझाये ?

कोई कार्य हो तो, मुझे बता दो ! मैं उससे कह दूंगी। 

नहीं, तुम उसे ही बाहर भेज दो !

ठीक है , कहकर वह अंदर चली गई, कुछ देर पश्चात ही चिराग बाहर आया और पूछा -क्या बात है ? क्यों परेशान घूम रहे हो ?

हम सोच रहे थे -चल ! आज एक मैच हो जाए !

अब इस वक्त ! 2 घंटे बाद तो दिन ही छिप जाएगा, यह कोई मैच का समय है। अभी सारे लड़के भी इकट्ठे  करने हैं, कल देखते हैं, चिराग अलसाते  हुए बोला। 

कल कैसे खेल होगा ? कॉलेज नहीं जाएंगे। 

तू न जाने कौन सी दुनिया में रहता है ? कल की छुट्टी है ?कल सुबह 8:00 बजे ही बड़े मैदान में आ जाना तब मैच होगा। 

कल क्या मैच होगा ?क्या ?चतुर और कस्तूरी के पत्रों का सिलसिला चलता रहेगा या फिर उससे पहले ही ,विराम लग जायेगा। अब हमारे चतुर भार्गव की ज़िंदगी कहाँ तक पहुंचती है ?क्या वो आकाश की ऊंचाइयों को छू पाता है ?जानने के लिए ,अपनी समीक्षाओं द्वारा उत्साहवर्धन करते हुए -पढ़ते रहिये ''रसिया ''

 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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