Rasiya [part 44]

पीढ़ी दर पीढ़ी ,यही होता चला रहा है ,कुछ रस्में हैं , कुछ रीति -रिवाज हैं जो हम लोग, अपने बड़ों की  आज्ञानुसार या उनको देखकर उनका अनुसरण करते रहे हैं ,किंतु कई बार ऐसा होता है ,हम कोई रीति रिवाज या रस्म कर रहे हैं ,लेकिन हमें उसके विषय में कुछ भी मालूम नहीं है ,कि हम यह, रस्म क्यों निभा रहे हैं ? यह विचार चतुर और चतुर के दोस्तों के मन में भी आता है किंतु अक्सर माता-पिता अपनी परेशानियों से ही बाहर नहीं निकल पाते हैं , उनके पास इतना समय ही नहीं होता है कि वह समय निकालकर अपने बच्चों की जिज्ञासा को शांत कर सकें। जिसके कारण बच्चे, कई बार अपने आप ही ,उन रस्मों और रीति-रिवाजों  का स्वयं ही अर्थ निकाल लेते हैं। कई बार अर्थ का अनर्थ भी हो जाता है और कई बार हास्य -व्यंग भी बन जाता है। यह बातें हंसी -मजाक में चलती रहती हैं  किंतु क्या यह सही है ?कि अपने बच्चों को अपने ही संस्कारों की रीति रिवाज की जानकारी न देना ,उन्हें इन चीजों से अनभिज्ञ रखना। 

 माता-पिता को अपने बच्चों के लिए और उन्हें समझाने के लिए समय निकालना ही चाहिए ,ताकि वह-अपने ही रीति-रिवाजों  का संस्कारों का परिहास न करें। बात कहाँ से निकलकर कहाँ पहुंच गयी ?मयंक एक प्रश्न अपने दोस्तों से पूछता है -कि कौन एक दिन का राजा बनना चाहता है और कौन हर दिन का राजा !यह बात और यह प्रश्न सोचने वाला है और सभी दोस्त सोचते भी हैं किंतु सब के जवाब अपनी-अपनी सोच के आधार पर अलग-अलग,उस प्रश्न का अर्थ  निकालकर लाते हैं , उनकी सोच के आधार पर....... 

तब सुशील कहता है-  मैं तो एक दिन का राजा ही बनना पसंद करूंगा। यही तो जिंदगी है, हमारे बड़े बूढ़ों  ने भी तो यही किया, एक दिन का राजा बनकर ही उनका क्या बिगड़ गया ?अपनी घर -गृहस्थी  में सुकून से जी तो रहे हैं ,इसमें बुराई ही क्या है ?

तुम्हारी बात भी अपनी जगह सही है और तुम में से कोई दूसरा बताएगा - कि उसकी क्या विचारधारा है ?

देखो !मैं कभी भी एक दिन का राजा नहीं बनना चाहूंगा क्योंकि मुझे पता है, एक दिन का राजा बनकर उसके पश्चात क्या हालत होती है ?जब पेट भरने को रोटी नहीं मिलती ,परिवार उसकी तरफ आशाओं से देखता है तब मुझे ही पता है ,कि उस आदमी की कैसी हालत होती है ?तो इसलिए मैं सबसे पहले यही कोशिश करूंगा ,मेरा प्रयास तो यही रहेगा कि मैं पढ़ -लिखकर सबसे पहले ,अपने परिवार को एक सुकूनभरी और एक खूबसूरत जिंदगी दे सकूं मुझे इस चीज में भी कतई भी विश्वास नहीं है ,कि एक दिन का राजा बनो !और फिर जीवन भर तड़पते रहो ! यह तड़पन  स्वयं की भी नहीं होती, जिस महिला को हम राजा बनकर ,अपने गरीबख़ाने कहो या फिर महल में लेकर आते हैं वह भी तो हमारे साथ उस जिंदगी को जीती है ,तड़पती है। भला ,उसकी इसमें क्या गलती है ?चिराग़ ने जबाब दिया। 

तू तो कुछ ज्यादा ही भावुक हो गया ,यह तो हंसी -मजाक की बातें  चल रही है , मयंक,चिराग़ से बोला  

चलो ,भाई !यह तो इसके लिए तो काफी गंभीर विषय बन गया है ,मेरे विचार से तो इसके लिए जिंदगी का प्रश्न ही बन गया है कोई और है जो मेरे दिए प्रश्न पर अपने विचार व्यक्त कर सके। 

अरे ,दोस्तों ! आओ चलो ! हरिया काका की टयूबवैल चल रही है ,ठंडा पानी पीते हैं ,और कुछ पल यहीं विश्राम करेंगे तन्मय बोला। 

तू क्यों ,हमारी गोष्ठी को बर्बाद कर रहा है ?अभी मेरी प्रश्नोत्तरी चल रही है। 

हाँ -हाँ ,मैंने कब इससे इंकार किया है ?किन्तु प्यास पर तो किसी का प्रतिबंध नहीं है ,थोड़ा गला तर कर लेते हैं ,उसके पश्चात पुनः शुरू हो जाना। अभी ये दोनों अपनी ज़िरह कर ही रहे थे ,बाकि पहले ही वहां पहुंच गए। 

उस शीतल जल में ,अपने पाँव डुबाते हुए ,चतुर बोला -मेरे  विचार से तो जिंदगी जीने का नाम है ,''जियो और जीने दो ''प्रसन्न रहो ,और प्रसन्नता दो ! यह जरूरी नहीं कि तुम एक दिन के राजा बने हो तो उसके बाद तुम्हारी सीमाएं तय हो गई हैं अथवा तुम्हारे पंख कतर दिए गए हैं।  मैं तो स्वच्छंद पंछी हूं, स्वतंत्र आकाश में खुले आकाश में उड़ना चाहता हूं और उडूँगा भी.......  और यह भी मत समझना कि मैं विवाह नहीं करूंगा ,मैं विवाह भी करूंगा अपनी कस्तूरी से..... सोचते हुए मुस्कुरा उठा किंतु उसकी सीमाएं भी मेरी होगी, और वह आकाश भी मेरा होगा ऐसा नहीं कि मैं उसे दुःख दूंगा, किंतु अपने आप को भी परेशान नहीं करूंगा। चतुर ने जवाब दिया। 

ऐसा कैसे हो सकता है? कि तुम विवाह भी कर सकते हो और खुश भी रह सकते हो। 

हां, मैं वही तो करके दिखाऊंगा, जो आज तक किसी ने नहीं किया वह मैं करूंगा चतुर ने विश्वास के साथ जवाब दिया। 

यार !तू  हम सबसे अलग सोचता है। 

तभी तो आज मैं तुम लोगों को भी साथ लेकर यहां आ गया हूं वरना तुम लोग गांव में ही, अपने बड़े -बुढों  की तरह ही ,अपने जीवन को वहीं पर समाप्त कर लेते। अब इस खुले आसमान में  बाहर निकालो और देखो कितना विस्तृत और विशाल है ?अपना चेहरा ऊपर की तरफ करते हुए बोला - यह दुनिया कितनी सुंदर है ?उसे देखना सीखो ! बाकी तो जो जिसके नसीब में होता है, उसको वही मिलता है। चलो !अब घर चलते हैं ,ज्यादा देरी हो गयी तो घरवाले नाहक ही परेशान होंगे कहते हुए चतुर ने अपनी साईकिल थाम ली ,उसके पीछे अन्य दोस्त भी उठ खड़े हुए। 

तन्मय ! तुमने कुछ अपने विषय में नहीं बताया। 

तुम अपनी जिंदगी में क्या करना चाहते हो ?

मेरी तरफ से, अब तुम्हारा, प्रश्न बदल गया है ,तन्मय मुस्कुराते हुए बोला

प्रश्न भले ही बदल गया हो, किंतु जवाब तो ऐसा ही आना चाहिए। 

 मैं तो समय की धारा हूं ,उसके साथ ही बहता हूं और बहता रहूंगा। जैसा भी समय आएगा ,मैं उसके साथ अपने आप को ढालता और बदलता रहूंगा। मैं भविष्य की कोई योजना नहीं बनाता। कई बार ऐसा होता है हम कोइ योजना बनाते हैं और हम उसमें सफल नहीं हो पाते हैं। तब हमें निराशा ही हाथ लगती है जिसका हमें दुख होता है , तो मैं ऐसा कोई भी दुख उठाना नहीं चाहता। परिस्थितियाँ  और समय जैसा भी करवायेंगी मैं उसके आधार पर अपने आपको बदलता जाऊंगा। 

स्कूल से आते हुए अचानक, दोस्तों में ,कुछ आपसी बहस हो गई। कुछ प्रश्न मन में उमड़े और उन प्रश्नों के जवाब मयंक अपने दोस्तों से जानना चाहता है , वह जानना चाहता है कि किस दोस्त की कैसी सोच है? और वह अपने जीवन के और भविष्य के विषय में क्या सोचता है ? मयंक की यह प्रश्नोत्तरी आगे भी जारी रहेगी, बने रहिए -रसिया के साथ ! 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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