Rasiya [part 43]

कस्तूरी का पत्र पढ़कर ,चतुर उसके लिए परेशान हो उठा , वह चाहता था -कि उसे समझाएं , इसीलिए वह स्कूल से छुट्टी लेकर उससे मिलने, चला आया। किंतु वह उसे मिली  ही नहीं। वह परेशान हो रहा था न जाने वह क्या सोच रही होगी ? फिर सोचा - क्यों न ,उसके घर ही चला जाऊं, यह सोचकर ,वह जाने कदम बढ़ाने ही वाला था तभी उसे लगा, कि उसके घरवाले पूछेंगे -अभी 2 दिन पहले तो वह मिलकर गया था। तब क्या जबाब देगा ? अचानक ऐसी कौन सी आवश्यकता आन पड़ी ?उसके विद्यालय के आसपास भटकता रहा। अब तो उसके स्कूल की छुट्टी भी होने वाली है और स्वयं चतुर के कॉलेज की भी छुट्टी होने वाली है ,उसके दोस्त उसे ढूंढेंगे, उसकी बेचैनी बढ़ चली किंतु कस्तूरी से मिलना भी आवश्यक है ,लगातार खड़े हुए वहां पर स्कूल से निकलती हुई लड़कियों को देखता रहा किंतु उसे कस्तूरी कहीं दिखलाई नहीं दे रही है। 

परेशानी से इधर -उधर नजरें गड़ाएं देखता रहा,जब वह दिखलाई नहीं दी,तब चतुर ने सोचा - शायद , घर ही चली गई है। परेशानी में वह वापस अपने कॉलेज की तरफ बढ़ चला। यह मैंने क्या कर दिया ? उसका मन बार-बार अपने आप को धिक्कार रहा था कि मैंने  उसे क्यों अपने कॉलेज का नाम बताया ?सही तो हुआ ,अब उसके मन का हाल मुझे मालूम है। ऐसा लगता है,जैसे -हम बरसों से एक -दूसरे को जानते है ,हमारा जन्म -जन्म का साथ है। सारा दिन ऐसे ही परेशानी में कट गया। न ही ,वो दिखलाई दी,न ही अपनी पढ़ाई कर पाया।  दोस्तों के बाहर आने से पहले ही ,वह कॉलेज पहुंच गया। 


आजकल कहां रहता है ? कुछ परेशान सा नजर आ रहा है चिराग़ ने पूछा। 

नहीं ,ऐसी कोई भी बात नहीं है,मेरे नोट्स पूरे नहीं हुए बस इसी बात की चिंता है। 

बस यही बात है ,कुछ और तो नही...... शंकित नजरों से चिराग ने फिर से प्रश्न किया। कहीं कस्तूरी की तरफ से तो कोई परेशानी नहीं। 

नहीं -नहीं ,उसका इन सब बातों से क्या लेना देना ?

किन्तु मयंक तो कह रहा था -आज तुम लोगों के साथ ,उस पुल पर कोई घटना हुई थी ,वैसे हुआ क्या था ?

वो तो ऐसे ही है ,कुछ का कुछ समझ लेता है ,उसे ,उस टूटी दीवार के पीछे किसी का सिर दिख रहा था ,उसे देखकर बोला -हो सकता है ,वहां कोई लड़का -लड़की हों ,चलो ! देखने चलते हैं। अब तुम ही बताओ !हमारे स्कूल  का समय हो रहा है और उसे शरारत सूझ रही थी। अपनी साईकिल को बाहर निकालकर उसे हाथों से और गद्दी के नीचे लगे एक सूती कपड़े से झाड़ते हुए बोला।

तब तक मयंक भी वहां आ चुका था। उसे देखते ही चिराग़ बोल उठा -तूने तो..... हमें टूटी दीवार वाली कोई बात बताई ही नहीं ,तू तो कुछ और ही कह रहा था। 

चतुर ,चिराग़ के शब्द सुनकर चिहुंक उठा और बोला -तब तू किसकी बात कर रहा था ?

अरे कुछ नहीं यार..... ये चिराग़ तो कोई भी बहाना बना तुझसे कुछ न कुछ उगलवाना चाहता है। मयंक नहीं चाहता था ,चिराग़ उसे वो कागज़ का सड़क पर गिरना और बहाने चतुर का उस कागज को सड़क के बीचों बीच से उठाकर लाना ,यह सब मयंक देख चुका था और उसे शक ही नहीं पूर्ण विश्वास था ,कस्तूरी उससे मिलने आई थी। सभी मित्र इकट्ठा हो चुके थे और अपने गांव की ओर बढ़ चले थे। तभी दूर से बाजे की आवाज ने उन्हें चौंका दिया। 

''आज मेरे यार..... की शादी है,यार की शादी है ,मेरे दिलदार की शादी है।'' की धुन पर सभी मुस्कुरा उठे ,अब शादी का सीजन आरम्भ हो गया है ,अब तो शादियां ही शादियां होंगी। खूब दावतें उड़ेंगीं ,मेरे घर तो अभी से कई निमंत्रण -पत्र आये रखे हैं। सुरेश अपनी साईकिल से भीड़ को चीरते हुए आगे बढ़ते हुए कहता है क्योंकि अब तक वो आवाज उनके बिल्कुल करीब आ चुकी थी और भीड़ कुछ अधिक हो गयी थी। आधे छात्र सड़क के इस पार रह गए आधे सड़क पार हो गए वो भी दोस्तों की प्रतीक्षा में ,सड़क किनारे खड़े होकर बैंड -बाजे का आनंद लेने लगे। किसी को आवाज भी नहीं लगा पा रहे थे ,इतने शोर -शराबे में नजदीक खड़े व्यक्ति की आवाज तक सुनाई नहीं दे रही थी। इसीलिए बच्चे भी वहीं खड़े होकर ,उस घुड़चढ़ी का आनंद लेने लगे। दूल्हा घोड़ी पर बैठा था और उसके पीछे महिलाओं का झुण्ड चला आ रहा था और एक महिला छाज लिए पीछे -पीछे जा रही थी। लड़के खड़े होकर ,उन महिलाओं को और साथ में कुछ लड़कियों को जाते देख रहे थे। 

कुछ देर पश्चात वो भीड़ वहां से निकल गयी और सभी मित्र इकट्ठा होकर अपने गांव की ओर बढ़ चले। तभी सुरेश बोला -यार ! एक बात समझ में नहीं आई ,ये घुड़चढ़ी की ''रस्म ''क्यों  करते हैं ?

ले ,यह भी कोई पूछने की बात है, भई ,लड़के का यही दिन तो होता है जो शान से गुजरता है।  बली पर चढ़ा ने से पहले ,उसका जुलूस निकाला जाता है और घोड़ी पर इसीलिए भी चढ़ाया जाता है ,कि आज के दिन का ही, बस वह राजा होता है , उसके पश्चात तो उसे गधे की जिंदगी ही जीनी है , कहते हुए सतीश हंसने लगा। उसकी बात को समझकर अन्य सभी मित्र भी हंसने लगे।


तूने ,यह तर्क अच्छा निकाला ,हमारे गाँव में ही देख लो ! जो घोड़ी पर ,इक बार चढ़ गया ,फिर वो किसी काम का नहीं रहा ,जिसे इतने शान से ब्याहकर लाया ,आज तक उसके आगे -पीछे दुम हिलाते ही घूम रहे हैं ,सतीश ने उन्हें वास्तविकता से परिचित कराते हुए समझाया।  

क्यों ?तुम्हें ऐसा क्यों लगता है ?चतुर ने पूछा। 

इसमें लगना कैसा ?क्या तुम स्वयं अपनी आँखों से नहीं देख रहे हो ,जिसका भी विवाह हुआ वो किसी क़ाबिल नहीं रहा से मेरा तात्पर्य ये है -विवाह के पश्चात न ही ,लड़कियों को ताड़ सकते हैं ,न ही कोई अन्य सपना देख सकते हैं ,बस जिन्हें ब्याहकर लाते हैं ,उन्हीं के ग़ुलाम होकर रह जाते हैं।तभी मयंक को एक हंसी सूझी और बोला -अच्छा !ये बताओ !तुम में से कौन-कौन एक दिन का राजा बनना चाहता है ? और कौन हर दिन का राजा !

युवावस्था की बातें हैं ,अब इस उम्र में सभी दोस्त इस संसार से और उन रिश्तों से परिचित हो रहे हैं। अपने रीति -रिवाजों और संस्कारों के विषय में किसको इतना समय है ? जो उनके अर्थ उन्हें समझाने बैठे ,बस पीढ़ी दर पीढ़ी कुछ रस्में और रीति -रिवाज़ चले आ रहे हैं ,जिनका निर्वहन आने वाली पीढ़ी कर रही है किन्तु किसी को यह नहीं मालूम कि ये सब क्यों करते हैं या कर रहे हैं ? इसी तरह चतुर के गांव यानि ''चांदगाँव ''की आने वाली पीढ़ी भी ,उत्सुकतापूर्वक यह जानने का प्रयास करती है ,आख़िर ये जो भी रस्में हैं ,हम क्यों और किसलिए की जाती हैं ?हम इन्हें मानने के लिए बाध्य क्यों हैं ?अपनी समीक्षा द्वारा इन लड़कों को समझाइये ! पढ़ते और बढ़ते रहिये -रसिया !

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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