दुनिया की अपनी परेशानियां होती हैं, कोई ना कोई अपनी परेशानियों में उलझा रहता है किंतु दिलजलों की दुनिया से परे,अपनी ही परेशानियां होती हैं। इसी तरह कस्तूरी भी ,कुछ उलझनों में उलझी है। वह चतुर से मिलना चाहती है, किंतु मिलने पर, जब उसकी मम्मी ने अपने समाज की और दुनियादारी कि उसे शिक्षा देनी चाही तो वह परेशान हो उठी, और उसी बेचैनी में, चतुर को उसने पत्र लिखा। अब उसने पत्र तो लिख दिया लेकिन अब उसके सामने एक दूसरी समस्या आन खड़ी हुई , यह पत्र लिखा है तो अब चतुर तक कैसे पहुंचे ? साहस करके वह पत्र देने के लिए गई हुई थी किंतु चतुर उसे कहीं भी दिखलाई नहीं दिया। निराश होकर वापस लौट आई किंतु प्यार करने वाले ,इतनी शीघ्र हार नहीं मानते हैं। कस्तूरी भी कुछ ऐसी ही थी, जैसे-जैसे उसके सामने परेशानियां आती जा रही थीं ,उसका निश्चय और दृढ़ होता जा रहा था।
कल तो वह नहीं आया था या फिर मुझे दिखलाई नहीं दिया किंतु आज वह कुछ जल्दी ही आ गई है, कभी तो आता दिखलाइ देगा। वैसे कल क्यों नहीं आया था ? कहीं उसकी तबीयत तो नहीं बिगड़ गई। मैं यहां उससे न जाने, कितनी उम्मीदें लगाए बैठी हूं ?और वह बेचारा ! तभी दूर से साइकिल पर कुछ लड़कों का समूह उसे आता दिखलाई दिया। न जाने , कितने लड़के हैं , वही है या कोई और है ,यह सोचकर, वह शीघ्रता से एक टूटी दीवार की आड़ में छुपकर खड़ी हो गई। जैसे-जैसे वह लड़के करीब आते जा रहे थे, उसके दिल की धड़कनें बढ़ती जा रही थीं। समीप से से 2-3 लड़के निकले उनमें से तो चतुर नहीं था। तभी सबसे पीछे साइकिल पर, उसे चतुर आता दिखलाई दिया किंतु उसके पीछे भी कोई बैठा है , शायद उसका कोई दोस्त होगा ,उसके करीब तो नहीं जा सकती। क्या करूं ? परेशानी से अपने नाखून चबाने लगी। पत्र हाथ में ले लिया जैसे ही वह उस टूटी दीवार के नजदीक से गुजर रहा था। निशाना देखकर, कस्तूरी ने वह पत्र फेंक दिया।
कस्तूरी का यह क़दम बहुत ही जोख़िम भरा था, यह पत्र किसी अन्य के हाथ लगने की संभावना थी और उसमें कस्तूरी का नाम भी लिखा है ,इस बात को वह झूठला भी नहीं सकती।जोश में अपना नाम तो लिख दिया किन्तु अब उसे अपना यह कार्य मूर्खतापूर्ण लग रहा था।
वह कागज सीधे, चतुर की साइकिल के समीप गिरा तब तक चतुर आगे बढ़ चुका था किंतु उसे आभास हुआ जैसे उस पर कुछ गिरा था इसलिए उसने पीछे मुड़कर देखा ,तह बना हुआ एक कागज़ था , उसने अपनी साइकिल धीमी की।
उसकी साइकिल के पीछे मयंक बैठा हुआ था , वह बोला -यहाँ , साइकिल क्यों धीमी कर दी ?
मुझे बड़ी जोरों से लगी है, कहते हुए ,साइकिल को दूसरी तरफ ले गया ताकि मयंक की नजर उस कागज पर ना पड़े और दौड़कर सड़क के करीब जाकर उस कागज को उठाया, अपने आसपास देखा , टूटी दीवार के पीछे उसे एक सर दिखलाई दिया। वह देखने का प्रयास करने लगा, यह कौन हो सकता है ? उसने उस कागज को तुरंत उठा कर अपनी जेब में रख लिया कहीं मयंक पूछने न लगे -'कि यह क्या है ? उस समय ,उसे खोलकर देखना,उसे उचित नहीं लगा किन्तु मन में जिज्ञासा तो थी ,इस तरह सड़क पर, तह लगाकर कागज कोई क्यों फेंकेंगा ?मेरी ही दृष्टि इस पर पड़ी या जानबूझकर मेरे करीब ही फेंका गया।
क्या यह कस्तूरी हो सकती है ? जो इस रास्ते पर आई है, बार-बार उसकी नज़रें उस दीवार के पीछे जाने का प्रयास कर रही थीं किंतु कोई नजर नहीं आया।
तभी मयंक बोल उठा , देख ,जरा !उस दीवार के पीछे कोई है।
कहां ?मुझे तो कोई नहीं दिखाई दे रहा , कहकर चतुर मयंक से बोला -आ, जल्दी बैठ ! हमारे दोस्त काफी आगे निकल गए ,हमें देर हो जाएगी।
चल ,यार !देखे तो सही कौन है ? कहीं लड़के -लड़की का चक्कर तो नहीं ,कहते हुए शरारत भरी नजरों से मुस्कुरा दिया।
जो भी है ,हमें क्या ? कहते हुए आगे निकल गया किंतु उसे मन ही मन विश्वास हो रहा था ,हो ना हो !यह कस्तूरी ही थी किंतु उसे ऐसी क्या आवश्यकता आन पड़ी ? जो इस रास्ते पर, छुपकर आई है। यह रास्ता ऐसा है, अकेले इस तरह लड़की का आना सही नहीं है ,किन्तु कहते हैं ,न...... ''प्यार जो न करा दे ,वही कम है।''
अपने विद्यालय आकर चतुर ने साईकिल खड़ी की और मयंक को कक्षा में जाने के लिए कहा और स्वयं विद्यालय के बग़ीचे में पहुंच गया और पेंट की जेब से वह कागज़ निकालकर पढ़ने लगा। सबसे आरम्भ और सबसे आख़िरी के शब्द पढ़े ,तुम्हारी सिर्फ तुम्हारी कस्तूरी !उन्हें पढ़ते ही,वह उछल पड़ा। जो मैंने सोचा था ,वही बात थी ,उस दीवार के पीछे कस्तूरी ही थी।उसी ने यह पत्र फेंका !अभी पूरा पत्र पढ़ने का समय नहीं ,अभी मेरी कक्षा में ,अध्यापक आते ही होंगे ,सोचकर उस कागज की उसी तरह तह बनाकर ,जेब के हवाले कर दी।
समय मिलते ही ,चतुर ने वह पत्र पढ़ा ,जिसे पढ़कर वह भावुक हो उठा।अचानक ही कॉलेज छोड़कर जाने का निर्णय लिया। मेरे पिताजी की अचानक तबीयत बिगड़ गई है,इसीलिए मुझे अपने घर जाना होगा का बहाना करके अपने अध्यापक से बाहर जाने की प्रार्थना की और जब उसकी बातों को ध्यान में रखकर ,उसे बाहर जाने की सहमति मिल गयी।
वह तेजी से दौड़ते हुए ,बाहर की तरफ निकल जाता है और कस्तूरी के स्कूल के करीब पहुंच जाता है वह उसे समझाना चाहता था - कि उसे इस तरह वहां नहीं आना चाहिए था और उसे विश्वास दिलाना चाहता था कि कस्तूरी मुझ पर विश्वास रखे ,हम दोनों एक होंगे किन्तु कुछ समय दे ताकि मैं सब संभाल सकूँ। अब तो उससे मिलकर ही, सम्पूर्ण बातें तय होंगी। किन्तु उसे कस्तूरी कहीं भी दिखलाई नहीं दे रही थी ,न जाने कहां चली गई है ?बहुत देर तक उसे ढूंढता रहा ,परेशान सा भटकता रहा।
उस सड़क पर ,परेशान हालत में ,इधर से उधर भटक रहा था। ये इश्क़ भी न..... दुनिया से बेखबर,दिलवालों की अपनी अलग ही दुनिया बसती है। दुनिया को कुछ पता भी नहीं ,और दो दिल न जाने कब से प्यार की चाहत में तड़प रहे हैं ?और वे उस अग्न में जलना भी चाहते हैं ,उस अग्नि में ,अपने प्यार को पाने की तड़प है ,मीठा सा इक दर्द है जो इश्क़ के करीब होने का एहसास दिलाता है। हमारी कहानी के नायक चतुर और नायिका कस्तूरी अभी इसी आग में अपने को झुलसा रहे हैं। अपने माता -पिता का इकलौता बेटा !न जाने कैसा दर्द जी रहा है ?कस्तूरी को पाने की चाहत ,उसके वे प्रेम भरे शब्द ,जो कस्तूरी ने पत्र में लिखे , उन्होंने उसे बेचैन कर दिया कि वो आये और अपनी चाहत से मिले।
