Kanch ka rishta [part 34]

प्रभा , करुणा को अपनी कहानी सुना रही है, तब वह बताती है -'कि जब वह किशोर के बच्चे की मां बनने वाली होती है तब वह किशोर से विवाह करने के लिए कहती है , वह उससे कहती है -कि हमारा जो भी रिश्ता है , उसे हमें एक नाम दे देना चाहिए। उसने पहले तो असमर्थता जाहिर की और बोला -तुम जानती हो ,मैं अभी पढ़ रहा हूँ ,मेरे घरवाले तुम्हारे परिवार वालों की तरह पैसेवाले भी नहीं ,मैं तुम्हें कहाँ लेजाकर रखूंगा ?क्या खिलाऊंगा ?

अपनी जगह उसकी बात भी सही थी,करुणा ने समर्थन किया -जो स्वयं तुम्हारे टुकड़ों पर पल रहा था ,तुम्हें क्या खिलाता ?फिर आगे क्या हुआ ?


इस बात पर हम दोनों में बहुत झगड़ा हुआ,मैंने उससे कहा -हम दोनों शादी कर लेते हैं ,किन्तु ऐसे ही रहते रहेंगे ,मैंने उसे ये नहीं बताया था कि मैं उसके बच्चे की माँ बनने वाली हूँ ,तब शायद ज्यादा घबरा जाता। मैं उससे कोर्ट में विवाह करके ,अपने घर ही रहने वाली थी ,यदि किसी को बच्चे के विषय में पता भी चलता तो मैं उन्हें वह सर्टिफिकेट दिखा देती कि मेरा बच्चा नाजायज नहीं है। मैं उसकी या अपनी नौकरी की प्रतीक्षा में थी। उसने मुझे आश्वस्त किया -कि हां ,हम दोनों विवाह करेंगे , और पहले चुपचाप कोर्ट में जाकर शादी कर लेते हैं। मैं अत्यंत प्रसन्न थी, इसी कारण मैं कॉलेज भी नहीं आई थी। मुझे आना भी नहीं था मैं तो अपने किशोर की हो जाती मैं उसकी प्रतीक्षा करती रही किंतु वह नहीं आया। उसे फोन भी किया किंतु उसने फोन भी नहीं उठाया ''पहुंच से बाहर ''आ रहा था। उसके पास अपना कोई फोन भी नहीं था ,उसके दोस्त का नंबर था। 

तब क्या हुआ? क्या किशोर आया या नहीं ....... क्या वह जिम्मेदारियां उठाना नहीं चाहता था ?यदि तू उसे बता देती कि तू उसके बच्चे की माँ बनने वाली है ,तो शायद बच्चे की ख़ातिर ही आ जाता। 

 मैं समझ सकती हूं कि उसके पास पैसा नहीं था किंतु पैसा मेरे पास था कि हम अपने कुछ दिन हम अपने दिन अच्छे से बिता सकते थे किंतु उसे आना ही नहीं था तो वह नहीं आया।

 मैं घरवालों से छुपकर, दुल्हन के वेश में तैयार होकर, कोर्ट के बाहर उसकी प्रतीक्षा कर रही थी। उसने मुझसे कहा था -कि वह आएगा, आज मेरी जिंदगी का बहुत बड़ा दिन था जिसमें मैंने स्वयं अपने लिए निर्णय लिया था। मैं बेचैनी से कभी टहलती, कभी घड़ी में समय देखती ,जिस  वकील से हम मिले थे ,वह भी आ गया था सभी कार्य नियत समय पर हो रहे थे किंतु किशोर नहीं आया। उसकी  प्रतीक्षा करते-करते अब मैं निराश हो चुकी थी। वकील ने भी कहा -'कि मैं ऐसे बहुत से लड़के -लड़कियों को देख चुका हूं, कहीं लड़की धोखा दे जाती है तो कहीं लड़का धोखा दे जाता है। तुम्हारा वह दोस्त भी नहीं आएगा, अब तुम्हें अपने घर चले जाना चाहिए।'

 कितनी उम्मीद से मैं, उसकी प्रतीक्षा में पल-पल गुजार रही थी किंतु वह नहीं आया। मुझे बहुत गुस्सा आया। मन तो किया ,उन वस्त्रों को वही निकाल कर उनमें आग लगा दूं किंतु मैंने धैर्य से काम लिया। मेरा मन नहीं मान रहा था ,कि वह इस तरह 'धोखेबाज 'निकलेगा।  हो सकता है ,उसकी कोई मजबूरी हो। मैंने अपने कपड़े, बदले और उसकी प्रतीक्षा में उसी '' शिक्षण संस्थान ''में पहुंच गई किंतु आज वह वहां भी नहीं आया था। मैंने  अन्य छात्रों से भी, उसके विषय में जानने का प्रयास किया किंतु मुझे किसी ने भी कोई उचित जवाब नहीं दिया। 

अब मेरा धैर्य जवाब देने लगा था, मेरी आंखों में आंसू आ गए, मैं सोच रही थी -शायद ,मैंने उस पर विश्वास करके बहुत बड़ी गलती कर दी थी। उस पर पैसा लूटाया ,उस पर विश्वास किया यह मेरी ज़िंदगी की ,शायद ,बहुत बड़ी गलती थी। यदि उसे मैं पसंद नहीं थी तो मुझे इनकार भी तो कर सकता था ,किंतु हमेशा मेरे साथ रहा और मेरी बातों का कभी उसने विपरीत जवाब नहीं दिया। जिससे अंदाजा लगा पाती कि वो मुझे पसंद नहीं करता।  मैं यही सोचती रही कि वह भी मुझसे मेरी ही तरह प्यार करता है। मुझे जिंदगी इतनी कठिन नहीं लग रही थी, जितनी मुश्किल, उसने मेरे लिए बना दी थी। यदि वह मुझसे  विवाह कर भी लेता तब भी मैं अपने घर ही रहती क्योंकि मैं उसकी स्थिति को जानती थी। उस सर्टिफिकेट से मात्र , इस रिश्ते पर एक जायज मोहर लग जाती और कुछ नहीं था। मैं तो उसे पहले से ही ,अपना मान चुकी थी और उसके प्रति समर्पित हो चुकी थी। 

मैंने दो दिन, तीन दिन ,चार दिन उसकी प्रतीक्षा की, किंतु वह नहीं आया मुझे लग रहा था ,जैसे वह शहर छोड़ कर ही चला गया क्योंकि मैंने उसके दोस्त को भी फोन किया तो वह भी कह रहा था -कि न जाने अचानक कहां चला गया ? एक मन किया कि मैं उसके गांव ही जाकर उसे ढूंढू और उसके घर वालों को बताऊं ! कि इसने क्या किया है ? यह मेरा उसके प्रति क्रोध। यह सब करने को कह रहा था किंतु दूसरे ही पल, मन में विचार आया। अगर उसे ,मुझे अपनाना होता तो मुझे इस तरह प्रतीक्षा नहीं करवाता। अब मुझे स्वीकार कर लेना चाहिए कि उसने मुझे धोखा दिया है किंतु अब मेरे पास एक बहुत बड़ा प्रश्न उठ खड़ा हुआ, आज नहीं  तो कल ,घरवालों को ,भाभियों को पता चल ही जाएगा कि मैं गर्भवती हूं। किस-किस को जवाब देती रहूंगी ? किससे  क्या कहेंगी ?जिस जिंदगी को मैं इतना आसान समझ रही थी अब मुझे उबड़ - खाबड़ और पथरीले रास्ते नजर आ रहे थे। तभी मैंने  कॉलेज जाना भी बंद कर दिया था , अब कॉलेज में पढ़कर ही क्या हो जाता ?यहां तो जिंदगी का सवाल था।  वही हल नहीं हो पा रहा था। तू कहती है -'तूने मुझे ,कभी कुछ नहीं बताया ,बता !ऐसे समय में ,तू मेरे लिए क्या कर सकते थी ? हो सकता है तेरे लिए भी परेशानियां खड़ी हो जातीं। 

हां यह तो है, ऐसे समय में मैं ,शायद उस समय कुछ भी नहीं कर पाती, किंतु मुझे इस बात का भी दुख है कि तू इतनी परेशानियों से जूझ रही थी और मैं समझ ही नहीं पाई। तब आगे क्या हुआ ?कार्ड में तेरे पति का नाम तो नवीन लिखा था ,वो तुझे कैसे मिला ?ऐसे ही प्रश्नों के जबाब लेने के लिए चलिए आगे बढ़ते हैं -काँच का रिश्ता !


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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