Badlati rahi bayar

बयार कई ,मौसम संग बदलती बयार !

मौसम का रुख देख ,खो जाती बयार !

कभी चलती,शिक्षा और ज्ञान की बयार....

चाटुकारों, कैपिटलिस्टों की बढ़ती बयार !


चलती कभी राजनीति की बयार...... 

हो जाती ,विकसित बयार........ 

तो कभी चलती प्रेम की बयार.........  

बहती उसमें प्रेम की धार........ 

कभी आजादी की बयार......

न जाने ,कितने मौसम आये ?

चलती थी ,पहले ताज़ी बयार..... 

अब बहती ,हर कहीं प्रदूषित बयार..... 

मौसम की तरह ही ,बदलती इंसानी बयार.......  !

हर बार अपना अस्तित्व खो, बदलती रही बयार.......

न जाने आज भक्ति या प्रेम की खो गयी बयार..... 

मान -सम्मान आदर की खो गयी बयार....... 

आज न जाने कहाँ ,खोई कितनी ?बयार....... 

मौसम संग ,अपने को बदलती रही बयार...... 

 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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