Kanch ka rishta [part 32]

किशोर जी, करुणा को बहला- फुसलाकर अपने अतीत से पीछा छुड़ाकर ,उसे घर ले तो आए,  वे किसी से  बोले तो कुछ नहीं ,थोड़े, परेशान से रहते। करुणा ने उनसे एक -दो बार पूछा भी था -क्या आपको कोई परेशानी है ?किंतु उन्होंने इन्कार कर दिया।  करुणा भी ,अपनी सहेली के विवाह से और उसकी यादों से बाहर आकर ,अपनी जिंदगी में व्यस्त हो गई , वह सोच रही थी -'कभी फुर्सत से प्रभा से बात ही करूंगी ,क्योंकि अभी तो वह  विवाह के कार्यों से थकी हुई होगी फिर बेटी के ''पग फेरे ''की रस्म करेगी ,तब जाकर कहीं ,उसे थोड़ी चैन की सांस मिलेगी। अभी तक तो उससे ,उसकी ज़िंदगी के विषय में कुछ भी बातें नहीं हो पाईं।  यही सोच कर, करुणा ने बहुत दिनों तक उससे बात नहीं की और एक दिन ,उसने प्रभा को फोन लगा ही दिया। आज तो उसने तुरंत ही फोन उठा लिया। हैलो !

और क्या चल रहा है ? हमारी सखी की ज़िंदगी में करुणा ने अपने पुराने अंदाज में पूछा। 

अब चलना क्या है ?एक बेटी है , उसका विवाह कर दिया ,स्कूल पढ़ाने जाती हूं ,घर आकर आराम करती हूं ,बस यही ज़िंदगी है। 


तूने नौकरी कब से आरम्भ की ?

जब कॉलिज छोड़ा था ,इम्तिहान तो मैं देती ही रहती थी , उसके एक  वर्ष पश्चात ,ही नौकरी भी लग गयी। इस नौकरी ने तो मेरा बहुत साथ दिया है ,कहते हुए वह शायद अपने उन्हीं दिनों में पहुंच गयी थी। 

अच्छा बता !खाने में आज क्या बनाया या खाया ?

करुणा का प्रश्न प्रभा को वर्तमान में ले आया ,तभी उसके प्रश्न पर हंसी और बोली -ये क्या प्रश्न है ?क्या तूने ये पूछने के लिए ही ,मुझे फोन किया है ?

क्यों, इसमें गलत क्या है ?अपनी सखी को वर्तमान में लाने के लिए ,उस अकेली का ध्यान रखने के लिए ,यह प्रश्न आवश्यक है ,क्योंकि जब ये या बच्चे घर पर नहीं होते ,तब मेरा अपने लिए कुछ भी बनाने का मन नहीं करता है और हल्का -फुल्का ऐसे ही कुछ बनाकर खा लेती हूँ। अब तू अकेली है ,तब ये पूछना ,जरूरी  बन जाता है ,आज खाने में, तूने क्या खाया ?

करुणा का तर्क सुनकर ,प्रभा मुस्कुरा दी और बोली -''सहेली हो तो तेरे जैसी ''

हाँ ,तभी तो तूने ,सभी संबंध तोड़कर,अपने को सबसे अलग कर लिया। 

अकेली तो मैं बरसों से हूँ ,किन्तु मैंने जीना नहीं छोड़ा ,गहरी स्वांस लेते हुए प्रभा बोली -अपनी बेटी के लिए जीती रही किन्तु अब उसके जाने के पश्चात ,अपने लिए खाना बनाने का भी मन नहीं करता। वैसे बेटी भी ज्यादा दूर  नहीं गई है, नजदीक ही है किंतु मैंने उससे पहले ही कह दिया था -''यह मत सोचना कि मायका नजदीक है, तो मायके में ही रहूंगी ,अपने परिवार में अपने पति के साथ रहना ,हां किसी परेशानी में या दुख तकलीफ में, अपनी मां को याद कर सकती है। 

यह तूने सही कहा -''बच्चे अपनी गृहस्थी में तभी रहेंगे जब हम, उनकी गृहस्थी में दखलंदाजी नहीं करेंगे। नहीं तो, आजकल जाते ही ,ससुराल में झगड़े होने लगते हैं। 

यह तो अपनी-अपनी सोच पर निर्भर करता है, अब तू ही देख ,मैं कुछ भी नहीं करती थी , सभी कार्य नौकर करते थे और तब भी परेशान ही रहती थी। किंतु अब सभी कार्य में स्वयं करती हूं और समय भी कट जाता है। 

और सुना !तेरे घरवाले कैसे हैं ? तूने तो एक बार भी अपने विषय में कुछ नहीं बताया ,अचानक से ही कॉलिज छोड़कर चली गई थी । 

अब यह सब पूछ कर क्या होगा? जो होना था, सो हो गया। उस कहानी को सुना कर भी क्या हो जाएगा ?मम्मी -पापा अब नहीं रहे। भाइयों के व्यवहार को तो तुम जानती ही हो ,उनके पास तब ही ,समय नहीं था ,जब हम उस घर में रहते थे ,अब तो...... उन लोगों से जैसे कोई रिश्ता रहा ही नहीं ,उसके शब्दों से लग रहा था कि वह उन बातों को याद करना और उनके विषय में बातचीत करना नहीं चाहती।  

क्यों, ऐसा क्या हो गया ?फिर भी ,वे तुम्हारे अपने भाई हैं। फिर भी मैं जानना चाहती हूं कि मेरी सखी ने आखिर कितने कष्ट सहे और उसका विवाह कैसे और किन परिस्थितियों में हुआ ?  घर वालों ने तेरा साथ दिया या नही........ तेरी बातों से लगता तो नहीं है। 

तू तो जानती ही है, कि मेरी बहन का विवाह देरी से हुआ था, पैसा होने के बावजूद भी, कोई लड़का नहीं मिल रहा था इसीलिए मैंने पहले ही सोच लिया था कि अपनी पसंद का कोई लड़का पहले ही ढूंढ लूंगी और घर वालों से बता दूंगी क्योंकि मेरे घरवाले तो क्या ,भाई तो लापरवाह ही थे। मैं अपनी जिंदगी को अपने तरीके से जीना चाहती थी। इंसान सोचता कुछ है और हो कुछ और जाता है किंतु जिंदगी बहुत कुछ सिखा देती है। और धोखा !धोखा तो, जैसे आंखें  खोल देता है, जिंदगी की वास्तविकता से परिचित कराता है। 

कैसा? धोखा !तुझे किसने धोखा दिया ?करुणा ने आश्चर्य से पूछा। 

तू तो जानती ही है ,मैं प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी कर रही थी , मुझे सरकारी नौकरी करनी थी ,एक ''शिक्षण संस्थान ''में तैयारी के लिए जाती थी , वहीं पर मुझे एक लड़का मिला था। बहुत ही आकर्षक व्यक्तित्व वाला इंसान था ,मैं उसे देखकर प्रभावित हो गई, व्यवहार भी उसका अच्छा था, उसे देखकर ही, मैं अपने सपने सजाने लगी थी। 

क्या बात कर रही है ? तब तो मैं भी ,तेरे साथ ही पढ़ती थी ,तूने तो मुझे यह बात कभी नहीं बताई। 

बताना नहीं चाहती थी इसीलिए नहीं बताई , मैं सोच रही थी -जब मेरी बात बन जाएगी , तब मैं तुझे अपने उस दोस्त से मिलवाऊंगी

फिर क्या हुआ ?

मेरा उस पर विश्वास बढ़ता गया, और इतना अधिक बढ़ गया कि मैं उसके साथ ,अपने भविष्य को लेकर सुंदर सपने सजाने लगी। मैं उम्मीद करती थी ,कि वह भी नौकरी करेगा और मैं भी नौकरी करूंगी मेरे परिवार की ,मेरे पापा की दौलत ,मेरे काम न आई तो हम दोनों मेहनत करके अपनी ' जिंदगी का सफर' आगे तय करेंगे। 

क्या लड़का ऐसा नहीं सोचता था ?

उसने कभी मुझसे कहा तो नहीं था लेकिन मुझे लगता था -कि वह भी मुझसे प्यार करता है और वह भी मेरी जैसी सोच रखता होगा, हम दोनों एक दूसरे के करीब आ गए थे तो लगता नहीं था वह मुझसे  कुछ छुपाएगा। न ही, मैं उससे कुछ छुपाती थी। 

प्रभा की कहानी में ऐसा क्या है ?जो हमें आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित करता है , उसके विषय में जानना चाहता है।  क्या उसका विवाह ,अपने उस दोस्त से हो पाया ? क्या विपरीत परिस्थितियों में उसने उसका साथ दिया या नहीं। उसका पति कौन था ? ऐसे अनेक प्रश्न है जिनका उत्तर जानने के लिए हमें अगला भाग पढ़ ना होगा , पढ़ते रहिए -''कांच का रिश्ता''

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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