प्रभा ,करुणा को अपनी ज़िंदगी के विषय में बताना आरम्भ करती है और तब यह बात ,करुणा को विचलित करती है ,कि मैं भी ,उस समय प्रभा के साथ पढ़ती थी किन्तु उसने मुझसे कितनी बड़ी सच्चाई छुपाई ?कितनी बड़ी बात लिए बैठी थी ,आज तक तूने मुझे कभी बताया ही नहीं कि तेरा किसी के साथ चक्कर भी चल रहा था। उसकी कहानी में दिलचस्पी लेते हुए करुणा शिकायत भरे लहज़े में बोली।
एक बार उस ''शिक्षण संस्थान'' की तरफ से हम लोग देहरादून घूमने भी गए। मुझे बड़ा अच्छा लगा। एक बार हम दोनों ने, स्वयं ही घूमने की योजना बनाई। तू जानती ही है ,मेरे पास पैसे की कभी कमी रही नहीं थी और जब किसी पर प्यार और विश्वास बन जाता है तो उससे धोखे की उम्मीद भी नहीं की जाती है ऐसा ही कुछ प्यार और विश्वास मेरा 'किशोर 'पर बन गया था।
1 मिनट 1 मिनट !रुक जा !तूने क्या नाम बोला ?
किशोर !
कितना बड़ा संयोग है ? यही तो मेरे पति का भी नाम है ,जिनसे मैं तुझे मिलवाना चाहती थी और वो मिल नहीं पाए।
अच्छा !प्रभा ने ऐसे कहा ,जैसे उसे यह बात सुनकर आश्चर्य हुआ हो। फ़ीकी सी मुस्कान से बोली -मेरा किशोर तो धोखेबाज निकला, कम से कम तेरा किशोर तो अच्छा होगा।
अच्छा नहीं, वह बहुत अच्छे हैं ''करोड़ों में एक ''करुणा ने अपनी बात पर जोर दिया।
अच्छा !तू अपने किशोर की कहानी बता !आगे क्या हुआ ? हम दोनों एक बार अकेले ही घूमते हुए, देहरादून निकल गए। घर वालों को पता था, कि मैं कॉलेज की तरफ से जा रही हूं। किसी ने जानने का प्रयास भी नहीं किया कि लड़की कहां है और कहां जा रही है ? किसी को समय ही नहीं था। मेरे भाई ,भाभियों के संग जगह-जगह हनीमून का कार्यक्रम बनाते थे ,तब मुझे भी ऐसा ही इच्छा होती थी कि मैं भी कहीं घूमने जाऊं। मुझ पर किसी तरह की पाबंदी भी नहीं थी ,तब मैं किशोर को लेकर घूमने निकल गई। उस समय किशोर ही मुझे अपने सबसे करीब और सहारा नजर आता था। हमने पहले दो कमरे लेने की बात कही किन्तु हमें शक़ की नजर से देखा गया ,तब हमने अपने को पति -पत्नी बताकर ,रात्रि बिताने के लिए एक कमरा ही ले लिया। उस एकांत कमरे में हम दोनों अकेले थे।
क्या बात कर रही है ? करुणा ने आश्चर्य से पूछा -फिर क्या हुआ ?
मुझे थोड़ी घबराहट तो थी किंतु मेरा किशोर, मेरे साथ था। वह मुझे अपना लगने लगा था ,ऐसा लगता था- जैसे हमारा जन्मों - जन्मों का रिश्ता है। बस यह समझ ले ,हमारा विवाह ही नहीं हुआ था किंतु मैं उसके लिए सब करने को तैयार थी , वही मेरे लिए सबकुछ था ,यहां तक कि मैं उसके लिए जान भी दे सकती थी लेकिन इसकी नौबत ही नहीं आई। उस एकांत कमरे में ,इतना सन्नाटा लग रहा था ,हमारे दिलों की धड़कनें जैसे हम दोनों सुन पा रहे थे। उस एकांत कमरे ने ,हमें एहसास करा दिया कि हमारे दिल धड़कते भी हैं। एक अलग ही अनुभव था,किशोर बोला - देखो !मेरा दिल कितनी जोरों से धड़क रहा है।
हाँ ,मुझे भी कुछ ऐसा ही एहसास हो रहा है ,शायद एक- दूजे के लिए धड़क रहे हैं ,कहते हुए मैंने उसका हाथ पकड़ा और अपने सीने रखा। उस दिन मुझे एहसास हो रहा था ,कि माता-पिता बेटियों को ऐसे अलग क्यों नहीं जाने देते ?या लड़कों से अलग क्यों रखते हैं ? तब भी मैंने अपने पर नियंत्रण रखा। हम सफर से थके हुए थे। किशोर नहाया और नहाकर, नीचे भोजन के लिए कहने चला गया।उसके पश्चात मैं नहाने लगी, किंतु मुझे मालूम था कि वह वापस आएगा ,तब मैं बाथरूम में होगी तो दरवाजा कौन खोलेगा ? इसीलिए मैंने दरवाजे को लॉक नहीं किया था और किशोर आ गया ,मैं तौलिये में थी। वह मेरे सामने खड़ा था मैं नहा कर ही निकली थी। वह मुझे अपलक देखे जा रहा था ,मेरे भी दिल की धड़कनें बढ़ती गईं । अपने पर बहुत काबू किया ,तभी दरवाजे पर आहट हुई और मैं बाथरूम में चली गयी। वेटर खाना लेकर आया था,जब वो भोजन रखकर चला गया,तब मैं अपने नाइट सूट में बाहर आई। हम दोनों एक दूसरे से नजरें चुरा रहे थे। दोनों के मन की हालत लगभग एक जैसी ही थी। हमने भोजन किया और आराम करने लगे। मैं अपने में सिमटी जा रही थी और पलंग के एक कोने में खिसककर लेट गयी और सोने का प्रयास करने लगी।
कुछ देर पश्चात मुझे अपने शरीर पर,अंगुलियां और हाथ रेंगते महसूस हुए ,जिन धड़कनों को मैं ,इतनी देर से शांत करने का प्रयास कर रही थी उनकी गति फिर से तीव्र हो गयी। मैंने उन हाथों को ,उस स्पर्श महसूस किया। कमर से होते हुए ,वे हाथ मेरे सीने तक आ गए ,तब मुझे लगा -यह गलत हो रहा है। मैं दो विरोधी चुनौतियों से लड़ रही थी। मन और तन कह रहे थे -जो हो रहा है, हो जाने दो ! और बुद्धि उसका विरोध कर रही थी ,नहीं ,यह सब गलत है ,विवाह से पहले यह सब सही नहीं है। जब विवाह किशोर से ही होना है ,तब पहले क्या और बाद में क्या ?मैं अभी इसी क़शमक़श में थी। तभी किशोर ने मुझे कसकर अपनी बाजुओं में भर लिया और मेरे सूट के आगे के बटन खोलकर मुझे अपने सीने में छुपा लिया। उसके सीने से लगते ही ,बुद्धि ठगी सी रह गयी क्योंकि मन और तन विजयी होते नजर आ रहे थे।
मैंने भी अपने को ,किशोर के हवाले कर दिया,वो सुखानुभूति ! मुझे लग रहा था ,जैसे मैं स्वर्ग के सिंहासन पर विराजमान हूँ और किशोर मेरे ''प्रेम का देवता ''मैं आकाश में उड़ रही थी। पहले हमने एक रात्रि ही उस होटल में ठहरने का कार्यक्रम बनाया था किन्तु अब दो रात्रि और रुके। जब मन बेईमानी पर आ जाता है ,तो बहुत ही होशियार हो जाता है। मैंने भी घरवालों को फोन पर पहले ही सूचना दे दी -अपनी सहेली के यहाँ हूँ ,अभी दो दिन और लग जायेंगे। अब अपने को नियंत्रित करने से कोई लाभ भी नहीं था ,तब क्यों न खुलकर प्रेम का आनंद लिया जाये ? मैं तीन दिनों तक अपनी '' प्रेम क्रीड़ा ''में लिप्त रही और उसके पश्चात हम दोनों वापस आ गए।
तब किशोर से ही तेरा विवाह हो गया होगा, इसलिए तो अचानक गायब हो गई थी करुणा ने अंदाजा लगाया।
नहीं ,तब गायब नहीं हुई थी, उस बात को तो बहुत समय हो गया था ,लगभग दो-तीन महीने, जब मुझे पता चला कि मैं मां बनने वाली हूं। तब मैंने किशोर पर दबाव बनाया कि किसी भी तरह वह मुझसे विवाह करके, चाहे कोर्ट में ही कर ले ,या किसी मंदिर में विवाह कर ले किंतु हमारे इस रिश्ते को एक नाम दे दे।
आगे क्या हुआ? उत्सुकता से करुणा ने पूछा।
यही उत्सुकता हमें अगला भाग पढ़ने के लिए प्रेरित करती है ,तब आइये !आपकी सुंदर समीक्षाओं के संग मिलते हैं ,अगले भाग में -''कांच का रिश्ता ''।
