Kanch ka rishta [part 29]

करुणा अपने दोस्त की बेटी यानी प्रभा की बेटी के विवाह में प्रसन्नता पूर्वक अपने परिवार के साथ जाती है। वे लोग उस स्थान पर प्रवेश करते हैं , करुणा की नजरें अपनी दोस्त प्रभा को ढूंढ रही थीं । वह तो बरसों पहले की छवि उसकी नजरों के सामने थी किंतु इस बात को लगभग 2० -२२  वर्ष हो गए , अब न जाने वह कैसी दिखती होगी ? उसका कद  ज्यादा ऊंचा तो नहीं था। यही कोई पांच फीट 2 इंच या ढाई इंच की रही होगी। बाल लंबे थे किन्तु उन्हें खुले रखती थी। अब न जाने कैसी दिखती होगी ? सोचते हुए ,आगे बढ़ रही थी। पहले यह तो तय हो जाए ,कि हम सही जगह पर पहुंच गए हैं। तभी करुणा ने एक मझौले से कद की , थोड़ी तंदुरुस्त महिला को देखा, उसके कंधे तक बाल कटे हुए थे, देखने में आकर्षक लग रही थी।  वह आते-जाते लोगों का स्वागत कर रही थी। करुणा उसे दूर से खड़ी, देखकर पहचानने का प्रयास कर रही थी। तभी उसे स्मरण  हुआ कि फोन कब काम आएगा ?और उसने जो नंबर 'निमंत्रण कार्ड 'पर था इस नंबर से अपना फोन लगा दिया। घंटी बजते ही, उस महिला ने फोन उठाया। करुणा समझ गई कि सामने खड़ी महिला ही,प्रभा है। 


कितने वर्ष हो गए , इंसान कितना बदल जाता है ? पहचान में ही नहीं आ रही थी, दूर से खड़े ही, करुणा ने हाथ हिलाया,फोन काटकर ,करुणा आगे बढ़ी और करुणा ,उसे देखते ही बोली -प्रभा  !तू कितनी बदल गई है? मैं तो पहचान ही नहीं पाई। प्रभा के गले में ,सोने का कीमती हार था ,जिसमें शायद हीरे जड़े थे ,महंगी सिल्क की साड़ी थी ,आज भी उसके रहन -सहन से ,उसका स्तर पता चल रहा था। 

समय सब बदल देता है, उसने छोटा सा जवाब दिया किंतु उसमें गहराई बहुत अधिक थी। बदल तो तू भी गयी है। आने में बहुत देर लगा दी,कुछ देर पहले या एक दिन पहले नहीं आ सकती थी,लड़की की मौसी है और मेहमान की तरह आई है। 

उसके इन सवालों का करुणा के पास कोई जबाब नहीं था ,उसे लग रहा था ,ठीक ही तो कह रही है ,मैंने ही इसकी सहेली होने का कौन सा फ़र्ज निभा दिया ?किन्तु वह एहसास कुछ क्षण ही रहा, तभी करुणा बोली -तूने तो  अपना अता -पता भी नहीं दिया ,कहाँ है ? क्या कर रही है ? कब विवाह हुआ ?तू तो गायब ही हो गयी थी। मेहमान आ जा रहे थे ,और प्रभा उनके प्रति भी अपना कर्त्तव्य पूर्ण कर रही थी। करुणा को लगा ,ये समय शिकवा -शिकायतों का नहीं है ,इसलिये प्रभा से बोली -अब आ गयी हूँ ,तो मेरे लिए कोई कार्य हो तो बताना। 

कोई कार्य नहीं है ,बस तू जाकर खाना खा ले ,वो मुस्कुराते हुए बोली -क्या बच्चे और जीजा जी नहीं आये ?

आये हैं ,कहते हुए करुणा ने घूमकर पीछे देखा तो वहां कोई नहीं था। हमें बातें करते देखकर ,शायद अंदर चले गए हैं करुणा अंदाजा लगाकर बोली।  

अभी मैं यहां संभालती हूं , इतने तुम भोजन करो ! विवाह के पश्चात आराम से बैठकर बातें करेंगे। 

करुणा को भी यह उचित लगा और वह अपने बच्चों को और अपने पतिदेव को ढूंढते हुए, उस भीड़ में आगे बढ़ गई, न  जाने  यह लोग कहां चले गए ? मुझे बताया भी नहीं, बहुत देर से घर से निकले हैं, किशोर जी को तो बहुत जल्दी भूख भी लग जाती है। तो सोचा होगा जब तक ये  दोनों सहेलियां बातें कर रही हैं, तब तक हम कुछ पेट पूजा कर लेते हैं। तभी करुणा के बेटे ने ही उसे ढूंढा, और पूछा  -मम्मी !आप यहां कहां रही हैं? चलकर भोजन कर लीजिए। 

हाँ -हाँ मैं ,आ रही हूं , सभी साथ में भोजन करते हैं ,तब करुणा अपने बच्चों से कहती है -आओ ! तुम्हें अपनी सहेली से मिलवाती हूं, कहते हुए उन्हें अपनी सहेली से मिलवाने के लिए साथ लेकर चल दी किन्तु अब वह उस स्थान पर नहीं थी। प्रभा को  ढूंढने लगी, कुछ देर पश्चात ही, गाने की धुन सुनाई देती है , तब करुणा अंदाजा लगाती है, हो सकता है, शायद '' जयमाला ''की रस्म हो रही है, चलो !वहीं चलते हैं। इतने वर्षों से शादी -विवाह में जाने का, करुणा का अनुभव है उसका अनुमान सही था। उनके नजदीकी रिश्तेदार और मेहमान वहीं पर थे। लड़के वालों की तरफ से ज्यादा, शोरगुल हो रहा था। गुलाबी रंग के लहंगे में, उसकी बेटी बहुत ही प्यारी लग रही थी। बेटियां तो सभी प्यारी होती हैं, सोचते हुए ,उसने अपनी बेटी की तरफ देखा और अपने बच्चों को साथ में लेकर , वही पर पंक्ति में लगाई गईं कुर्सियों पर बैठ गई किंतु किशोर जी कहीं नजर नहीं आ रहे थे। न  जाने कहां घूम रहे हैं ?

शोर -शराबे के साथ जयमाला की रस्म हुई और धीरे -धीरे मंच से लोगों ने उतरना आरम्भ कर दिया। मंच पर दूल्हा -दुल्हन ही रह गए। भीड़ कम होने के पश्चात,सभी रिश्तेदार,और जानने वाले दूल्हा -दुल्हन को आशीर्वाद देते हुए ,फोटो खिंचवाने लगे। प्रभा भी, करुणा को ढूंढते हुए बोली -आजा !परिवार के साथ एक फोटो हो जाये ,तेरे मियां जी कहाँ है ? तूने अभी तक उनसे भी नहीं मिलवाया कहाँ हैं ?आ जाओ !बेटी के साथ एक फोटो खिंचवा लो !

हाँ अभी बुलाती हूँ ,अपने बेटे सुमित से बोली -जाओ !अपने पापा को बुला लाओ !अपने पापा से कहना उनकी साली ने बुलाया है ,कहते हुए ,प्रभा की तरफ देखकर मुस्कुरा दी। 

तब तक हम भी तो अपने बच्चों के साथ अपनी तस्वीरें खिंचवा लेते हैं ,कहते हुए ,करुणा को लेकर मंच पर गयी और अपनी बेटी से करुणा का परिचय करवाया। यह सब देखकर आज करुणा को एहसास हो रहा था। हम अपनी उम्र से कितने आगे निकल आये हैं ?बच्चे बड़े हो गए और हम भी अपने संघर्षो और जीवन की लड़ाई लड़ते उम्र के लगभग दो पड़ाव पार कर चुके हैं ,समय भागता नजर आ रहा था।सब कुछ पीछे छूटता नजर आ रहा है। समय के साथ चलने का प्रयास करते हुए भी उसे पकड़ नहीं पा रहे हैं। इक अलग ही अनुभव था ,जो इस उम्र में हर व्यक्ति को पहली बार ही होता है। जब वो शिक्षा ग्रहण करते ,विवाह और बच्चे होने के पायदान को पार करते हुए ,माता -पिता बन अपना कर्त्तव्य पूर्ण करते हुए कब सास -ससुर बन वृद्धावस्था की उस दहलीज को पार कर जाता है ?उसे पता ही नहीं चलता ,आज ऐसी ही कुछ अनुभूति करुणा को हो रही थी।  

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

Post a Comment (0)
Previous Post Next Post