करुणा ने, अपनी सहेली प्रभा को फोन तो किया था किंतु प्रभा के व्यवहार के कारण ,उसे कुछ,प्रसन्नता नहीं मिली। करुणा को ,अब उसे फोन करना, उचित नहीं लगा। जैसे- बरसों पश्चात कोई सहेली मिलती है, और प्रसन्नता जाहिर करती हैं ,ऐसा कुछ भी नहीं था और न ही, उसने करुणा के विषय में कुछ जानना चाहा। प्रभा के रूखे बर्ताव को महसूस करके,करुणा का उत्साहित मन उदास हो गया। उसे प्रभा से इस तरह के व्यवहार कोई उम्मीद ही नहीं थी कि वह उससे इस तरह का ठंडा और रुखा व्यवहार करेगी। जब अपनी सोच के अनुरूप कोई कार्य नहीं होता,तब मन में नकारात्मक विचार आने स्वाभाविक हैं। निराशा से भरी,करुणा सोचने लगी-'' यदि उसे मिलना ही नहीं था, या उसे अपनी दोस्त से मिलने में कोई दिलचस्पी ही नहीं थी ,तब उसने, यह ''निमंत्रण पत्र ''देकर ही क्यों एहसान किया ?'' पास ही मेज पर रखे हुए ,उस ''वैवाहिक निमंत्रण पत्र ''को देखते हुए सोचने लगी। कम से कम उसके व्यवहार से इस तरह मन में ,दुख तो नहीं होता। फोन पर बात करने से पहले ही ,मन में एक खुशी थी कि मेरी कोई सखी थी , जो बरसों पहले मुझसे बिछड़ गई किंतु अब तो उससे बात करके मन उदास ही हो गया।
शाम को जब किशोर जी घर पर आए और बातों ही बातों में करुणा से उन्होंने पूछा-कि क्या उसकी सहेली से उसकी बात हुई थी। प्रभा का जिक्र आते ही, करुणा का चेहरा उदास हो गया। उसका उदास चेहरा देखकर ,किशोर जी बोले -क्यों क्या हुआ ?क्या उसने फोन नहीं उठाया या तुम्हारी बातें नहीं हो पाईं ?
नहीं ,सब ठीक ही था, उसकी बातों को वह आगे बढ़ाना ही नहीं चाहती थी, क्योंकि जब उसने उसे फोन किया था , तब उसका मन अत्यंत हताश हुआ था इसलिए वह उस बात का जिक्र ही नहीं करना चाहती थी।वह यह भी सोच रही थी -कहीं किशोर जी ही उसे ताना न मारने लगें ,तुम तो अपनी सहेली की बड़ी प्रशंसा कर रहीं थीं। इसीलिए बात को आगे बढ़ाना नहीं चाह रही थी।
करुणा के चेहरे पर नजर गढ़ाते हुए, किशोर जी बोले -तुम्हारी बातों से और तुम्हारे चेहरे से तो नहीं लग रहा।
अपने मन की ग्रंथि को करुणा अधिक देर तक बांधकर न रख सकी और किशोर जी से बोली -जब मैंने उसे फोन किया तब मुझे लगा नहीं कि उसे मुझसे मिलकर या बात करके प्रसन्नता हो रही है। पहले तो फोन ही नहीं उठाया था, उसके पश्चात उसने व्यस्तता जाहिर की किंतु आने के लिए अवश्य पूछा।
हां, ठीक ही तो है, बेचारी अकेली है,' सिंगल मदर' है, न जाने कैसे-कैसे सब संभाल रही होगी ? बेटी का विवाह है, कोई हंसी मजाक नहीं , अवश्य ही व्यस्त होगी इसीलिए तुम्हें समय नहीं दे पाई , सोचा होगा -जब तुम उससे मिलने आओगी तब तुमसे खुलकर बातें होगीं।
हां , यह भी हो सकता है, तुरंत ही करुणा के विचारों में परिवर्तन आया, और बोली -शायद ,आप सही कह रहे हैं। यदि उसे मुझसे मिलना नहीं होता या मुझसे बात नहीं करती होती ,तो उसे क्या आवश्यकता थी कि मेरा पता लेकर मुझे ''निमंत्रण पत्र ''भेजें, मैं उसके यहां जाऊं या न जाऊं क्या फर्क पड़ता है ? किंतु वह मुझसे मिलना चाहती है और चाहती है कि मैं उसकी खुशी में शामिल होऊं , दुख में शामिल तो न हो सकी , हो सकता है, फोन पर वह यह सब बातें न करना चाहती हो। तुरंत ही, सकारात्मक विचारों ने करुणा के हृदय को छुआ और उसके मन में फिर से प्रसन्नता की लहर दौड़ गई , अपने पति किशोर जी को उसने बड़े आदर भाव की नजरों से देखा ,इन्होने कितनी समझदारी से मेरे मन की उलझन सुलझा दी ,सोचते हुए ह्रदय प्रेम भाव से भर गया।
तब वह बोली -अच्छा !अब आप ही उसकी बेटी के लिए ,कोई अच्छा सा उपहार बता दीजिये।
वैसे ,मुझसे पूछने से पहले तुमने क्या सोचा था ?
मैं क्या सोचूंगी ?उसकी बेटी के लिए साड़ी और कुछ कपड़े रख लिए हैं।
मेरे विचार से तो कुछ सामान दे दो !उसके काम भी आएगा।
वही तो समझ नहीं आ रहा ,उससे बात हो जाती तो शायद मैं कुछ सोच पाती ,उसका क्या बज़ट है ?बेटी क्या कर रही है ?या कोई ऐसा सामान जिसे वो बेटी को देना चाहती थी।
तुम इतना मत सोचो !उसे दस हजार रूपये लिफाफे में दे देना ,बात खत्म ,वो जो भी करना चाहेगी ,स्वयं कर लेगी।
नियत समय पर बच्चों के साथ करुणा और किशोरजी,प्रभा के दिए पते पर पहुंच गए ,इस बीच उससे एक बार बात अवश्य हुई थी ,सही स्थान जानने के लिए ,जब वे लोग उस स्थान पर मंडप के करीब पहुंचे। वहां खड़े लोगों से पूछा। करुणा -किशोर जी से हंसकर कह रही थी -कहीं हम किसी और विवाह में न चले जाएँ ,तभी उसे वो बात स्मरण हो आई और बोली -वो रात्रि स्मरण है ,जब हम दोनों को आपके दोस्त के बेटे के विवाह में जाना था और समीप ही ऐसा ही दूसरा मंडप था और हम दूसरे मंडप में चले गए थे। बड़े जोरों की भूख लगी थी ,सबसे पहले ''पेट पूजा ''कहकर हमने भोजन किया और जब बहु को मुँह दिखाई देने गये तब पता चला ,हम किसी दूसरी शादी में आ गए।
हाँ ,हुआ तो था ,किशोर जी भी उन यादों को स्मरण कर मुस्कुरा दिए ,किन्तु हर बार ऐसा नहीं होता। आओ !चलो !आगे बढ़ते हैं ,बल्कि पहले तुम आगे बढ़ो !तुम ही तो अपनी सहेली को पहचानती हो।
ये बात भी सही है ,कहते हुए करुणा ने अपनी साड़ी ठीक की और आगे बढ़ चली ,उसकी नजरें अपनी दोस्त को तलाश रहीं थीं।
क्या करुणा सही स्थान पर पहुंची इतने वर्षों पश्चात अपनी दोस्त को पहचान सकी ,प्रभा के साथ क्या हुआ ?आगे बढ़ते हैं -''काँच का रिश्ता ''
