नीलिमा अत्यंत उत्साहित थी, वह अत्यंत प्रसन्न थी ,कि उसने 'जावेरी प्रसाद 'का पता लगा लिया है। बंगलो नंबर 63 उसी का है, किंतु जब कल्पना ने ,अपनी मां से कहा-कि एक नाम के दो व्यक्ति भी तो हो सकते हैं , यह जरूरी तो नहीं , जिस 'जावेरी प्रसाद 'को आप ढूंढ रही हैं ,यह वही हों। आपने कभी ''जावेरी प्रसाद ''को देखा तो है, नहीं , तब आप किस दावे से कह सकती हैं ?कि यह ''जावेरी प्रसाद ''वही है ,जिसने आपको फँसाया है। बेटी की, यह बातें सुनकर नीलिमा का उत्साह ठंडा पड़ गया। वह एकदम से शांत हो गई।
आज कुछ दिन अच्छा ही नहीं रहा, पहले बेटी प्रतियोगिता में हार गई , एक उम्मीद बनी थी ,कि नौकरी भी लग जाएगी और इसकी पढ़ाई भी पूर्ण हो जाएगी किंतु ऐसा कुछ नहीं हो पाया। दूसरी तरफ 'जावेरी प्रसाद' भी वही है ,यह भी विश्वास से वह ,नहीं कह सकती थी।
एक बहुत बड़ी कम्पनी में ,एक लड़का प्रवेश करता है ,और उससे कोई कुछ कहता भी नहीं ,और वो सीधे एक 'कैबिन 'की तरफ मुड़ जाता है। जैसे इस कम्पनी को अच्छे से जानता है ,जहाँ एक बड़ी सी मेज पर कुछ आवश्यक सामान रखे हैं। तीन -चार महंगी कुर्सियां हैं ,कम्प्यूटर रखा है और उस पर एक व्यक्ति नजरें गड़ाये बैठा है। तभी उस लड़के की आवाज़ गूंजती है -'मे आई कम इन''
उसे व्यक्ति ने बिना देखे ही, जवाब दिया -यस कम इन !
वह लड़का अंदर प्रवेश करता है, और वहां पहुंचते ही, कुर्सी पर भी नहीं बैठा, और न ही उस व्यक्ति, से यह जानना चाहा कि वह उसकी बात सुनने के लिए तत्पर भी है या नहीं, सीधे और स्पष्ट शब्दों में बोला -मेरी समझ में यह नहीं आ रहा है, यह इसके विषय में जानती ही ,कितना है ? क्या इन्होंने कभी कोई डिजाइनिंग का कोर्स किया है ? कंपनी के लिए क्या सही है ,क्या गलत है ? आपने यह अधिकार इनको कैसे दे दिया ? आपको स्वयं उधर जाना चाहिए था। आपने देखे नहीं ,उस लड़की ने एक से एक डिजाइन बनाए थे , इतनी होनहार लड़की है। उसे छोड़कर, इन्होंने एक, औसत सी लड़की को चुना। क्या मेरा इस कारोबार पर कोई अधिकार नहीं है ? क्या इस कारोबार के लिए उचित -अनुचित का निर्णय भी ,मैं नहीं ले सकता। तुषार अपने पिता ''जावेरी प्रसाद'' से अपने प्रश्नों के जवाब चाहता था, वह उनके दफ्तर में उनसे बातचीत करने के लिए आया था। हालांकि वह चांदनी को वह अपनी माँ नहीं मानता है ,उम्र के हिसाब से तो वह मां लगती ही नहीं है. किंतु रिश्ता ही बन गया है, तब कोई क्या कर सकता है ? कंपनी के लिए चांदनी का यह निर्णय उसे गलत लग रहा था। वह सोच रहा था -इस बहाने वह कल्पना की सहायता भी कर पाएगा और उसके हुनर के माध्यम से हमारी कंपनी को भी अच्छा लाभ हो जाएगा। वह कल्पना को बताना नहीं चाहता था, कि यह कंपनी उसी की है।
आज बहुत दिनों पश्चात तुषार अपने पिता से मिलने आया था, और वह भी क्रोध में, तब उन्होंने उसकी तरफ देखा और बोले -तुम आराम से बैठो तो सही , हम बात करते हैं। तुम भी तो इस विद्यालय में हो, तुमने उस लड़की को देखा होगा।
उस लड़की को ही नहीं ,मैंने उसके डिजाइन भी देखे हैं, बहुत मेहनती लड़की है और उसके डिजाइन, धूम मचा देंगे ! आपको इस तरह उन्हें ''चीफ गेस्ट ''बनाकर नहीं भेजना चाहिए था।
कोई बात नहीं, जो हो गया ,सो हो गया किंतु हम उस लड़की को भी, उसके डिजाइनों के लिए, उसे अपनी कंपनी में नौकरी दे सकते हैं। इस कंपनी पर तुम्हारा भी उतना ही अधिकार है, उचित -अनुचित तुम भी देख सकते हो। हो सकता है ,उससे कोई गलती हो गई होगी। हम उसे यह बात बताएंगे ही नहीं, हम अपने तरीके से, उस लड़की का नाम स्मरण करते हुए बोले -क्या नाम बताया था ?तुमने उसका.......
अभी तो मैंने कोई नाम बताया ही नहीं , कल्पना! है ,उसका नाम।
हां कल्पना को हम, एक अच्छी सी नौकरी देंगे। उसका ''नियुक्ति पत्र '' तुम ही लेकर चले जाना।
नहीं, मैं लेकर नहीं जाऊंगा, क्योंकि मैंने उसे बताया ही नहीं है कि यह कंपनी, हमारी है ,या मैं इस कंपनी से जुड़ा हुआ हूं। आप किसी और को, उसकी नौकरी के लिए 'नियुक्ति पत्र '' भेज सकते हैं।
जैसी तुम्हारी इच्छा ! अच्छा बताओ !कॉफी पियोगे, 'जावेरी प्रसाद 'जी को आज बहुत अच्छा लगा, कि उनका बेटा एक लड़की के लिए ही सही ,किंतु कुछ देर के लिए ,मेरे पास बैठते तो आया है। इसने अपनी कम्पनी के लिए कुछ तो सोचा। यह सब उस लड़की के कारण ही ,हुआ है। कुछ तो बात होगी ,उस लड़की में ,जब से उन्होंने चांदनी से विवाह किया है, तब से वह उनसे ठीक से बात ही नहीं करता है। कभी बात करने का प्रयास भी किया तो....... हम दोनों के मध्य अक्सर झगड़ा ही हो जाता है। इसलिए दोनों, बाप -बेटा एक घर में रहते हुए भी अलग-अलग से रहते हैं। इसका कारण सिर्फ, 'चांदनी 'ही है।
