बाल मन है, उसके सभी प्रश्नों का जवाब उसे मिल चुका था ,अब बुखार भी उतर गया था ताबीज भी पहन लिया था ,माता-पिता भी संतुष्ट थे, कि बेटा अब ठीक हो गया है। दो इम्तिहान थे वह भी पूरे हो गए। अब तो छुट्टियां ही छुट्टियां हैं, दोस्तों के साथ मौज मस्ती !जब तक परीक्षा का परिणाम नहीं आ जाता, तब तक तो घर में कोई कहने वाला नहीं है कि पढ़ ले ! बच्चा ,इतनी पढ़ाई कर पाए या ना कर पाए किंतु यह बात अवश्य उसके सिर पर बोझ सा बना रहता है। माता-पिता का के वचनों की तलवार लटकी रहती है ,उनकी घूरती निगाहें उसे स्वतंत्र रूप से न खेलने देती है ,न ही उठने -बैठने देती हैं। अब चतुर निश्चिंत हो गया था ,कि अब कोई भी उसे पढ़ने के लिए नहीं कहेगा किंतु अब घर के कुछ न कुछ कार्य अवश्य बता देते हैं ,ऐसे में चतुर अपने लिए समय निकल ही लेता है।
उसे समय, खेती-बाड़ी परिवार के सभी सदस्य मिलजुल कर करते थे, कुछ ज्यादा काम होता था तो बाहर से भी लोगों को बुला लेते थे। ईंख की फसल तैयार हो गई थी, तब श्रीधर जी , राम प्यारी से बोले -खाना खेत पर ही भिजवा देना , आज तड़के ही निकलना होगा। आज गन्ने की कटाई है। उनका इशारा चतुर की तरफ था , कि वह भोजन लेकर खेत पर पहुंच जाए। हुआ भी ऐसा ही, रामप्यारी ने मजदूरों के लिए और अपने परिवार के सदस्यों के लिए , भोजन तैयार कर दिया और चतुर को भोजन देकर भेज दिया। सभी अपने-अपने कार्यों में व्यस्त थे,चतुर को देखकर कुछ लोग मुस्कुराए, क्योंकि भोजन आ चुका था, सभी को बहुत ही जोरों से भूख लगी थी। श्रीधर जी ने सबसे कहा -कि सभी आकर पहले भोजन कर लें। चतुर ने खाने का सब सामान , और बर्तन एक कपड़ा बिछाकर ,एक पेड़ के नीचे वहीं जमीन पर रख दिया और इधर-उधर घूमने लगा। वह देख रहा था, कि यह लोग किस तरह से गन्ने को काटते -छाँटते हैं और उनकी गठरी बनाकर, ट्रैक्टर की ट्रॉली में लाध रहे थे। श्रीधर जी ने सबको खाना दिया और स्वयं भी खाया। तब तक चतुर इसी तरह घूमता रहा।
उसके पिता ने एक -दो बार कहा भी, कि अब वह वापस घर चला जाए किंतु वह तो खेलने में व्यस्त हो गया। जहां जाता कहीं न कोई कहीं अपने मनोरंजन का साधन ढूंढ ही लेता। धीरे-धीरे खेती का कार्य भी समाप्त हो रहा था। तब उन्होंने सख्त लहजे में कहा -अब उसे घर जाना चाहिए , हालांकि वह बड़ा हो गया है किंतु अभी भी उसमें बचपना नहीं गया। उनके अनुसार उसमें समझदारी नहीं आई। माता -पिता को तो अपने बच्चे नासमझ और छोटे हैं। तब उसके पिता बोले-हमारे जाने से पहले तुम घर चले जाओ ! यहां भेड़िये भी घूमते है।
' भेड़िया' शब्द सुनते ही ,चतुर के कान खड़े हो गए। भोजन के बर्तनों को उठाते हुए पिता से बोला -क्या सच में ही यहां भेड़िए आते हैं ?
अब तो नहीं है ,क्योंकि यहां पर बहुत सारे लोग इकट्ठा हैं। किंतु अकेले में देखकर किसी पर भी झपट्टा मार सकते हैं इसीलिए तो कह रहा हूं ,तुम्हें घर चले जाना चाहिए।
बर्तन उठाकर चतुर घर की ओर चल दिया, किंतु उसे बहुत आश्चर्य हो रहा था है ,बहुत दिनों से उसने कभी किसी से भेड़िये की बात नहीं सुनी थी आज अचानक पिताजी ने उससे भेड़िए की बात की ,क्या मुझे डराने के लिए या सच में ही भेड़िया आता है। यही सब वह सोचता जा रहा था - जैसे ही वह गांव में घुसा , उसे एक बुजुर्ग व्यक्ति दिखलाई दिए, उन्हें देखते ही ,चतुर बोल उठा -राम -राम ,ताऊजी !
उस बुजुर्ग ने बिना देखे ही, चतुर की राम-राम ले ली और घूमकर देखा और पहचानने का प्रयास करते हुए बोले- लाला ! कौन है ?
मैं ,चतुर !
उसके जवाब से उन्होंने अपनी सोच पर दबाव डाला और बोले -क्या तू , श्रीधर का लड़का है।
हां ,हां मैं वही हूं, तब मैं तेरा ताऊ नहीं बाबा लगता हूं।
ओह ! अच्छा, कहकर चतुर सिर खुजलाने लगा और बोला - बाबा जी !एक बात पूछूं ,क्या इस गांव में भेड़िए भी आते हैं ?
यह सब तुझसे किसने कहा, उन्होंने पूछा।
आज पिताजी ही बता रहे थे ,
हां भेड़िये तो आते थे, किंतु अब कम ही नजर आते हैं ,वो भी शायद किसी ऐसे ही शख्स की तलाश में थे जिसके साथ कुछ समय बिता सकें ,अब तो कोई इक्का-दुक्का ही होगा किन्तु अब गांव में नहीं आते। तू कहां से आ रहा है ?
खेतों पर खाना देने गया था। आज गन्ने की छिलाई हो रही है।
उसकी बात सुनकर हंस दिए ,बोले -पढ़ने वाले ऐसे ही बोलते हैं ,हम तो ''छोल '' लगी है,कहते हैं। चतुर का उनसे बात करने का कारण ही यही था, ताकि वह भेड़िये की जानकारी उनसे निकाल सके। वह उन्हें जानता नहीं था ,किंतु इतना तो उसे मालूम ही था ,कि गांव में जो भी बड़ा बुजुर्ग है, 'ताऊ' या 'बाबा 'ही होंगे और बात की शुरुआत 'राम-राम 'से ही शुरू हो जाती है ,यही उसके साथ हुआ।
अच्छा ये बताइये !क्या कभी भेड़िये गांव में भी आये हैं ?
हाँ ,पहले आते थे ,चलो तुम्हें एक किस्सा सुनाता हूँ।
अभी तो मुझे घर जाना है ,वापस आकर सुनता हूँ ,कहते हुए ,आगे बढ़ गया। जल्दी-जल्दी घर पहुंचा और बर्तन रखे, रामप्यारी उसे देखते ही बोली -बड़ी देर लगा दी।
जब वह भोजन करते ,तभी तो आता झुँझलाकर बोला -अभी आ रहा हूं , कहते हुए ,बाहर की ओर दौड़ पड़ा। जहां वह बाबा मिले थे, वहीं पहुंच गया। किंतु अब वो वहां नहीं थे। अरे ,देर हो गई , मेरी ही गलती है, मुझे उनसे कह कर जाना चाहिए था। की प्रतीक्षा करें। चतुर वापस अपने घर की तरफ मुड़ गया तभी वह बुजुर्ग उसे राह में जाते दिखलाइ दिए। उन्हें देखते ही चतुर उनकी तरफ दौड़ पड़ा। बाबा जी ! आप यहां हो मैं आपको इस स्थान पर ढूंढ रहा था।
अरे ,तू वापस आ गया, मैं तो सोच रहा था -अब तू वापस नहीं आएगा इसलिए मैं वहां से आ गया।
तभी चतुर अपने कॉलर को पकड़ कर फिल्मी अंदाज में बोला -जबान दी है ,आता कैसे नहीं ?
लगता है ,बहुत फिल्में देखता है उसका अंदाज देखकर वह मुस्कुराए , आ ,चलकर कहीं बैठते हैं। रास्ते में आते समय, तुरंत ही चतुर को एक उपाय सूझ गया। अब देखिए अगले भाग में क्या होता है ? यह लड़का क्या कोई नई शरारत करने वाला है ? या इसकी जिंदगी में एक नया मोड़ आने वाला है।
