Sazishen [part 75]

 मम्मा , देखो ! मेरे लिए किसी  कंपनी से ''नियुक्ति पत्र '' आया है। 

क्या कह रही हो ?खुश होते हुए नीलिमा ने पूछा - यह कैसे हो सकता है ? कौन सी कम्पनी है ?

पत्र देखते हुए ,ये तो वही कम्पनी है,जिसकी मालकिन वो ''चीफ़ गेस्ट ''थी। 

किंतु उस कंपनी ने तो, 'सुनैना 'को इसके लिए चुना था। 

वही तो मैं सोच रही हूं, हो सकता है ,घर जाकर उसे [चीफ गेस्ट चांदनी ]को अपनी गलती का एहसास हुआ होगा, अंदाजा लगाकर कल्पना बोलीऔर मुस्कुराने लगी। फिर थोड़ा परेशान होते हुए बोली - मम्मा !यदि कॉलेज में, यह मुझे मिलता तो मुझे ज्यादा खुशी होती, क्योंकि इतने लोग मुझे पहचान जाते। 

देख तो सही ,तुझे क्या 'पद 'दिया गया है। 


उनकी कंपनी में जितने भी डिजाइनर हैं, उन सभी की ,मुझे हैड बनाया है  और शुरुआत में मुझे ₹50000 महीना ! कल्पना खुशी से उछल पड़ी। इसका अर्थ है ,''सुनैना '' की हेेड भी मैं ही बनूंगी। चलो ! ट्रॉफी नहीं मिली किंतु अब मेरे लिए यही ट्रॉफी है। वह अपनी इस खुशी को तुषार से बांट लेना चाहती थी ,मन ही मन सोच रही थी कि काश !वो आ जाये। 

चल ,तेरे लिए मीठे में कुछ बनाकर लाती हूं ,कहते हुए नीलिमा रसोई घर की तरफ चल दी , कुछ देर पश्चात ही, वह गरमा -गरम सूजी का हलवा बनाकर ले आई। 

वाह ! क्या खुशबू है ? चलो ,कल का दिन हमारे लिए, बुरा गया था किंतु ईश्वर जो करता है ,सच में ही अच्छा करता है। हलवा खाते हुए कल्पना बोली -मुझे तो लग रहा है ,इसमें आज कुछ खास ही मिठास है। 

हां क्यों नहीं होगी ? क्योंकि यह प्रसन्नता की मिठास है, खुशियों की मिठास है। जल्दी से हलवे को समाप्त करके, कल्पना अपनी मम्मी से बोली-मैं अभी थोड़ी देर में आती  हूं ,कहते हुए बाहर निकल गई। वह भी शीघ्र अति शीघ्र तुषार से मिलकर, अपनी खुशियां बांट लेना चाहती थी। 

सकारात्मकता, नीलिमा के, मन में भी भर गई थी ,तभी उसने सोचा -'जावेरी प्रसाद ''को मैंने देखा तो नहीं है, किंतु उसकी पत्नी अच्छी -भली लग रही है।मुझे तो वो भी चाँदनी नहीं लगती।  वहां पर उसका, ड्राइवर'' डैनी ''भी तो होगा। वह तो मुझे पहचान ही लगा, वह नहीं पहचानेगा तो मैं ,उसे पहचान लूंगी। यदि वह उसका ड्राइवर वही है, तो इसका अर्थ है -''जावेरी प्रसाद ''भी वही है। अब क्या मुझे उसके विरुद्ध जाना चाहिए ? जबकि उसकी कंपनी में मेरी बेटी को काम मिल गया है। तभी उसका हृदय काँप उठा , कहीं ऐसा तो नहीं ,मेरी बेटी को भी ,मेरी ही तरह ,फसाया जा रहा हो, यह तो मैंने सोचा भी नहीं। 

हो सकता है ,मुझे फंसाकर मुझे मेरे शहर से निकलवा दिया और अब मेरी बेटी को फंसाने का उसका उद्देश्य हो। नीलिमा ने अपने कमरे के अंदर झांक कर देखा तो अथर्व सो रहा था , बेटी को भी आने में अभी समय लगेगा। क्यों न मैं एक बार जाकर उस कोठी को एक बार और देख लूँ। वह लोग जानते थोड़े  हैं ,कि  कल्पना ही मेरी बेटी है, क्यों न मैं काम मांगने के बहाने से वहां चली जाऊं ? यह सोचकर, नीलिमा ने निश्चय किया कि अब वह उस बंगले  में दोबारा जाएगी। इतना बड़ा बंगला है ,मेरे लिए कुछ ना कुछ कार्य तो मिल ही जाएगा। पढ़ी-लिखी हूं, हो सकता है, कोई ऐसा कार्य हो। सोचकर ही वह बाहर आ गई , और टैक्सी ले ली। 

जुहू चलो !टैक्सी वाले से कहकर टैक्सी में बैठ गयी। 

जुहू में कहां उतरेंगीं ? टैक्सी वाले ने पूछा। 

बंगलो नंबर 63

वहां आपको क्या काम है ?

मुझे कुछ काम हो या ना हो, किंतु तुम अपना काम करो ! आप क्यों दिलचस्पी दिखला रहे हैं ? 

मैं कई बार उधर गया हूं, वहां बड़े-बड़े लोग रहते हैं ,क्या आप वहां नौकरी करती हैं ?

नीलिमा को लगा,मुझे इस टैक्सी ड्राइवर से, बेरुखी से बात नहीं करनी चाहिए , हो सकता है ,यह मददगार साबित हो जाए। वैसे तो लोग यही कहते हैं -कि इतने बड़े शहर में किसी पर विश्वास नहीं करना चाहिए , किंतु विश्वास करना भी पड़ जाता है। इंसान ही इंसान के काम नहीं आएगा तो फिर कौन आएगा ? यह सोचकर बोली -क्या उनके विषय में कुछ जानते हो ? मैं बहुत दूर से आई हूं, मेरा बेटा बीमार है, उसी के  इलाज के लिए ,मुझे पैसों की आवश्यकता है, इसलिए नौकरी की तलाश में हूं। 

हां ,थोड़ा सुना है ,बड़ा आशिक मिजाज है। बड़े लोग हैं, बड़ी-बड़ी बातें हैं। हमें क्या जी ? चले जाइए हो सकता है ,आपको कोई अच्छी सी नौकरी मिल जाए ,आपको कभी किसी चीज की जरूरत हो तो अपुन को बताना। उस टैक्सी ड्राइवर को, नीलिमा के प्रति हमदर्दी हो गई, जब उसने बताया, कि उसका बेटा बीमार रहता है। अगर आपको अपुन की जरूरत है ,तो रुकता है वरना अपुन चला जाएगा। नीलिमा से उसने पूछा। 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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