समय के खिलाफ हम चले या ना चलें , किन्तु यदि समय खिलाफ हो गया ,तो रुला देता है। कोई साथ नहीं देता है ,न ही ,कोई साथ खड़ा नजर आता है। ''समय के खिलाफ ''होने से मतलब यही है ,समय तो अपनी गति से चलता रहता है , किंतु विपरीत परिस्थितियों में जब कोई अपने साथ नजर नहीं आता है ,तब लगता है समय बदल गया है या हमारे खिलाफ हो गया है। तब ऐसे समय में हमें 'समय के खिलाफ 'भी चलना पड़ता है ,इसी उम्मीद से कि शायद वह हमारे अनुकूल हो जाए। इस उम्मीद से हम आगे बढ़ते रहते हैं कि समय हमारे अनुकूल हो जाए। समय हमारे अनुकूल कब होगा या कब हुआ है ?उसे तो अनुकूल बनाना पड़ता है।
जीवन में संघर्ष ही इस बात का है, परिस्थितियाँ और समय अनुकूल बनाने पड़ते हैं। समय तो पांडवों का भी कभी अनुकूल नहीं रहा। समय अपनी गति से चलता रहता है ,वे भी जीवन जीते रहे ,समय से लड़ते रहे समय को अनुकूल बनाने के लिए उन्हें हमेशा लड़ना पड़ा। कभी अपने आप से और कभी अपने लोगों से, जीवन की एक भी गलती, समय को खिलाफ बनाने से नहीं रोक सकती। जिस प्रकार पांडवों ने, जुआ खेल कर समय को अपने खिलाफ कर लिया था और उसे अनुकूल बनाने के लिए उन्हें 12वर्ष तक, वनवास काटना पड़ा, और 1 वर्ष अज्ञातवास उसके पश्चात भी समय उनके अनुकूल नहीं रहा। तब, उन्हें उसे अनुकूल बनाने के लिए, महाभारत का युद्ध करना पड़ा।
कई बार समय को अनुकूल बनाने के फेर में, 'जीवन चक्र' भी छोटा पड़ जाता है , किंतु समय और परिस्थितियाँ , उसे घूमाकर रख देती हैं। धैर्य से कुछ लोग समय के अनुकूल होने की प्रतिक्षा भी करते हैं। किंतु तब तक न जाने ,उनके घर ,उनकी जिंदगी और न जाने क्या-क्या उनके जीवन में एक बड़ा सा तूफान आकर चला भी जाता है। समय को अनुकूल बनाने के लिए लोगों ने रीति -रिवाज ,परिपाटियों में भी बदलाव और बहिष्कार किए हैं। समय की मार सबको पड़ी है ,तब भी इंसान समझता नहीं, मद में चूर रहता है। तभी तो बहुत पहले ही, किसी ने यह गाना बना दिया था , इसका अर्थ है, हर दशक में हर संवत में समय ने राजा हो या रंक सभी को अपना जलवा दिखाया है।
''समय के खेल निराले मेरे भैया ,समय के खेल निराले, समय के आगे झुकना पड़ेगा समय बड़ा बलवाला रे भैया। ''
समय ने ही लोगों को बहुत खेल दिखाए, कुछ लोग कहते हैं -समय के साथ चलो !कुछ लोग कहते हैं -समय से आगे चलो !लेकिन जब समय उनके खिलाफ होता है तो न वह आगे चल पाते हैं और न साथ चल पाते हैं। समय से लड़ते रहते हैं।
