एक बालक के मन में, यह बात आ जाना स्वाभाविक ही है , यदि हमारे पूर्वजों पास इतना धन था, तब हमारे पूर्वजों ने उसे अपने उपयोग के लिए क्यों नहीं निकाल लिया ? यदि आज वह धन हमारे पास होता तो हम न जाने कितने अमीर होते ? ऐसे ही कुछ विचार चतुर के मन में भी आ रहे थे। वह जानना चाहता था, आखिर दादाजी ने वह धन, उस तांत्रिक के माध्यम से, बाहर क्यों नहीं निकलवा लिया ? उसे इस तरह सोचते देखकर रामप्यारी ने पूछा -क्या सोच रहे हो ?
तब उसने यही जवाब दिया, आज हमारे पास वह धन होता तो हम न जाने कितने अमीर होते ?
ऐसा नहीं सोचते हैं ,तुम्हारे दादाजी को ,अपने बेटे से प्यार था, अपने बेटे की जान के बदले में ,वह उस धन के विषय में सोच भी नहीं सकते थे। ऐसे धन से क्या लाभ ? जिसके लिए अपने लोगों की जान गंवानी पड़े ,'' धन तो आता है ,चला जाता है 'किंतु एक बार इंसान चला गया ,वह पुनः नहीं आता।'' मान लो ,वह उस धन को निकलवा भी लेते और यदि उनके बेटे को कुछ हो जाता , तो उस धन का क्या करते ? उनका यह वंश कैसे चलता ? माँ ने इतनी बड़ी बात ,कितने सहज और सरल शब्दों में चतुर को समझा दी थी। वह कल से इसी उधेड़बुन में था, कि आखिर दादाजी ने वह धन क्यों नहीं लिया ?
अब तक चतुर ने अपना सम्पूर्ण भोजन, समाप्त कर लिया था। अब वह अपने को अपनी मां के साथ बातचीत करने के लिए, तत्पर समझ रहा था. पिता से वह इतनी बात नहीं का पाता है इसलिए उसने छोटा रास्ता चुना, वह सोचता है -मां से ही ,उसकी सभी समस्याओं का समाधान उसे मिल जाए। थाली को झूठे बर्तनों के पास रखकर आ गया और बोला -तब वह भूतनी कौन है ? हमारे पड़ , पड़ , पड़, पड़ ,पड़ , पड़ दादाजी ने तो किसी पुरुष को मारा था।
तुम सही कह रहे हो, और सही सोच भी रहे हो किंतु एक बार मैंने तुम्हें भी तो कहानी सुनाई थी जिसमें तुम्हारे ताऊ जी ने वह आमवाला बाग लिया था और फसल अच्छी नहीं हो रही थी तब उन्हें पंडित जी ने सुझाव दिया था, कि इसमें एक बलि देनी होगी ''यह बाग बलि मांगता है।''
हां हां आप बतला रही थीं।
वैसे तो उस बाग में ,रात्रि में कोई नहीं जाता था किंतु एक बार दूसरे गांव से, कोई लड़की इधर चली आई थी। गांव के पंडित जी ,अपनी विद्या से जान गए थे, जिससे तुम्हारे ताऊ जी मिलने गए थे कि वह धन ऊपर आ चुका है ,यानी कि वह धन , उन्हें मिलना चाहता है ,जो उसके अधिकारी हैं। उसे वर्षों हो गए थे,वह आत्मा अब अपनी मुक्ति चाहती थी। पंडित जी ने ,अपनी विद्या से यह पता लगा लिया था, और वह तुम्हारे ताऊ जी को इस बात के लिए प्रोत्साहित कर रहा था कि यह'' बाग बाली मांगता है'' इस बाग़ की अच्छी फसल के लिए ,किसी की बलि तो देनी होगी, क्योंकि वह जानता था, उनके परिवार ने पहले भी एक बलि दी है। फसल के कारण, वे यह कार्य भी कर सकते हैं , शायद तुम्हारे ताऊ जी भूल गए थे कि इस बाग में, हमारा गढा हुआ खज़ाना भी है। वह गढा हुआ ,धन ऊपर आना चाहता था, किंतु किसी अच्छे इंसान को मिलना चाहता था , तंत्र से बंधा हुआ था ,इसीलिए इधर-उधर भी नहीं जा सकता था।
तब क्या हुआ ? आश्चर्य से अपनी मां की तरफ देखते हुए ,चतुर में पूछा।
ऐसे ही किसी गांव की लड़की उस बाग में आई थी, उस धन को प्राप्त करने के लिए पंडित जी ने, एक तांत्रिक से मिलकर योजना बना ली थी। उसने तुम्हारे ताऊ जी से पहले ही कह दिया था ,मैं सब इंतजाम कर लूंगा। पंडित जी पर '' नरबलि '' का दोष होता इसीलिए उसने तांत्रिक को इस षड्यंत्र में शामिल किया । दोनों कुछ ऐसे ही पूजा पाठ करने लगे। तुम्हारे ताऊ जी , नहीं जानते थे, कि उनके मन में क्या चल रहा है ? वह तो सोच रहे थे- खराब फसल के कारण, यह कुछ पूजा -पाठ कर रहे हैं। किंतु वे लोग तो उसी पेड़ के पास जाकर तांत्रिक क्रिया कर रहे थे ,ताकि उस तंत्र को वे काट सकें उस तंत्र से मुक्त होकर, वह धन उन्हें मिल जाए और किसी को कानों कान खबर भी ना हो। दोनों ने पहले ही ,निश्चय कर लिया था कि इस धन को आधा-आधा बांट लेंगे। इस परिवार के लोगों को पता भी नहीं चल पायेगा।
कितने लालची थे ? दूसरे के धन पर नजर रख रहे थे, फिर क्या हुआ ?
फिर क्या होना था ?उनकी पूजा चल रही थी , एक दिन दूसरे गांव की एक लड़की, आम तोड़ने के लिए उस बाग में चली गई बाग़ बहुत ही गहन है ,यह तो तुमने देखा ही है ,दिन में भी अंधेरा सा हुआ रहता है।
कहानी सुनते हुए चतुर ने हाँ में गर्दन हिलाई।
उन्होंने मौका देखकर, उस लड़की को बहला -फुसलाकर पहले तो उसे बंधन में बांधकर ,किसी स्थान पर छुपा दिया। पूजा के समय उसे बाहर लाये और उसे कुछ खाने को दिया। उसे चक्कर से आने लगे ,तब उसे पूजा में बैठा लिया ताकि वह शोर न मचाये ,न ही ,कोई परेशानी हो, उसे प्रसाद के रूप में भी, कुछ खाने को दिया ,जिसमें कुछ नशीला पदार्थ था जिससे उसे भान ही नहीं रहा ,मैं कहाँ हूँ ? निर्भय सिंह के उस तंत्र को तोड़ने के लिए, उस लड़की की बलि दे दी। यह बात किसी को भी पता नहीं चली ,तुम्हारे ताऊजी को भी नहीं।
तंत्र के टूटते ही वह आत्मा स्वतंत्र हो गई , उसने सबसे पहले उनके धोखे के लिए , तांत्रिक और पंडित जी पर वार कर दिया। उस आत्मा से तांत्रिक ने भी ,खूब टक्कर ली। वह अपने मंत्रों के उच्चारण द्वारा ,उस आत्मा को विवश कर देना चाहता था। किंतु आज भी वह आत्मा, उस ख़जाने की पहरेदारी कर रही थी। जब तांत्रिक ने अपने मंत्रों के द्वारा , उस आत्मा को विवश कर दिया तब उसे आत्मा ने, अपना कार्यभार उस लड़की को आत्मा को सौंप दिया। जो कि उससे जवान थी ,वह नई आत्मा थी ,उनके धोखे का शिकार हुई थी। मुक्त होने से पहले, अपना कार्य भार उस पर सौंप कर, वह वहां से चला गया। धन अपनी सीमा से बाहर आ चुका था, वह चलकर कहीं भी जा सकता था। जब उस तांत्रिक ने उस स्थान पर खुदाई की , तो उसे दो सर्प के जोड़ों के सिवा कुछ नहीं मिला। जिनमें से एक सर्प ने उसे काट लिया , तब वह पंडित से बोला -यह धन हमारी किस्मत का था ही नहीं , तुम्हारे कारण मैं भी ,इस धन के लालच में आ गया और अपनी विद्या को नष्ट कर डाला। जिसकी किस्मत में वह धन नहीं होता, उसे वह मिट्टी दिखाई देता है।
देखो !यहां कुछ माट रखे हैं ,पंडित ने तांत्रिक से कहा -जहर अपना असर कर रहा था ,हालाँकि तांत्रिक ने अपने मंत्रों और जड़ी -बूटियों द्वारा उस विष का प्रभाव कम करने का प्रयास किया।
तब वह पंडित से बोला -धन हमारे हाथ से जा चुका है।
किन्तु पंडित रतिराम नहीं माना ,और उसने उन माटों में से एक को खोलने का प्रयास किया जिसके खोलने पर उसमें मिटटी के सिवा कुछ भी नहीं था।
बहुत अच्छे ,पंडित को मिला ठेंगा ,प्रसन्न होते हुए ,चतुर चहक उठा और ताली बजने लगा।तभी बोला -वह धन कहाँ गया ?
इस बाग में ही, घूमता रहता है किंतु कहां ?इसकी जानकारी किसी को भी नहीं है। उसकी सुरक्षा का दायित्व इस लड़की पर है यह वही लड़की है , जो रात्रि में इस बगीचे में घूमती है। वह आत्मा कैद थी ,किन्तु यह स्वतंत्र है ,जो कभी -कभी दूसरों को दिखलाई पड़ जाती है और बहुत से उसका शिकार भी हुए हैं। मां ने उसकी सभी सवालों का जवाब दे दिया था।
