जब चतुर ने, पहली बार' कस्तूरी 'को देखा तो देखता ही रह गया, उसके सौंदर्य ने चतुर पर, अपना प्रभाव छोड़ा ,उसका सौंदर्य उसे अपने आकर्षण में बांध गया। चतुर को जो भी अनुभूति हुई ,उससे पहले ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था। वह समझ ही नहीं पा रहा था कि उसके साथ यह क्या हो रहा है ?किंतु वह बार-बार कस्तूरी को देखना चाहता था। उसको बार-बार देखने के लिए अनेक प्रयास भी कर रहा था। उससे मिलना चाहता था। किसी न किसी बहाने से देर -सवेर उसके घर भी चला जाता। अब वह पहले से अधिक खुश रहने लगा था।
एक तरफ वह इधर वह, 'कोल्ड ड्रिंक 'का कार्य भी कर रहा था। उसके व्यवहार और उसकी सूझबूझ को देखते हुए उससे अन्य दुकानदार भी प्रभावित थे किंतु उन्हें इस बात का भी दुख था कि चायवाला उसका अनुचित लाभ उठा रहा है किंतु कुछ नहीं कह सकते थे -एक दो बार अप्रत्यक्ष रूप से उससे कहा भी था किंतु उसने ही समझना नहीं चाहा ,इसमें वे भी क्या कर सकते हैं? किंतु चतुर के सपने तो कहीं और ही पनप रहे थे कुछ सुंदर ,हसीन सपने जो वह देख रहा था ऐसे सपने ,उसकी उम्र में सभी लड़कों को आ सकते हैं , बशर्ते लड़की भी कस्तूरी जैसी हो।
कस्तूरी, सुंदर होने के साथ-साथ मासूम और चुलबुली थी। उसे आसपास के वातावरण से कोई फर्क नहीं पड़ता था वो तो अपनी ही मस्ती में रहती थी। उसकी प्रसन्नता को देखकर चतुर भी प्रसन्न होता था।
एक दिन चतुर ने उससे पूछा -कौन सी कक्षा में पढ़ती हो ?
इससे तुमको क्या? पढ़ाई के नाम से चिढ जाती थी , चतुर उसकी बेरुखी देखकर शांत स्वर में बोला -मैं तुमसे ज्यादा पढ़ा -लिखा हूं , यदि तुम्हें कोई विषय समझ नहीं आ रहा है तो मुझसे पूछ और समझ सकती हो। पढ़ोगी तो तुम्हारे लिए ही अच्छा होगा ,बड़ी होकर अपने पापा का सहारा बनोगी ,अपने छोटे भाई को भी पढ़ा सकती हो। तुम नौकरी करने लगो तो ,तुम्हारे पापा को चाय की दुकान खोलने की आवश्यकता न पड़े।
मुझे पढ़ना पसंद नहीं है, कस्तूरी ने स्पष्ट जवाब दिया।
तब तुम्हें क्या पसंद है ? खेलना ! क्या सारा दिन खेलता ही रहोगी ? खेलना भी , सेहत के लिए अच्छा होता है, मैं भी अपने स्कूल में खेल में सबसे आगे था, किंतु शिक्षा से दिमाग की कसरत होती है ,कहते हुए हंसने लगा और बोला -वह तो तुम्हारे पास है ,ही नहीं।
यह तुम कैसे कह सकते हो ?क्रोधित होते हुए कस्तूरी ने पूछा।
यदि दिमाग होता, तो पढ़ाई में भी लगता और तुम्हें पता होना चाहिए खेलने के साथ-साथ शिक्षा भी जरूरी है , शिक्षा के माध्यम से तुम आगे बढ़ सकती हो या यहीं पर ,माता-पिता के पास रहकर, कि तुम्हें जिंदगी बसर करनी है। धीरे-धीरे, चतुर की बातों का प्रभाव उस पर पड़ने लगा। जब चतुर उसे समझा रहा था ,कस्तूरी की माँ उनकी बातें सुन रही थी। उसे अच्छा लगा,लड़का मेहनती होने के साथ -साथ होशियार भी है।
कस्तूरी कभी-कभी तो चतुर को देखते ही ,किताबें हाथ में ले लेती। माता-पिता सभी बातें समझते हैं। कस्तूरी की मां ने भी महसूस किया कि वह चतुर की बातों पर ध्यान देती है और अब पढ़ने में भी मन लगा ने लगी है ,इससे चतुर पर उनका विश्वास बढ़ा और उससे पूछा भी -'क्या तुम इसे गणित पढ़ा सकते हो ?'
चतुर ने सहर्ष स्वीकार कर लिया , तब कस्तूरी की मां ने अपने पति से बात की वह, थोड़ा समय चतुर को, दोनों बच्चों की पढ़ाई के लिए भी समय दे दे। यह तो चाय वाले ने सोचा ही नहीं था उसके लिए तो ''एक पंथ दो काज हो गए। ''
अब चाय वाला शाम को चतुर को शीघ्र ही घर पर बच्चों को पढ़ाने के लिए भेज देता। कस्तूरी का साथ भी मिल गया और धीरे-धीरे उसे लग रहा था ,कस्तूरी का प्यार भी मिल जाएगा, उसके लिए यह रोमांचक भरा, समय चल रहा था। दिन में चाय और ''कोल्ड ड्रिंक ''बेचता और शाम को कस्तूरी के साथ -साथ उसके भाई को भी पढ़ाता ,ये रचना जिस समय की सोचकर लिखी जा रही है। जिस समय घर की बेटी ,घर से बाहर निकलती तो साथ में उसका संरक्षक बनकर भाई भी जाता था। भले ही ,उम्र में और क़द -काठी में वो ,अपनी बहन से आधा ही क्यों न हो ? इसी प्रकार कस्तूरी के साथ ,उसका भाई भी पढ़ता था। इस ज़िंदगी में ,चतुर जैसे रमने लगा था। उसे लग रहा था जैसे यहाँ के लोगों को मेरी आवश्यकता है किन्तु रात्रि में जब अकेला होता तब अपने घर अपने माता -पिता को स्मरण कर आँखों में आंसू आ जाते। वह अपने घर को माता -पिता को याद करता किन्तु इधर उसका ह्रदय कस्तूरी से जो बंध गया था। एक बार उसके दिल की बात जान लेना चाहता था।
कुछ दिनों से वह अपने पैसे साड़ी वाले की दुकान पर ही जमा करने लगा और एक साड़ी पसंद करके ,उसे अलग से रखवा दिया था। एक दिन चायवाले ने उससे पूछा -तेरे पास '' कोल्ड ड्रिंक ''खरीदने के पैसे कहां से आए ?
वह दुकानदार मेरा दोस्त बन गया है, उसने मुझे उधार दिए , जैसे आपने मुझ पर विश्वास किया और काम दिया। उसकी सोच सुनकर चायवाले, को मन ही मन दुख हुआ कि मैंने इसका लाभ उठाया और यह कितना अच्छा सोचता है? यदि किसी अध्यापक को भी मैं अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए बुलाता। 100 या 200 रुपए से कम नहीं लेता। किंतु यह नहीं सोचा -कि उसे उसकी मेहनत का थोड़ा पैसा ही दे दे।
एक दिन पढ़ते समय चतुर ने उन दोनों बहन -भाइयों को एक-एक, ट्रॉफी दी जिसे देखकर, वे दोनों अत्यंत प्रसन्न हुए। अब कस्तूरी पढ़ने में मन लगाने लगी थी, पहले तो उसका ध्यान इस ओर गया ही नहीं किंतु जब उसकी सहेलियों ने चतुर को देखा, और चतुर को लेकर उससे हंसी- मजाक करने लगीं , तब उसके मन में भी गुदगुदी सी होने लगी। अभी चतुर को चाय वाले के घर जाते हुए पंद्रह दिन ही हुए थे । किंतु उसे यहां रहते हुए एक महीना हो गया था।
न जाने कैसे-कैसे राम प्यारी और श्रीधर ने, अपने दिन काटे ?दोनों ही शरीर से बेहद कमजोर लगने लगे थे, किंतु बेटे का कुछ अता -पता नहीं चल रहा था।
एक दिन गांव का ही एक व्यक्ति, इसी शहर में आया था, इस शहर में तो गांव के बहुत से व्यक्ति आते हैं किंतु कभी इस स्थान पर नहीं आए। उसकी बेटी का विवाह था, इसीलिए इस दुकान पर साड़ी लेने आया था। चतुर, ग्राहकों को देखकर पहले ही कोल्ड ड्रिंक की दुकान पर भाग जाता था। आज भी उसने ऐसा ही किया किंतु जब वह अंदर आ रहा था, तब उसने उस व्यक्ति को देख लिया , और उसके मुंह से निकला- दामोदर काका ! कहकर पीछे हट गया।
यह'' दामोदर काका ''कौन है ? क्या वह चतुर को पहचान लेंगे ? और उसे गांव ले जाएंगे। क्या चतुर की प्रेम कहानी यहीं तक समाप्त हो जाएगी , या आगे बढ़ेगी आगे क्या होगा -जानने के लिए पढ़ते रहिए-''रसिया ''!
