सुनो, सखी, मेरा श्रृंगार करो !
आओ !मुझे, सजाओ !
आज पिया मिलन की रात है।
अच्छे से श्रृंगार करो !
आज पिया मिलन की रात है।
'' सोलह शृंगार '' करो !
सजा दो !कुछ ऐसे, आभूषण,
काजल से शृंगार करो !
नजर लगे न ,उन्हें मेरी,
ऐसा ,कुछ उपचार करो !
पैरों में,पायल पहना दो !
रुनझुन,स्वर,पिया से करें तकरार !
माथे पर बिंदियां चमके ,
पिया की करे ,पुकार......
हाथों में स्वर्ण कंगन पहना दो !
आज पिया मिलन की रात है।
कमर में 'करधनी' सजा दो !
केशों को, पुष्पों से महका दो !
तारों जड़ी चुनरी ओढ़ा दो !
आज मेरा अंग -अंग सजा दो !
आज पिया मिलन की रात है।
हार की नहीं ,मुझको चाहत !
आएंगे जब वो मुझसे मिलने ,
उनकी बांहों का हार बहुत है।
अलंकार की नहीं कोई चाहत !
मेरे लिए, उनकी मुस्कान बहुत है।
देख, शर्माकर झुक जाएँगी,अँखियाँ ,
उनका ''नजरभर' देखना बहुत है।
जाओ,सखी पिया मिलन की रात है।
