Piya milan

सुनो, सखी, मेरा श्रृंगार करो !

आओ !मुझे, सजाओ !

आज पिया मिलन की रात है। 

अच्छे से श्रृंगार करो ! 

आज पिया मिलन की रात है। 


'' सोलह शृंगार '' करो !

सजा दो !कुछ ऐसे, आभूषण,

काजल से शृंगार करो !

नजर लगे न ,उन्हें मेरी, 

ऐसा ,कुछ उपचार करो !

पैरों में,पायल पहना दो !

रुनझुन,स्वर,पिया से करें तकरार !

माथे पर बिंदियां चमके ,

पिया की करे ,पुकार...... 

हाथों में स्वर्ण कंगन पहना दो !

आज पिया मिलन की रात है। 

कमर में 'करधनी' सजा दो !

केशों को, पुष्पों से महका दो !

तारों जड़ी चुनरी ओढ़ा दो !

आज मेरा अंग -अंग सजा दो !

आज पिया मिलन की रात है।

हार की नहीं ,मुझको चाहत ! 

आएंगे जब वो मुझसे मिलने ,

उनकी बांहों का हार बहुत है। 

अलंकार की नहीं कोई चाहत !

मेरे लिए, उनकी मुस्कान बहुत है।

देख, शर्माकर झुक जाएँगी,अँखियाँ ,

उनका ''नजरभर' देखना बहुत  है। 

जाओ,सखी पिया मिलन की रात है।  


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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