इंसान सोचता है ,जो भी कार्य वह कर रहा है ,मैं कर रहा हूं ,यानि कर्म करते हुए ''मैं ''का भाव आ जाता है ,किंतु वह ,यह नहीं जानता कि किस्मत ने उसके लिए क्या सोचा है ? ऐसा ही कुछ 'रसिया 'की जिंदगी में हो रहा है। रसिया यानी हमारा चतुर इस कहानी का नायक चतुर भार्गव ! वह अपने माता-पिता की छत्रछाया में, अपने बचपन को जी रहा था किंतु न जाने ,जिंदगी ने उसके लिए क्या सोचा है ? खेल ही खेल में उसे कहां से कहां पहुंचा दिया ? कहां तो वह माता-पिता का लाडला इकलौता बेटा ! और आज कहां ?वह घर से बेघर, जीवन के नए सबक सीख रहा है। माता-पिता और परिवार ही , इंसान की जिंदगी होते हैं किंतु जब वह उस दुनिया से निकलकर, बाहरी दुनिया में आता है ,तब वह कुछ नया सीखता है। जिंदगी का हर पल ,हर लम्हा ,एक नई सीख देकर जाता है ऐसे समय में यदि व्यक्ति समझदारी से कार्य ले। तो उसके अंदर का हुनर, उसके अंदर का कौशल निकलकर बाहर आता है। यही सब, चतुर भी सीख रहा है ,कर रहा है। न जाने ,यह परिस्थितियाँ उसे कहां से कहां ले जाना चाहती हैं ?वह कब अपने माता-पिता के पास वापस जाएगा ? जो बेसब्री से उसकी प्रतीक्षा में हैं ,रात- दिन रोते हैं ,प्रतीक्षा करते हैं।
उसके साथ ऐसी क्या विवशता है ? या वह जाना नहीं चाहता , अब इस नई जिंदगी से कुछ नया सीख रहा है। क्या यह जिंदगी उसे रास आ रही है ? क्या उसे अपने माता-पिता की याद नहीं आती ? अब पढ़ते रहिए कि चतुर की जिंदगी, कैसा मोड़ लेती है ?
दुकानदार पर उसकी बातों का ,उसके आत्मविश्वास पर विश्वास बढ़ता है। उसके व्यवहार से प्रभावित होकर ,उस दुकानदार ने उसे 10 कोल्ड ड्रिंक थमा दीं। ख़ुशी -ख़ुशी 'कोल्ड ड्रिंक ''लेकर चतुर ने ,न ही किसी की तरफ देखा और पूछने का तो, उसमें साहस ही नहीं था। पूछकर यदि जाता भी ,तो उसे 'कोल्ड ड्रिंक 'बेचना तो दूर ,दुकान में घुसने ही नहीं देते। वह सीधा उसी साड़ी की दुकान में घुस गया ,जिसमें थोड़ी देर पहले ,कुछ लोग खरीददारी करने आए थे। उस समय साड़ी वाला साड़ी दिखा रहा था, और चतुर ऐसे में मौके का लाभ उठाते हुए कोल्ड ड्रिंक ,कोल्ड ड्रिंक कहते हुए दुकान के अंदर घुस गया।
ठंडी -ठंडी 'कोल्ड ड्रिंक 'देखते ही ,उन लोगों ने, उसे रोका और एक-एक कोल्ड ड्रिंक उससे ले ली। किंतु वे लोग 8 ही थे ,अभी भी दो कोल्ड ड्रिंक बाकी थीं , साड़ी वाले को भी यह देखकर अच्छा लगा, कि उसके ग्राहक, कोल्ड ड्रिंक पीकर राहत महसूस कर रहे थे, और उनके चेहरे पर प्रसन्नता थी। उन ग्राहकों ने, चतुर को पैसे देने चाहे, किंतु साड़ी वाले ने, पैसे देने से इनकार कर दिया और बोला -आप हमारे ग्राहक हैं, यह हमारी तरफ से क्योंकि वह अत्यंत ही प्रसन्न था उन्होंने दुकानदार से हजारों रुपए का सामान लिया था।
चतुर मन ही मन घबरा रहा था ,कहीं दुकानदार उससे नाराज न हो ,शायद ,मैं मारा गया ,इसने ग्राहकों से भी पैसे नहीं लेने दिये। जब वह लोग सामान लेकर चले गए ,तब साड़ी वाले ने चतुर से पूछा-तुम्हारे कितने पैसे बनते हैं ?
प्रत्येक बोतल पर 10-10 पैसे का लाभ देते हुए ,दुकानदार ने उसके पैसों का, हिसाब किया और आगे भी इसी तरह ,ठंडा लाने के लिए कह दिया। अब चतुर के पास अपनी मेहनत की कमाई के 80 पैसे थे। वह अपनी चतुराई और बुद्धिमानी पर प्रसन्न हो रहा था , और उस दुकानदार ने, उसे खुशी-खुशी, अपनी दुकान पर कोल्ड ड्रिंक बेचने की इजाजत दे दी। इसी तरह से अन्य दुकानदारों ने भी किया।अब वह सुबह -शाम चाय और दोपहर में ''कोल्ड ड्रिंक ''चाय के पैसे चायवाले को ही देता।
पांच -पांच ,या 10 पैसे से इकट्ठा करके, चतुर के पास लगभग ₹10 हो गए थे। मन ही मन प्रसन्न था, यह बात उसने चाय वाले को भी नहीं बताई थी उसे जब भी चाय की दुकान से समय मिलता तो, कोल्ड ड्रिंक बेचता। कई लोगों ने उससे पूछा भी और कहा भी ,क्यों ? वह मुफ्त में चाय वाले के लिए कार्य कर रहा है। वह मेरे लिए दो वक्त की रोटी जुटाता है ,मुझ पर विश्वास करता है। मेरे लिए यही बहुत है।
रात्रि में अक्सर, चाय वाले की दुकान पर ही सोता था। चाय वाला वैसे तो लालची था, कभी तो उसे तीन रोटी देता कभी दो रोटी से उसको टरका देता। कभी -कभी तो उसे अपने घर भी ,किसी कार्य के लिए भेजने लगा। चतुर नए उत्साह और जोश से कार्य करता। कभी -कभी उसके घर पर नहाने के लिए भी चला जाता। मन का लालच बढ़ता जा रहा था ,उम्र का ये पड़ाव ही ऐसा था।
जब उसने पहली बार चायवाले की बेटी कस्तूरी को देखा तो देखता ही रह गया। दूध सा सफेद रंग ,बड़ी -बड़ी आंखे ,लम्बे लहराते बाल ,जब वह पहली बार चायवाले के किसी कार्य से उसके घर पहुंचा। दरवाजा खोलने वाली 'कस्तूरी 'ही थी ,वो शायद खेल रही थी ,और जब किसी ने दरवाजा खटखटाया तो दौड़ते हुए दरवाजा खोला और मुस्कुराते हुए बोली - आप कौन !उसकी मुस्कुराहट ,उसका वो सौंदर्य देख ,आज पहली बार चतुर को कुछ एहसास हुआ। उसे देखकर लगा ,जैसे सब कुछ भूल गया ,वह यहाँ किस कार्य से आया है ?उसे चुप देखकर ,वो अपनी कमर पर हाथ रखकर बोली - क्या तुम बहरे हो ? उसके आगे हाथ घुमाते हुए बोली -या दिखलाई भी नहीं देता।
जी वो..... तुम्हारे पापा ने भेजा है ,भट्टी के लिए कोयला मंगवाया है ,नहीं ,दूध मंगवाया है। वह लगभग भूल ही गया वो यहाँ किसलिए आया था ?
जो भी लेना है ,मम्मी से पूछ लो ! मम्मी !मम्मी ! कोई आया है ,कहते हुए वो अंदर भाग गयी।
आज किसी लड़की को देखकर ,चतुर बौरा सा गया था ,अब उसका ध्यान ,उस घर की तरफ गया। छोटा सा दो कमरों का मकान ,आंगन में ईंटें बिछी हुई थीं। वहीं पर कुछ सामान पड़ा था ,जो आवश्यक भी था और उस सामान के कारण घर अस्त -व्यस्त भी नजर आ रह था। शायद घर छोटा है ,इस कारण ,सब व्यवस्था बिगड़ी नजर आ रही थी। एक तरफ कोयलों की ढेरी,कोने में कुछ लकड़ियां भी खड़ी थीं। चतुर ने अनुमान लगाया ,यहाँ पर इकट्ठा सामान मंगा लेते होंगे ,सस्ता भी पड़ जाता है और बार -बार दुकान पर भागने की आवश्यकता नहीं पड़ती होगी । उसकी नजरें उस लड़की को एक बार ओर देखना चाहती थीं किन्तु वो तो झलक दिखा तरसाकर चली गयी। तभी अंदर से एक पतली सी महिला जो शायद किसी कार्य में व्यस्त थी तेजी से बाहर आई और बड़बड़ाते हुए बोली -इतनी बड़ी हो गयी है ,अभी भी बच्ची बनी हुयी है। ये नहीं ,कि माँ के कार्य में हाथ बंटा दे। तब द्वार पर खड़े चतुर को देखकर पूछती है ,तुम कौन हो ?क्या काम है ?
जी ,मैं चाय की दुकान से आया हूँ ,चायवाले का नाम तो वह जानता नहीं था ,तब बोला -अंकल ! ने मुझे घर में जो दूध रक्खा है उसे लाने के लिए भेजा है।
अच्छा !अंदर आओ !मेरे हाथ भीगे हैं ,कहते हुए आगे बढ़ चली ,उसके पीछे चतुर चला ,उसे वह एक छोटी सी रसोई में ले गयी और एक बड़े भिगोने की तरफ इशारा किया ,जाओ !उसे उठा लो !चतुर अंदर गया और उस भिगोने को उठाने का प्रयास करने लगा। तब उसने पूछा -क्या तुम वही हो ?जो अभी कुछ दिन पहले आये हो।
जी !
क्या नाम है ?तुम्हारा !
चतुर !
हाँ ,उन्होंने यही नाम बताया था ,चतुर का नाम शायद उसने जानबूझकर पूछा था। अच्छा इसे आराम से ले जाना। चतुर के शहर में रुकने का कारण तो स्पष्ट नजर आ रहा है ,क्या यही कारण है ?या कुछ ओर भी है। जानने के लिए पढ़ते रहिये -रसिया
