Rasiya [part 22]

वह लड़का ,बहुत देर से सड़क पर भटक रहा था और ललचाई  नजरों से उस चाय वाले की दुकान की तरफ देख रहा था, क्योंकि रात भी उसने केले दो चार केले के सिवा कुछ नहीं खाया था। भूखा था, किंतु जेब में पैसे नहीं थे , ऐसे समय में , लोगों को चाय पीते हुए देखकर ,उसकी चाय पीने की लालसा बढ़ गई किंतु वह कोई भिखारी नहीं था, इस वक्त तो वह ,समय का मारा था। चाय वाला यह सब, देख रहा था , तब उसने इशारे से चतुर को अपने नजदीक बुलाया। जब चतुर उसके समीप गया ,तब उससे पूछा - क्या नाम है ?तुम्हारा , चाय पियोगे ? चाय वाले ने उससे सीधा प्रश्न किया।

चतुर !हमारा नाम ''चतुर भार्गव'' है। अपना परिचय देकर बोला - हां ,भूख तो लगी है, किंतु मेरे पास पैसे नहीं हैं ? चतुर का रहन-सहन और उसकी बोली सुनकर चाय वाले ने अंदाजा लगा लिया, कि वह किसी गांव से आया है किंतु पढ़ा लिखा है। 



चायवाले ने भी ,उसका जवाब सुनने से पहले ही ,उसके लिए एक गिलास में चाय करके ,उसके सामने रख  दिया, और पूछा-क्या बिस्किट भी लोगे ?

ले तो लूंगा ,किंतु  शायद ,आपने मेरी बात पर ध्यान नहीं दिया ,मेरे पास पैसे नहीं हैं । 

क्या घर से भाग कर आए हो ? चाय वाले ने फिर से सीधा प्रश्न किया। 

चतुर आश्चर्य से उसका मुंह देख रहा था , क्या यह कोई अंतर्यामी है? इसे कैसे पता चला ?कि मैं घर से भाग कर आया हूं। इसमें चौंकने वाली कोई  बात नहीं है, जो बच्चा इस तरह सड़क पर भटक रहा है, दिखने में पढ़ा -लिखा लग रहा है ,अच्छे परिवार का लग रहा है, और उसके पास पैसे भी नहीं है , हो सकता है ,किसी गलती के कारण या फिर पढ़ाई में फेल होने के कारण ,तुम जैसे बच्चे घर से भाग कर ही आते हैं। 

चाय वाले की, समझदारी पर चतुर मुस्कुराया और बोला -आपने सही पकड़ा , किंतु अभी घर वाले नाराज होंगे जब मैं अपने घर वापस जाऊंगा, तो आपकी चाय और बिस्कुट की पाई -पाई  चुका दूंगा। 

क्या ,इतना शीघ्र तुम्हारे परिवार वालों का क्रोध शांत हो गया होगा ?मुस्कुराकर उसने पूछा। 

चाय और बिस्कुट खाते हुए चतुर सोचने लगा, यह कह तो ठीक रहा है , अभी पिताजी को बहुत गुस्सा आ रहा होगा। हो सकता है ,मेरे भागने पर उनका गुस्सा और बढ़ गया हो , अब मुझे क्या करना चाहिए ?वह सोच रहा था। 

अभी कुछ दिन यहीं रहो ! जब उनका गुस्सा शांत हो जाएगा ,तब चले जाना, चाय वाले ने सुझाव दिया। 

आपका सुझाव तो अच्छा है, किंतु तब तक में रहूंगा कहां ? खाऊंगा क्या ? रोज-रोज तो आपसे फ्री की चाय नहीं पी सकता ,भूख भी लगती है, सारा दिन चाय पीकर भी तो गुजारा नहीं किया जा सकता। 

तुम्हें कुछ करना नहीं है, तुम यहीं रहना, मेरी इस दुकान की देखभाल करना, मैं चाय बनाकर दिया करूंगा, और तुम आसपास दुकानों पर,उसे बेचकर आना, पढ़े -लिखे हो। 

हाँ ,अभी बोर्ड की परीक्षा दी हैं। 

तब अच्छा हिसाब -किताब लगा सकते हो। दो वक्त की रोटियां मेरे ही साथ खा लिया करना। जब मन करे  चले जाना। 

चतुर सोच रहा था, कि इसने मुझे अपने यहां नौकरी का कार्य दिया है, मैं इसके यहां नौकर बनकर कार्य करूंगा, और इस बदले में मुझे इसकी दुकान की देखभाल करनी होगी, इसकी दुकान पर रात में सोना होगा, और आसपास चाय बेचनी होगी। 

क्या आपकी दुकान में और कोई नौकर नहीं है ?

एक पहले था, किंतु वह बिना पढ़ा -लिखा था, हिसाब -किताब नहीं जानता था, इसलिए मुझे उसे निकालना पड़ा। 

'' भागते भूत की लंगोटी भली'' ऐसे समय में चतुर को चाय वाले का सुझाव पसंद आया, और उसने उसके यहां यह कार्य करने का मन बना लिया।

अभी तो दिन की शुरुआत ही है ,अभी से काम पर लग जाओ !चायवाला अपनी होशियारी पर मुस्कुराया उसे कुछ दिनों के लिए ,मुफ़्त का नौकर जो मिल गया था। उसने कई नौकर रक्खे किन्तु जब पैसे देने की बात होती तो किसी न किसी बहाने ,उनके पैसे काट लेता। गिलास तोड़ दिया ,दो दिन छुट्टी की ,दूध उबाल दिया इत्यादि बहानों से उनकी पगार काटता इसीलिए कोई भी उसके यहाँ नहीं टिकता। चाय -बिस्कुट खाकर ,चतुर को थोड़ी राहत मिली दोपहर और शाम के भोजन का भी इंतजाम हो गया। तब उठकर बोला -अब बताओ ! क्या करना है ?

अब सबसे पहले तो तू ये सभी झूठे गिलास मांज ले ,इसके पश्चात ,दुकानें खुल जाएँगी ,तब चाय देकर आना ,दूध भी कम पड़ रहा है। तब तुझे एक दुकान बताऊंगा ,तुझे साईकिल चलानी तो आती है ,उसने चतुर से पूछा -चतुर ने हाँ में गर्दन हिलाई। तब तो बेटा ,वहां से दूध ले आना। बस इतना सा ही कार्य है। 

चतुर पहले तो खड़े होकर ,उसकी बातें सुनता रहा ,जब उसने झूठे गिलास देखे तो ठीठक गया, आज तक उसने अपने घर में कभी अपना झूठा एक भी बर्तन नहीं मांजा था और यहां इतने सारे झूठे गिलास....... 

चाय वाले ने उसकी तरफ देखा, और बड़े प्यार से शब्दों में मिश्री खोलते हुए बोला -बेटा !यह हमारा काम है, यह हमारी रोजी -रोटी है ,  इसी के कारण तो ,हमें दोपहर को और शाम को खाना मिलेगा। चतुर को इस विषय में सुना भी दिया, की भोजन एक कार्य हो जाने पर ही मिलेगा। 2 मिनट में हो जाएंगे, तुझे ऐसे ही लग रहा है। चतुर ने अपने मन को तैयार किया, और गिलास धोने में जुट गया उसने फटाफट से सभी गिलास धो डाले और बैठ गया। उसे बैठा हुआ देखकर, चाय वाला बोला -अब बेटा ! साईकिल लेकर ,भाग कर जा और फटाफट से 5 लीटर दूध ले आ, कहते हुए उसे रास्ता समझने लगा। 

रास्ता समझ कर चतुर, दूध वाले की दुकान पर पहुंच गया, और उससे 5 लीटर दूध मांगा। जब दूध वाला दूध नाप रहा था, तब उसने उसकी साइकिल और डिब्बा देखा, तो वह उससे पूछा -क्या तुम चाय वाले की दुकान पर लगे हो ?

ह्म्म्मम्म ! चतुर ने हुंकार भरी। 

तुम्हें कितने में रखा ?

क्या मतलब ?

कितना वेतन दे रहा है ? वह !

न... न....  भैया !तुम गलत समझ रहे हो, मैं कोई नौकरी नहीं कर रहा हूं ,मैं तो बस उनकी सहायता कर रहा हूं। 

क्या तुम उसके रिश्तेदार हो ?

नहीं तो...... 

मैं तो नहीं जानता भी नहीं, अपने गांव से आया था, मुझे उन्होंने चाय बिस्किट खिलाएं , बदले में मैं उनका कार्य कर दिया, इसमें क्या हो गया ?

दूधवाला ,चतुर की बात सुनकर, व्यंग्य से मुस्कुराया। चतुर दूध लेकर वापस आ गया। 

चाय वाले ने पूछा -बड़ी देर लगा दी , उसके यहां दूध लेने वालों की बड़ी भीड़ थी इसलिए समय लग गया। धूप भी बढ़ती जा रही थी। चतुर को गर्मी लगने लगी थी, दुकानदार तो, अंदर दुकान में बैठा था ,  दुकान में एक आदमी के अलावा, दूसरे आदमी के लिए जगह ही नहीं थी। 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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