आज भोला को दुकान खोलने में देर हो गई, मलिक आते ही होंगे ,नाराज होंगे। वह शीघ्र अति शीघ्र दुकान की ओर बढ़ चला। जब वह दुकान, के समीप पहुंचा तो उसने देखा, कोई लड़का उसकी दुकान के सामने सो रहा था। यहाँ पता नहीं ,कहां-कहां से चले आते हैं ? मन ही मन बड़बडाया और बोला -अरे उठ ! कौन है ?तू , यहां क्यों सो रहा है ? जल्दी खड़ा हो, मुझे दुकान खोलनी है। कहते हुए ,भोला ने, उस सोते हुए लड़के पर, पैर से हल्की सी ठोकर मारी।
वैसे तो उसकी आवाज से ही , उस लड़के की आंख खुल गई थी किंतु पैर की ठोकर लगने पर, एकदम से उठ खड़ा हुआ। उसे बहुत बुरा लगा, और बोला -उठ रहा हूं , क्यों आफत मचा रखी है ?
भोला भी कम थोड़े ही था, अकड़ते हुए बोला-एक तो दुकान के सामने सो रहा है, ऊपर से हमें ही अकड़ दिखा रहा है। पता नहीं ,कहां कहां से चले आते हैं ?कहते हुए ताला खोलने लगा और दुकान का शटर खोल दिया। अब जा यहां से, मुझे सफाई करनी है ,मालिक आते ही होंगे कहकर भोला अपने कार्य में व्यस्त हो गया।
उस लड़के ने ,भोला की तरफ घूरकर देखा, और मन ही मन बुदबुदाया -साला !नौकर है ,तब इतनी अकड़ दिखा रहा है, मालिक होता, तो न जाने क्या करता ? वह उस दुकान के सामने से तो उठा आया,आस -पास नजरें घुमाकर देख रहा था ,कि इस समय वह कहाँ है ?धीरे-धीरे बाजार खुल रहा था। इस समय, चतुर ने अपने आप को, शहर के किसी बाजार में पाया। नजदीक ही एक चाय वाले की दुकान खुली हुई थी ,उस पर कुछ लोग बैठे, वार्तालाप कर रहे थे. तो कुछ चाय पी रहे थे, और कुछ समाचार -पत्र में, चेहरा छुपाए हुए थे।वह लड़का भी वही ,पास पड़ी बेंच पर, बैठ गया , और आसपास के वातावरण को समझने का प्रयास करने लगा। कुछ लोगों ने उसकी तरफ देखा और उसे नजरअंदाज कर अपने कार्य में व्यस्त हो गए। उसकी भी इच्छा हुई, कि वह भी चाय पी ले , रात्रि में भी ,कुछ खाया नहीं था। बैठकर सोच रहा था -उसकी एक ही, मस्ती उसके लिए कितनी भारी पड़ गई ? इसका उद्देश्य तो मौज -मस्ती करने का ही था किसी को कष्ट पहुंचाने का तो नहीं था, किंतु अनजाने ही कष्ट तो पहुंचा , और वह यह भी जानता था कि उसका परिणाम, उसकी पिटाई और घरवालों के झगड़े से होगा। हालांकि उसके माता-पिता उससे बहुत ही प्रेम करते हैं किंतु गलत तो गलत ही है। 'हाथ की हड्डी टूटना' कोई मामूली बात नहीं है, उसका मजाक ठहरा और किसी की जान पर बन आई। यही सोचकर वह, वहीं कहीं छुप गया था।
सोच रहा था -जब, मामला कुछ ठंडा पड़ जाएगा ,तब वह बाहर निकल आएगा, तब तक उसे पता नहीं था कि चिराग के हाथ की हड्डी टूटी है, किंतु जैसे ही, उसे पता चला कि उसके हाथ की हड्डी टूटी है, उसके शरीर की सारी हड्डियां चटकने लगीं। वह बुरी तरह डर गया, और कहीं कोई उसे न देख ले ,इसी डर से वह खेतों की तरफ भाग गया। बहुत देर तक खेतों में ही, घूमता रहा, अनजाने ही पगडंडी से होते हुए, शहर की सड़क के करीब आ गया अंधेरा बढ़ रहा था। वह जानता था ,कि घर में सभी परेशान हो रहे होंगे, और उसे ढूंढ भी रहे होंगे, किंतु उसका डर ,उसे वापस जाने से इनकार कर रहा था।
चलते-चलते वह शहर तक पहुंच गया, लेकिन यहां भी, किसी को जानता नहीं, क्या करें ? लोगों की भीड़ है ,यहाँ ,किन्तु कोई अपना नजर नहीं आता। अकेला इधर -उधर भटकता रहा। भूख लगी ,तब अपने वस्त्र टटोले ,ऊपर कमीज़ की जेब में ,चार-पांच रुपए मिल गए ,उनसे दो-चार केले लेकर खा लिए। सड़कों पर यूँ भटकता रहा। सरकारी नल से प्यास बुझाई ,धीरे -धीरे सड़कों की भीड़ भी कम होने लगी। सूनी सड़कें डरा रही थीं। घर की याद भी आ रही थी। कुछ लोग सड़कों पर ही ,अपना बसेरा बनाये थे ,वहीं चादर ओढ़ बिस्तर भी बना लिया। आज ज़िंदगी में पहली बार ,उसने ऐसी रात्रि देखी है। लोग इस तरह रहते और सोते भी हैं ,अब तक तो किताबों में ही गरीबी पढ़ी थी ,किन्तु आज प्रत्यक्ष देख रहा था। वह उन लोगों को देख रहा था ,किन्तु जब वे उसे देखते ,वहां से हट जाता।
अब वह भी थक चुका था ,सोने के लिए कोई स्थान ढूंढ़ रहा था ,जब सोने के लिए कोई स्थान नहीं मिला तो एक दुकान के सामने थक -हारकर लेट गया और आंखें मूँद लीं, उसे स्मरण हो रहा था, यदि अपने घर पर होता, तो मां के हाथों का गरमा -गरम खाना खा रहा होता। मक्खन से या देसी घी की चुपड़ी रोटी होती , यह सोचकर उसकी भूख बढ़ने लगी। सच में ही उससे बहुत बड़ी गलती हो गई, किंतु पछताने से क्या होता है ? हो सकता है ,इस वक्त वह भोजन न करके, पिता की मार खा रहा होता। मार पड़ भी जाती तो क्या हो जाता ?जब गलती की है ,तो मार से क्या डरना ? अपने माता -पिता ही तो हैं ,जब प्यार करते हैं ,तो मारने या डांटने के लिए ,कहाँ जायेंगे ?जिस पर अधिकार होता है ,उसे ही तो समझाते या डांटते हैं। यह भूख भी न..... कितनी समझदारी दिखला रही है ?यही समझदारी उस समय न जाने कहाँ चली गयी थी।
बेचैनी से उठा ,और नल पर पानी पीकर जठराग्नि को थोड़ा शांत किया। वापस आकर उसी स्थान पर लेट गया। होने को तो कुछ भी हो सकता है, किंतु अब यह हो गया है कि मैं आज अपने घर से बेघर हो गया हूं। रहने का और सोने का कोई ठिकाना नहीं, सोचते -सोचते न जाने कब, उसे नींद आ गई ? सुबह जब आंख खुली तो उसने अपने आपको, किसी दुकान के बाहर पाया। जिसका नौकर अभी कुछ देर पहले उसे गाली देकर उठा रहा था। भूख भी लगी है और चाय पीने की भी इच्छा हो रही है, किंतु क्या करें ?क़मीज की जेब में जो, पैसे पड़े थे ,उनसे तो उसने कल केले ले लिए, अब तो शायद चाय पीने के भी पैसे नहीं है। बराबर में ही ,नाई की दुकान भी थी, उसके आईने में ,उसने अपने आप को देखा।
किसी भिखारी की तरह लग रहा हूं। सोचकर ललचाई नजरों से चाय वाले की तरफ देखने लगा, चाय वाले भी तेज नजर रखते हैं ,सुबह से शाम तक इतने लोगों को देखते हैं, उनसे मिलते हैं, उन्हें चाय पिलाते हैं। उनकी बातें सुनते हैं ,उनकी नज़रें और सोच एकदम तेज हो जाती हैं। परखने की शक्ति भी बढ़ जाती है। वह लड़का ही नहीं, बल्कि चाय वाला भी उसे देख रहा था कि यह लड़का न जाने कितनी देर से बैठा है ?इधर ही देख रहा है ,कपड़ों को देखकर तो लग रहा है ,अच्छे परिवार का है। कहीं जा भी नहीं रहा है, धीरे-धीरे लोगों की भीड़ कम होने लगी। चाय वाले को थोड़ा आराम मिला। तब उसने हाथ के इशारे से उसे अपने पास आने का आग्रह किया '' अंधे को क्या चाहिए दो आंखें '' उस लड़के को भी लगा -शायद ,भगवान ने उसकी सुन ली। वह चाय वाले के पास गया, और बोला-आपने मुझे बुलाया।
