Andheri gliyan

''अंधेरी गलियां ''इस शीर्षक से क्या तात्पर्य है? हम इसका क्या अनुमान लगा सकते हैं ,? क्या ? ये  वह अंधेरी गलियां हैं , जब गांव में बिजली नहीं होती थी, रोशनी का अभाव था ,रात्रि में अंधेरी गलियों में, भी हम बच्चे खेलते -कूदते थे, चाँद की रौशनी ,में ही खुश हो लेते। कभी टोर्च की रोशनी में ,तो कभी लालटेन के  उजाले में भी मस्ती करते थे। भले ही, गांव में बिजली नहीं थी ,'गांव की गलियां अंधेरी तो होती थीं किंतु एक दूसरे का साथ था। मस्ती भी बहुत थी, ऐसे में किसी को डराने में भी ,बहुत मजा आता था। इन्हीं गलियों से निकलकर कुछ होनहार पढ़ -लिखकर बाहर गए। अभाव में भी ,आगे बढ़ने की चाहत थी। यही वह अंधेरी गलियां हैं जो बड़े होने पर भी ,आज भी स्मरण हो आती हैं, हालांकि अब वहां, पहले जैसी 'अंधेरी गलियां' नहीं रहीं , सड़के बन गई हैं। खंबे से भी प्रकाश होता है,गांवों का शहरीकरण जो हो गया है। 


वे  'अंधेरी गलियां,' जिनमें जाते हुए डर लगता था, सूनापन खलता था, इंसान जाते समय भी। अगर कोई साथ में हो तो हाथ में हाथ पकड़ कर चलता था। अकेले जाने का तो साहस ही नहीं कर पाता था, ऐसी अंधेरी गलियां जिन में लगता था। शायद कोई हमें घूर रहा है, या फिर पीछे से आकर कोई हमारा गला न द बोच ले। ऐसी अंधेरी गलियों में कभी-कभी जाना पड़ जाता था। तब टाँगें काँपने  लगती थीं , मस्त हवा में भी पसीने छूट जाते थे। जब किसी का सुनाया हुआ ,कोई किस्सा स्मरण हो आता था। वहां पर, एक आत्मा भटक रही है, उस पेड़ के नीचे मत जाना, उस गली में मत जाना। वह ''अंधेरी गली'', कितनी भयावह लगती थी ? चाहे वहां से हम आराम से निकल जाएं, किंतु अंदर का भय कई मौत मार देता था। ऐसे में कोई कंकर -पत्थर, या कोई कांटा भी चुभ जाए ,उससे बेपरवाह चुपचाप बाहर निकलने का प्रयास करते और यदि ऐसे में, कोई पीछे से आकर हाथ थाम ले या दुपट्टा पकड़ ले। तब तो चीख निकलती ही निकलती। इतनी भयावह है "अंधेरी गलियां " चाहे किसी चुड़ैल या भूत का सामना न भी करना पड़े , किंतु उसे सन्नाटे में , न जाने कितने विचार उमड़ आते और एक काल्पनिक भूत या चुड़ैल, उसकी आंखें उस अंधेरी गली में हमारा पीछा करती रहती और हम सांस रोक कर आगे बढ़ते रहते, जब तक कोई अपना न दिख जाए। 

ऐसी सुनसान ''अँधेरी गलियां ''एक जवान और हसीन लड़की के लिए,दुर्घटना का कारण भी बन जाती हैं। जो जीवनभर का सबक बन जाता या फिर मान -सम्मान और जान पर बन आती,ऐसी सूनी और ''अँधेरी गलियाँ ''किसी खतरे से कम नहीं। 

''अंधेरी गलियां ''कुछ शहरों में भी होती हैं, वह शहर जो चकाचक रोशनियों से भरा है, कहने को तो वे , ''गलियां अंधेरी ''होती हैं किंतु उनमें जगमगाहट रात में ही होती है। जब सारी दुनिया सोती है, तो वे गलियां जगती हैं। उन अंधेरी गलियों में, शहर के कुछ शराफत से भरे, सफेदपोश  इंसान नजर आ जाते हैं। उनके लिए वह गलियां, जगमगाहट मौज -मस्ती, जिंदगी जीने की इक नई दुनिया है। न जाने उन्हें ''अंधेरी गालियां'' क्यों कहते हैं ? क्या इसलिए? कि वहां जाकर लोग, अपने मन की संपूर्ण कालिख़ वहीं पर छोड़कर आ जाते हैं , उनके पाप के कारण, वे गलियां अंधकारमय हो जाती हैं या फिर जो उन गलियों में रह रहीं  हैं, उनका जीवन अंधकारमय नजर आता है। उनके जीवन में सिर्फ लोगों को खुश करना , उनकी जिंदगी उन गलियों में ही ,सिमट कर रह जाती है क्योंकि वह अपने ऊपर उस समाज की गंदगी को वहन करती हैं। क्या वे नहीं जानते, कि इन गलियों में, समाज का कितना बड़ा कचरा साफ होकर निकलता है ? यदि वे गलियां न हों , तो समाज की वह गंदगी कैसे साफ होगी ? उनके जीवन में तो अंधेरा रहता है किंतु दूसरों के जीवन में तो रोशनी फैलाती  हैं। दिन भर की थकन , वहां लोग उतारकर आ जाते हैं, और सुबह को फिर, एक सभ्य, और शालीन व्यक्तित्व नजर आते हैं। 

उन गलियों में ,वे महसूस करती हैं, कि समाज के कितने चेहरे हैं ? वह पढ़ती हैं, लोगों के कुछ अनकहे पल , अपने दर्द को समेट कर, दूसरे के दर्द को सुनती हैं। समाज से कट जाती हैं , समाज उन्हें, रोशनी में नहीं अपनाता , किंतु अंधेरे में, कुलीन सभी एक साथ नजर आते हैं। तब वे  देखती हैं ,समाज का दोहरा चेहरा, वहां पर न जाने कितनों के मुखौटे उतर जाते हैं ? सभी के दर्द को अपने अंदर समेट लेती हैं। वह ''अंधेरी गलियां ''जो दूसरों की जिंदगी में उजाला भरती है , नदी का जितना भी कूड़ा करकट है, वही बाहर आ जाता है , और वह नदी स्वच्छ होकर, फिर से अपने अंदाज में बहने लगती है। 

कैसी है ?वे' अंधेरी गलियां ! जिनका अपना कोई सहारा नहीं होता, किंतु दूसरों को सहारा देती हैं । इंसानों की परख करती हैं। समाज में रहकर भी इंसान जिंदगी भर रोता रहता है, कोई अपना नहीं है, सब मतलबी हैं ,स्वार्थी हैं किंतु यह ज्ञान तो उन्हें बरसों पहले ही हो जाता है। अपने जख्मों को स्वयं ही भरना है , और जिंदगी में आगे बढ़ना है। इतना सब करने के बाद भी, उनका कोई सम्मान नहीं है, सम्मान से ही उन्हें क्या करना है ? बस जीवन जीना है और इन 'अंधेरी गलियों 'को रोशन करना है। 

ऐसी भी अंधेरी गलियां है, जहां पर गरीबी पलती है, मेहनत की दो वक़्त की रोटी खाते हैं ,पैसा नहीं है किन्तु सम्मान से जीना जानते हैं। लड़ते हैं किन्तु साथ हैं ,मिलकर ज़िंदगी को टक्कर देते हैं। हँसते ,मुस्कुराते है ,दुःख -सुख बाँट लेते हैं। महलों के सामने, झोपड़ी टाट की तरह है, टक्कर लेती है ,ऐसे लोगों से, जो उनकी गरीबी का मजाक उड़ाते  हैं । वह स्वयं व्यंग कसती है उन महलों पर, दिखला देती है। मेरे ही कारण, महल की शान नजर आती है। उन अंधेरी गलियों, से निकलकर ही, वे महिलाएं उन महलों में काम करने आती हैं और महलों के अकेलेपन को बाँट चली जाती हैं। 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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