जब से चतुर के कारण ,चिराग़ के हाथ की हड्डी टूटी है ,तब से चतुर भी न जाने कहाँ चला गया ? सबको चतुर की मस्ती के कारण ,उस पर क्रोध था किन्तु अब सभी को चिंता है। न जाने कहाँ चला गया ? रातभर दोनों पति -पत्नी परेशान रहे ,रामप्यारी तो रोकर और पूछकर मन हल्का कर लेती किन्तु श्रीधर जी ,शांत लेटे रहे ,बेचैनी बढ़ती तो बिस्तर से उठकर ,टहलने लगते ,कभी पानी पीते और वापस आकर लेट जाते। कुछ देर के पश्चात ,दोनों छत पर चले गए ,ताकि दूर से किसी भी आते -जाते ,आदमी को देख सकें। अँधेरे में भी ,नजरें इसी तरह टकटकी लगाए थीं। देखते ही देखते न जाने कब चिड़ियों की चहचाहट सुनाई देने लगी ?
दिन निकल रहा है किंतु चतुर अभी तक नहीं आया ,रामप्यारी विह्वल होकर रोने लगी, उसको इस तरह रोते हुए देखकर ,अब श्रीधर जी को भी उस पर क्रोध आ गया और बोले- जब तो उसे लाड़ लड़ाती थी ,कभी उसे डांटा नहीं ,वह अपनी गलती के लिए हमसे छुपा हुआ है। तुम इस तरह रो रही हो ,जैसे वह मर गया हो , वह मरा नहीं है। उनका क्रोध उनके शब्दों में ढ़लकर बाहर आ रहा था। उन्हें चिंता के साथ-साथ उस पर क्रोध भी था, कम से कम एक बार अपने माता-पिता से मिल तो लेता, हमसे बात कर लेता। ज्यादा से ज्यादा हम क्या करते ?उसकी पिटाई कर देते, या उसे समझाते किंतु हमारे कलेजे का टुकड़ा हमारे साथ तो रहता शायद न भी करते ,ऐसा सोचकर ,मन को समझा रहे थे।
दिन निकलने पर ,अब गांव में भी ,चहलकदमी होने लगी थी, और जो जानते थे ,कि चतुर घर पर नहीं आया आते ही ,उन्होंने पहले श्रीधर जी से पूछा -क्या बेटा घर आया ? किंतु उनके चेहरे को देखकर शांत हो जाते और कहते हम भी उसे ढूंढने का प्रयास कर रहे हैं। जब जहां कहीं भी मिलेगा , हम उसे लेकर आएंगे आप फिक्र ना करें , यहीं कहीं छुपा होगा कह कर चले जाते। दोनों पति-पत्नी रात भर के जगे हुए थे, सिर में भी दर्द होने लगा था, न सोने के कारण ,आँखें भारी हो रहीं थीं। तब राम प्यारी बोली-एक कप चाय बना लाती हूं।
श्रीधर जी बोले -नहीं ,रहने दो !
तब रामप्यारी बोली -अभी तो मुझे समझा रहे थे -'गया है ,तो आएगा भी ''इस तरह से तो आपकी तबियत बिगड़ जाएगी। उसके आने तक तो हमें ,स्वस्थ रहना ही होगा कहते हुए जबरदस्ती चाय बना लाई। चाय पीकर श्रीधर जी, आंख मीचकर लेट गए ,उनका कहीं भी ,बाहर जाने का मन नहीं कर रहा था। रामप्यारी भी, क्या करें ? रात की बची रोटियों , को दोबारा सेककर,उनमें थोड़ा घी लगाकर, पराठे की तरह बना रही थी। अपने से ज्यादा उसे श्रीधर जी की चिंता थी,बेटा तो गया ही, किंतु इनकी तबीयत बिगड़ गई तो...... क्या होगा ? उसकी इसी सोच ने उसे, मजबूत बनाया।
श्रीधर जी की शायद आंख लग गई थी। चतुर घर आ गया था ,बेटे से कह रहे थे- तू कहां चला गया? क्या तुझे अपनी मां की तनिक भी फिक्र नहीं ,सारी रात रोती रही।
पिताजी ! मैं तो यही छुपा हुआ था, कलुआ के घर के पीछे , तभी उन्हें किसी की आहट सुनाई दी और उनकी आंख खुल गई।
देखा तो, सामने, राम प्यारी थाली में, रोटी -सब्जी लिए खड़ी थी। उन्हें इस तरह देखकर बोली -क्या हुआ ? नींद आ गई थी ? थोड़ा सा भोजन कर लीजिए तबियत बिगड़ जाएगी। तब उसको नए सिरे से ढूंढते हैं। श्रीधर जी को, जैसे विश्वास हो गया था ,कि स्वप्न में चतुर ने जो जगह बताई है, वह वहीं छुपा हुआ होगा। और रामप्यारी से बोले -मुझे पता चल गया है ,वह कहां छुपा है ?
कैसे ? उन्होंने रामप्यारी के सवाल का जवाब देना उचित नहीं समझा,और वे उठकर शीघ्र अति शीघ्र बाहर निकल गए। रामप्यारी समझ रही थी, पिता हैं , अपना दर्द कह नहीं सकते , किंतु अपने बच्चे को ढूंढने का प्रयास तो कर ही सकते हैं। न जाने ,उन्हें कैसे पता चला ? थाली वापस ले गई।
श्रीधर जी मन ही मन सोच रहे थे -बेटे को वापस घर लेकर जाऊंगा ,तब मिलकर सभी साथ बैठकर भोजन करेंगे ,उन्हें आस बँध गई थी। मन में प्रसन्नता की लहर दौड़ गयी थी ,कदम तेजी से उस ओर बढ़े। वे कलवा के घर के पीछे जा पहुंचे। वहां आसपास झाड़ खड़े थे, गंदगी हो रही थी किंतु उन्होंने इस बात की परवाह नहीं की और वहीं से खड़े होकर जोर-जोर से, आवाज लगाने लगे-चतुर कहां है तू ! आजा बेटा !मैं तुझे लेने आया हूँ ,मैं तुझे मारूंगा नहीं ,गलतियां तो सबसे हो जाती हैं। किंतु वहां चतुर होता तो बोलता ,जब कोई जबाब नहीं आया तो अंदर जाने लगे।
तब एक व्यक्ति ने उन्हें टोका ,चचा कहां जा रहे हो ?यहाँ कोई नहीं है ,कल भी तो ढूंढा था।
वह उससे कहने ही वाले थे कि स्वप्न में उसने ही ,मुझे बताया था, किंतु कहते-कहते रुक गए, कहीं इसे यह न लगे, 'मैं बेटे के प्यार में, पगला रहा हूं।' अपने आप को संभालते हुए बोले -अच्छा , मुझे ऐसा लगा कि शायद हमने यहां नहीं देखा था इसलिए देखने चला आया।
कोई बात नहीं, हमारा बालक है हमें तो, जहां उम्मीद होगी ,देखना ही होगा, इतना छोटा भी नहीं है , आप घर चले जाओ ! हो सकता है ,डर के कारण गांव से ही बाहर चला गया हो। चिंता ना करो !आ जाएगा। उसने ,उनका हाथ पकड़कर, उन झाड़ियां से बाहर निकाला और समझाते हुए बोला -बच्चा बड़ा हो रहा है , सही -गलत तो समझने लगा है। उसे लगा होगा कि गलती तो उससे हुई है , तभी वह या तो कहीं छुप गया है या फिर चला गया है। भूख और प्यास लगेगी तो आ जाएगा। वह उनके साथ चले जा रहा था, और उन्हें समझाते भी जा रहा था -मेरे मामा का लड़का था, उसने भी एक बार ऐसे ही गलती कर दी थी ,डर के कारण शहर छोड़ कर ही भाग गया।
फिर क्या हुआ ? दिलचस्पी लेते हुए श्रीधर जी ने पूछा।
होना क्या था ? दो-चार दिनों में धक्के खाये ,भूख -प्यास से बेहाल हुआ, जब अकल ठिकाने आई तो घर वापस आ गया।' यह उम्र ही ऐसी होती है, करने से पहले सोचते नहीं, किंतु यह उम्र सबक भी सीखाकर जाती है। चचा !आप चिंता न करें ! अगर गांव में नहीं हुआ तो दो-चार दिन में भटक कर आ जाएगा।
श्रीधर जी उसका चेहरा देख रहे थे, उसने कितनी आसानी से कह दिया ? किंतु तब तक हमारा क्या होगा ? उसकी मां की तो हालत रो-रोकर खराब हो गई है , फिर सोचा -यह भी क्या कर सकता है ? यह जिंदगी है, हर आदमी एक दूसरे को समझाता ही रहता है, किंतु स्वयं समझने का प्रयास नहीं करता। दूसरों के लिए तो उसकी समझ ,न जाने कहां से आ जाती है ? किंतु जब अपने पर बितती है, वही समझदारी न जाने कहां चली जाती है ?'' श्रीधर जी को उनके घर तक पहुंचा कर, उसने दोबारा उन्हें समझाया -आ जाएगा !शांत स्वर में बोला -आप चिंता ना करें ! मैं शहर की तरफ जा रहा हूं , यदि शहर की तरफ गया होगा तो शायद मुझे ही मिल जाए। हम सभी उसकी तलाश में हैं, आखिर वह इस गांव का बच्चा है।
श्रीधर जी एक ही रात्रि में, न जाने कितने कमजोर हो गए थे ? ऐसा लग रहा था ,जैसे उन्हें बुढ़ापा आ गया, कमजोरी महसूस कर रहे थे, थके -थके से लग रहे थे, ऐसा लग रहा था, जैसे जीवन में कुछ उत्साह रह ही नहीं गया है। घर में प्रवेश करते हैं, रामप्यारी तो जैसे टकटकी लगाये , दरवाजे के सामने ही बैठी रहती है, उन्हें देखते ही बोली - कहां चले गए थे ?
एक जगह मुझे लग रहा था, शायद हमने नहीं ढूंढा इसलिए वहीं ढूंढने गया था, उन्होंने रामप्यारी को यह नहीं बताया ,कि स्वप्न में ही, चतुर ने उन्हें बताया था -कि वह कहां छुपा है? और वह इस स्वप्न पर विश्वास करके, उसे ढूंढने भी निकल गए थे।
अच्छा चलो! खाना खा लेते हैं , राम अवतार का लौंडा कह रहा था -हम सभी उसे ढूंढने में लगे हैं, उनका भी उसके भी मामा का लड़का, इसी तरह घर से गायब हो गया था।
फिर क्या हुआ ?रामप्यारी ने भोजन गर्म करते हुए बोली।
होना क्या था? ससुरा !चार -पांच दिन में वापस आ गया , जबरदस्ती हंसते हुए बोले ,जैसे अपने आप को समझ रहे हो किन्तु राम अवतार के लड़के का उन्हें समझाना जाया नहीं गया।
कहां चला गया था ?
किसी दूसरे शहर में भटक रहा था, जब घर की याद आई तो वापस लौट आया , मुझे लगता है, हमारा चतुर भी शायद यदि गांव से बाहर गया होगा ,तो कुछ दिनों में वापस लौट आएगा।
ऐसा हम कैसे कह सकते हैं ? नहीं आया तो........
कभी भी अच्छे शब्द नहीं बोलती , रामप्यारी के इन शब्दों पर उन्हें क्रोध आया। अभी रोटी का कौर मुंह में डालने ही वाले थे, एकदम से रुक गए और बोले -कभी तो शुभ बोल लिया कर......
मैं क्या ,अपने बच्चे का बुरा चाहूंगी, लेकिन मेरे मन में अनेक ख्याल आते हैं, विचार आते हैं, उन्हें तो नहीं रोक सकती भर आई आंखों को ,अपने साड़ी के पल्लू से पोंछते हुए बोली। अच्छा कुछ खा लो ! हो सकता है ,दोपहर तक ही आ जाए। किंतु राम प्यारी के मन में एक विचार और रह -रहकर उभर रहा था , कहीं चिराग के घर वालों ने ही तो ,उसे कुछ नहीं कर दिया , उसका भाई भी तो कह रहा था ,कि जैसे उसने मेरे भाई का हाथ तोड़ा है ,मैं भी उसका हाथ तोड़ दूंगा। कहीं बदला लेने के लिए उसके भाई ने ही तो ,हमारे चतुर को, कुछ कर दिया होगा । विचार था ,कि उमड़े जा रहा था, और अपना विस्तार बढ़ा रहा था किंतु श्रीधर जी से कहते हुए ,घबरा रही थी। कहीं चिराग के घर वालों ने ही तो, मेरे बच्चे के साथ कुछ कर तो नहीं दिया होगा और उसकी नजरों के सामने दृश्य घूम रहा था -कि जैसे उसके बेटे को मार रहे हैं और उसे जमीन में दफना रहे हैं। ''अपनी ही सोच के लिए ,उसने अपने सर को झटका दिया, सच में ही मैं बहुत गलत सोचने लगी हूं, अपने मन को धिक्कारा और और उसे समझाया , ऐसा कुछ भी नहीं होगा। भगवान ! अच्छे लोगों के साथ अच्छा ही करते हैं, हमने ऐसा किसी का बुरा भी नहीं किया।
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