चतुर,के थोड़े से मजाक के कारण, चिराग के हाथ की हड्डी टूट गई। जिसके कारण, उसके घर वाले भी अत्यंत क्रोधित हुए ,तब भी रामप्यारी अपने बेटे की तरफदारी कर रही थी। तब श्रीधर जी उसे टोकते हैं -यह तुम क्या कह रही हो ? तुम्हें पता है, चिराग के बाप ने मुझे कितनी बातें सुनाई है ? हमारे बेटे चतुर की शरारतें भी , दिन पर दिन बढ़ती जा रही हैं। इसको डांटना आवश्यक हो गया है , तुम्हारे लाड- प्यार की वजह से ही ,यह बिगड़ता जा रहा है। आज तो इसने ,यह हरकत गांव में की है ,कल को बाहर पढ़ने गया ,तब क्या होगा ? मैं किस-किस से दुश्मनी मोल लेता फिरूंगा ?मुझे सब पता है ,मुझे उसके साथ केेसा सुलूक करना है ? मुझे मत पढ़ाओ ! क्रोधित होते हुए बोले।
अपने पति की बात सुनकर रामप्यारी चुप हो गई, और उसकी प्रतीक्षा में, खाना बनाने में व्यस्त हो गई किंतु रात्रि बढ़ती जा रही थी और चतुर का कहीं नामोनिशान नहीं था। अब उसे भी,चतुर की चिंता सताने लगी ,कहीं किसी ने कुछ कर -करा तो नहीं दिया। या डर के कारण ,कहीं छुपा बैठा होगा, उसके दोस्तों के घर जा जाकर पूछा - क्या तुम्हें चतुर मिला ?
नहीं ,हमें तो तब से ही चतुर दिखलाई नहीं दिया। जब चिराग को लेकर जा रहे थे ,उसके पश्चात वो हमने नहीं दिखा चाचा जी श्याम बोला।
धीरे -धीरे यह बात सम्पूर्ण गांव में फैल गई कि चतुर कहीं भी नहीं मिल रहा है। अब उसके माता-पिता को शक हुआ, कहीं, चिराग के घर वालों ने ही तो ,हमारे चतुर को कुछ कर तो नहीं दिया। आखिर चतुर कहां गया ? श्रीधर जी और रामप्यारी, चिराग के घर पहुंच गए और उसके परिवार से पूछा -हमारा चतुर कहां है ?
हमें क्या मालूम ? हमारे बेटे का उसने हाथ तोड़ दिया। उसका मजाक ठहरा और इसकी जान पर बन आई , आपने उसे ,क्या यही संस्कार दिए हैं ? और अब भी हमीं से पूछ रहे हैं ,कि आपका बेटा कहाँ है ?जैसे तुम्हारे बेटे को हमने ही छुपा दिया।
मुझे एकबार ,दिख जाये ,तो उसके इसी तरह हाथ तोड़कर कह दूंगा ,'मज़ाक कर रहा था ',चिराग़ के भाई ने क्रोधित होते हुए कहा।
हम उसकी गलती मानते हैं, किंतु यह सब उसने जानबूझकर तो नहीं किया ,और बच्चे भाग रहे थे ,वह भी तो भाग सकता था। इसे दीवार पर चढ़ने की क्या आवश्यकता थी ?उसने थोड़े ही ,चढ़ाया था और रही बात तेरी अकड़ की ,मेरे लड़के के जरा भी हाथ लगाया न....... तो छोडूंगी नहीं ,यहीं चीरकर रख दूंगी। ये तो वैसे ही ,उस पर तमतमाए बैठे हैं ,और वो भूखा -प्यासा इनकी मार के ड़र से न जाने कहाँ छुपा बैठा है ? कहते हुए ,क्रोधित रामप्यारी ने अपने पति की तरफ देखा ,जो उसकी तरफ घूरकर देख रहे थे। तब रामप्यारी को लगा ,शायद ,उसने ,इनके घर आकर कुछ ज्यादा ही कह दिया। तब अपने लहज़े को बदलते हुए बोली - देखो जी ,बालक तो सभी समान हैं ,चिराग़ ही नहीं और चतुर भी तुम्हारा ही बालक है। इस गांव का बच्चा है ,वह डर के कारण ,न जाने कहाँ गया ? कहते हुए रोने लगी ,न जाने इस गर्मी में ,रात्रि में कहाँ गया होगा ? वह हमें मिलना भी तो चाहिए।
तो यहां क्या कर रहे हैं, जाकर उसे बाहर ढूंढिये ! चिराग के पिता भी अकड़ते हुए आये किन्तु उनकी पत्नी ने उनका हाथ दबाया ,उन्हें शांत रहने का इशारा किया और बोली - हाँ ,जी बालक तो सभी समान हैं ,देखिये ! बहन जी ,कैसे रो रही हैं ? बेचारा ,बच्चा न जाने कहाँ होगा ?आप भी इनकी सहायता करवा दीजिये। अँधेरा भी बढ़ रहा है ,बैटरी ले जाइये !और इनकी सहायता कीजिये।
गलती उनके बेटे की थी, इसीलिए चुपचाप सहन करके आ गए। न जाने कहां चला गया है ? मैं कह रही थी ,न...... वह डर गया होगा। कम से कम उसे ढूंढिए तो सही ,अब तक श्रीधर जी का क्रोध चिंता में ,तब्दील हो गया था। रामप्यारी को घर में रहने के लिए ही कहा ,वे घर से बाहर आ ,दो -चार आदमियों को साथ लेकर ,टॉर्च की रौशनी में ,उसे ढूंढ़ रहे थे और जोर-जोर से आवाज लगाकर चतुर को पुकार रहे थे -चतुर ! हम तुम्हें मारेंगे नहीं ,बेटा !जहां भी हो आ जाओ ! जहाँ भी कोई ऐसा स्थान था कि उसके छुपने की संभावना थी। वहीँ उसे ढूंढा खेतों की तरफ भी गए। रात्रि में बाग़ में जाने का साहस तो बड़ों में भी नहीं था। हार -थककर वापस आ गए।
श्रीधर जी को इस तरह ,अकेले निराश देख रामप्यारी रोने लगी,उसने भी संभावित जगहों को गिनवाया। किन्तु श्रीधर जी ने बताया -कि कोई जगह नहीं छोड़ी। जो लोग उनके साथ चतुर को ढूंढने निकले थे, उन्होंने दोनों पति-पत्नी को शांत बना दिया और वह अपने-अपने घर वापस लौट गए। दोनों पति -पत्नी ने खाना भी नहीं खाया ,रात्रि आँखों में ही कट गई। हर आहट पर लगता ,शायद अब आ गया। रामप्यारी बौराई सी ,बाहर की तरफ भागती ,चतुर !क्या तू आ गया ?कोई जबाब न मिलने पर वापिस आ जाती।
रामप्यारी की इन हरकतों से श्रीधर जी सोच रहे थे , कहीं इसकी तबीयत ना बिगड़ जाए, तब वह बोले -खाना खा ले !सुबह तक आ ही जाएगा, क्यों इतना परेशान हो रही है ? थोड़ा लापरवाही से बोले।
मेरा बालक भूखा - प्यासा न जाने कहां भटक रहा है ? कह कर उठी और थाली में भोजन ले आई और श्रीधर जी के सामने रख दी।
थाली को अपने सामने देखकर,वो बोले -मेरे लिए क्यों लाई है ? मैंने तो तुझे भोजन करने के लिए कहा है ,मुझे भूख नहीं ,तुम खा लो !
मेरे गले से एक भी निवाला नहीं उतरेगा।
श्रीधर जी ने थाली उठाई और माथे से लगा, उसे पास रखे बक्से पर रख दिया।
रामप्यारी समझ गई, कि भले ही उसे कितना भी नाराज क्यों ना हों ? किंतु अपने बालक के बगैर भोजन नहीं करेंगे ,भूख भी किसे लगी थी ? अपने कलेजे का टुकड़ा घर से बाहर है, भूख कैसे लग सकती है ? रामप्यारी ने थाली उठाकर वापस रसोई में रख दी। उसे लग रहा था ,जैसे उसे अब कोई कार्य करने को ही नहीं रह गया है। आगे चतुर की ज़िंदगी के क्या होता है ?जानने के लिए मुझे फॉलो कीजिये। धन्यवाद !
