Rashiya [part 18]

चतुर, बाबा जी के साथ एक चबूतरे पर बैठ जाता है और उनसे पूछता है ?क्या कभी ऐसा कुछ हुआ था ,क्या कभी यहां भेड़िया आया था ?

हां ,एक बार तो तुम्हारे ही घेर [जहाँ घर के ,सभी मर्द रहते थे ]में आया था।

अच्छा, फिर क्या हुआ था ? वह तेरे चचेरे भाई को ले जाता किंतु उससे कुछ देर पहले ही ,उसकी दादी उसे उठाकर ले जाती है ,वरना आज वो नहीं होता।

गहरी स्वांस लेते हुए चतुर ने पूछा -और कोई किस्सा हुआ था ,क्या ?

हां शुरू में बहुत आते थे ,किंतु उसके बाद लोगों ने ,गांव में पहरा देना आरंभ कर दिया और जैसे ही भेड़िया आता ,गांव में शोर मच जाता था। तब भी कई बच्चों को तो उठा कर ले गया था।

क्या फिर वह बच्चे उन्हें नहीं मिले ?


गांव वाले गए थे ,उन्हें ढूंढने, किंतु उनकी लाश या उनके खाए बचे हुए टुकड़े ही मिले। बच्चों के लिए बहुत खतरा बन जाता है अब तू यह सब क्यों पूछ रहा है ?

वह......  पिताजी कह  रहे थे ,अपना सर खुजलाते हुए बोला -क्या  भेड़िए अभी भी आ जाते हैं ?

हां, गांव में अब कोई दिक्कत नहीं है, अपने दांतों को किसी लकड़ी से कुरेदते हुए बाबा बोले।

अच्छा बाबा ,मैं चलता हूं ,कहते हुए चतुर उठ खड़ा हुआ।

थोड़ी देर ,और रुक तो सही ,क्या अपने काम के लिए ही आया था।

नहीं ,ऐसा तो कुछ भी नहीं है ,आप जहाँ जा रहे थे ,चले जाइये ,कहकर उनकी बात सुने बगैर वह वहां से निकल गया।

आजकल के बच्चे भी न........  किसी को भी पास बैठने का समय ही नहीं है ,भागते रहते हैं। बात आई गई हो गई।

जब चतुर अपने घर पहुंचा तो रामप्यारी कहने लगी -न जाने कहां घूमता रहता है ? तेरे पिता आए थे -'पूछ रहे थे ,कहां गया है ? यही एक दोस्त से मिलने गया था।बड़ी जोरो की भूख लगी है ,लाओ !खाने में क्या बनाया है ?अपने हाथ -पैर धोकर ,खाने के लिए बैठ गया। भोजन करके अपने कमरे में जाता है। कुछ देर टहलता रहा। मन नहीं लगा ,तो बाहर आ गया। गली में ही खड़ा राजू दिख गया।  अरे !राजू तू क्या कर रहा है ?

कुछ नहीं ,इम्तिहान तो हो गए ,बोर हो रहा हूँ। तू बता !तेरी कैसी कट रही है ?

अपना भी यही हाल है ,जब परीक्षा थी तो सोचता था -परीक्षा के पश्चात ,खूब खेलूंगा किन्तु अब कोई मामा के गया कोई किसी और रिश्तेदारी में गया। गर्मी के कारण कोई बाहर निकलता नहीं। मस्ती करने का यही तो समय है ,स्कूल खुल गए ,फिर वही पढ़ाई की मारा -मारी।

तू सही कह रहा है। आ चल !खेलते हैं ,यार समय काटे नहीं कट रहा। दो-चार दोस्तों को बुला ला।

घरों में सभी अलसाए हुए थे ,दोपहर का समय था, गर्मी तेज थी , घर वालों ने भी कहा था -अपने घर पर आराम करो ! किंतु बच्चे दिन में कहां आराम करते हैं ?उनका घर में कहां मन लगता है ? उन्होंने खेलने के लिए एक ऐसा स्थान चुना, जहां पर, कुछ पेड़ थे ,जहां पर सभी बच्चे मिलकर खेल सकते थे। धूप और गर्मी दोनों ही थी ,घर के बड़े तो सुस्ता रहे थे। पेड़ों के नीचे थोड़ी हवा चल रही थी ,उसी में वह खेल रहे थे। वहीं  मटके में पानी रखा था उससे अपनी प्यास बुझा लेते। यार !अब बहुत ज्यादा समय हो गया , घर वाले नाराज होंगे अब हमें घर चलना चाहिए राजू ने चतुर से कहा। 

घर वाले तो सो रहे होंगे , चलो !हम भी यहीं  चौपाल पर बैठ लेते हैं। सभी बच्चे वहां पड़ी चारपाईयों पर लेट जाते हैं। 

तभी दीपक कहता है, अरे यार देख ! कोई जानवर इधर आता दिख रहा है। यह कौन हो सकता है ? सभी उठकर उसे देखने लगे। यह तो कुछ कुत्ते जैसा लग रहा है ?

मुझे तो यह भेड़िया लग रहा है , चतुर बोला। 

 क्या बात कह रहा है ? मैंने तो कभी भेड़िए का नाम इस गांव में सुना ही नहीं। 

मैंने तो सुना है ,कल ही ,एक बाबा से पूछा था, उन्होंने बताया था कि भेड़िए अब इधर नहीं आते, किंतु ये  भेड़िया ही हैं। सभी अपने-अपनी चारपाई से उठकर भागने का उपक्रम  करने लगे। तब तक वह  भेड़िया नजदीक आ चुका था। चिराग को कुछ सूझा ही नहीं, और वह इतना डर गया था ,एक छोटी दीवार पर चढ़ गया उस पर चढ़कर वह दूसरी तरफ जाना चाहता था किंतु उसका पैर घबराहट में, उस दीवार में एक ईंट निकली हुई थी, पहले तो उससे टकराया और जैसे ही वह दूसरी तरफ कूदनेवाला था। वहां लटकी  एक रस्सी में उलझ गया।जो कद्दू की बेल को चढ़ाने के लिए ,बाँधी गयी थी। जिसके कारण उसका हाथ बड़ी जोर से जमीन पर लगा और हड्डी चटकने की जैसे आवाज आई और बड़ी जोर से चीख़ पड़ा। उसकी चीख़  सुनकर जो दोस्त भाग रहे थे। वे उधर ही दौड़ पड़े क्योंकि अब तक उनके हाथ में कोई न कोई हथियार आ गया था। जैसे -डंडा ,पत्थर ,हसिया इत्यादि और वह भेड़िया भी। किन्तु जब  भेड़िया करीब आया तो सब देखकर आश्चर्यचकित रह गए क्योंकि वह भेड़िया ही नहीं था। वह उनमें से ही एक था।

हँसते हुए ,राजू ने बताया कि सभी बच्चों को डराने के लिए , राजू और चतुर की ही योजना थी। उनके  मजाक और हंसी का परिणाम यह निकला। चिराग के हाथ की हड्डी टूट गई, और वह बड़ी जोर से रो रहा था। सभी कह रहे थे -यह सब चतुर की कारस्तानी है ,चतुर ने ही, सब किया है। अब चतुर को लग रहा था, शायद उससे मज़ाक में बहुत बड़ी गलती हो गई और वह इतना भी समझ गया। कि आज उसकी खैर नहीं, आज उसे घर में मार पड़ेगी ही पड़ेगी।  वह इस बात से इतना घबरा गया था, उसके दोस्त ,जब चिराग को पकड़कर ले जा रहे थे। तब वह पीछे रह गया। 

धीरे-धीरे गांव में शोर मच गया ,चिराग के हाथ की हड्डी टूट गई क्योंकि राजू और चतुर ने मिलकर भेड़िए का स्वांग रचकर सभी बच्चों के साथ मजाक किया था। इस बात के लिए राजू को घर में बहुत मार पड़ी थी। चिराग के घर वाले, राजू और चतुर के घर भी लड़ने पहुंच गए, किंतु चतुर कहीं भी दिखलाई नहीं दिया। श्रीधर जी को भी , चतुर पर क्रोध आया और उन्होंने कहा -कि चतुर को ढूंढ कर लाओं ! मैं उसे सजा दूंगा। उसके मित्र चतुर को खोजने चल दिए। 

रात हो गई, किंतु चतुर किसी को भी नहीं मिला , सभी अपने -अपने घर पहुंच गए। रामप्यारी ने अपने पति को समझाया -चतुर अभी बच्चा है , न जाने ,तुम्हारी मार के ड़र से कहाँ छुपा बैठा होगा ? यदि वह आये तो ,उसके साथ ज्यादा मार -पिटाई मत करना। उसकी मंसा चिराग को हानि पहुंचाने की नहीं थी ,वह तो मज़ाक कर रहा था। उसे क्या मालूम था ? दयाराम का लौंडा ,इतना डरपोक है ,कि डर के मारे दीवार ही फांद जायेगा।

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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