यानि अपनी मनमर्जियाँ !
ऐसे कौन ?जीने देता है।
अपनी इच्छा से जीना ,
या अपने लिए, जीना !
बालपन से ही ,समझौतों से ,
परिचय कराया जाता है।
भाई पर विशेष ध्यान ,
हमें तो पराया धन माना जाता है।
न चाहते हुए भी........
त्याग सिखाया जाता है।
सभी संस्कार ,परिपाटी ,
रीति -रिवाज़ ,धैर्य ,सहनशीलता
का पाठ हमें ही पढ़ाया जाता है।
'समझौता ' हमें घुट्टी में ,
घोलकर पिलाया जाता है।
उन समझौतों पर बनती है ,इमारत !
पड़ती है ,नींव !
एक घर और रिश्तों की।
समझौता किसी बाप ने किया ,
कहीं बेटी ने कोई रिश्तानिभाया ,
तो कहीं माँ को रुलाया।
कहीं सास ने ,तो कहीं बहु ने ,
कभी बहन ने तो कभी भाई ने ,
समझौते की परिपाटी को निभाया।
