Samjhaota

 यानि अपनी मनमर्जियाँ !

 ऐसे कौन ?जीने देता है। 

 अपनी इच्छा से जीना ,

 या अपने लिए, जीना !

बालपन से ही ,समझौतों से ,

 परिचय कराया जाता है।


 भाई पर विशेष ध्यान ,

हमें तो पराया धन माना जाता है। 

 न चाहते  हुए भी........ 

त्याग सिखाया जाता है। 

सभी संस्कार ,परिपाटी ,

रीति -रिवाज़ ,धैर्य ,सहनशीलता 

का पाठ हमें ही पढ़ाया जाता है। 

'समझौता ' हमें घुट्टी में ,

घोलकर पिलाया जाता है। 

उन समझौतों पर बनती है ,इमारत !

पड़ती है ,नींव !

एक घर और रिश्तों की। 

समझौता किसी बाप ने किया ,

कहीं बेटी ने कोई रिश्तानिभाया ,

तो कहीं माँ को रुलाया। 

कहीं सास ने ,तो कहीं बहु ने ,

कभी बहन ने तो कभी भाई ने ,

समझौते की परिपाटी को निभाया। 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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