उसके सिवा ,जो... सब भुला दे !
ऐसा पागलपन ,मोहब्बत जगा दे !
इश्क़ मे , रूहानी दौलत लुटा दे !
पाकीज़ा रूह से रूह को मिला दे !
देखूं जिधर भी ,उससे ही मिला दे !
प्यार में ऐसा ''पागलपन ''जगा दे !
रिश्ता चाहे ,धरती -अंबर का हो !
दिल से मेरे , दिलदार का हो !
क़लम या फिर तलवार का हो !
साहिल और पतवार का हो !
मोहब्बत हो या फिर जाम का हो !
या फिर दौलत ए हिंदुस्तान का हो !
रंगों या फिर रंगीन शाम का हो !
प्यार में पागल बना दे ,
''इश्क़ ''ऐसा जगा दे !
लोग कहें !!!!!!
इसके ' 'प्यार का पागलपन ''
अवश्य ही ,कुछ कर जायेगा।
इसका ये ''जुनून ''दूर तक ले जायेगा।
जिधर देखूं ,तू ही तू नजर आता है ,
ख़्वाबों औ ख़्यालों में समां जाता है।
मेरे' प्यार का पागलपन 'तो देखिये !
आइना देखा ,तो तेरा ही अक्श नजर आता है।
क्या ? इश्क़ में ,पागलपन की कोई हद है ,
हम तो तेरे इश्क़ में ,'जहाँ 'तक भुला बैठे हैं।

