Pyaar ka pagalpan

 उसके सिवा ,जो... सब भुला दे !

ऐसा पागलपन ,मोहब्बत जगा दे !

इश्क़ मे , रूहानी दौलत लुटा दे !

पाकीज़ा रूह से रूह को मिला दे !

देखूं जिधर भी ,उससे ही मिला दे !

प्यार में ऐसा ''पागलपन ''जगा दे !



रिश्ता चाहे ,धरती -अंबर का हो !

दिल से मेरे , दिलदार  का हो !

क़लम या फिर तलवार का हो !

साहिल और पतवार का हो !

मोहब्बत हो या फिर जाम का हो !

या फिर दौलत ए हिंदुस्तान का हो !

रंगों या फिर रंगीन शाम का हो !

प्यार में पागल बना दे ,

''इश्क़ ''ऐसा जगा दे !

लोग कहें !!!!!! 

इसके ' 'प्यार का पागलपन ''

अवश्य ही ,कुछ कर जायेगा। 

इसका ये ''जुनून ''दूर तक ले जायेगा। 



 जिधर देखूं ,तू ही तू नजर आता है ,

 ख़्वाबों औ ख़्यालों में समां जाता है। 

 मेरे' प्यार का पागलपन 'तो देखिये !

आइना देखा ,तो तेरा ही अक्श नजर आता है।


क्या ? इश्क़ में ,पागलपन की कोई हद है ,

हम तो तेरे इश्क़ में ,'जहाँ 'तक भुला बैठे हैं। 

 


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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