Kachche dhage

 कच्चे धागों से बंधी , मानव मन की डोर !

ठसक लगे ,टूट जाए ,इतनी कच्ची  डोर !

बंध जाए ,ह्रदय के धागों से,हो जाए मजबूत !

स्वार्थ, छल,दंभ करते इसकी नींव कमजोर !



रक्त के रिश्तों को ,आज झुठला रहे हैं ,

जब जुड़ी, प्रियतमा संग, नव प्रेम की डोर !

इक डोर से बंधे , दूजी डोर छूट जाएं ,

आज जमाने की झूठी, कच्ची है ,यह डोर !


कहते ,रिश्ते खून के टूटे नहीं ,कैसे भी यार!

रिश्ते अब कुम्भला रहे ,ये कैसी चली बयार?

दूर से ही ,सब भले , मन का ओर न छोर ,

चुभन लिए बैठे ,कंटक से गुथी ये कैसी डोर !


 गैर के ,रिश्तों को देख हर्षाते ! बहुत 

 मन से कैसे गहरे जुड़े ? नाजुक सी ये डोर !

बेपरवाह मन से जुड़ी ,मतलब की यह डोर !

हो मन उदास सोचता !रिश्तों की ये कैसी ?''कच्ची डोर !''

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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