'भाव ''कुछ ऐसे, जो कहे न जाए, किसी से।
एक मां ,एक औरत !लड़ी है ,न जाने कितनों से ?
लड़ती रही, कभी अपनों से ,तो कभी अपने आप से।
अरमानों की डोली में बैठ ,बहते जज्बातों से,
मां! कितना गहरा शब्द ?विस्तृत भी, भरा भावों से।
उम्मीदों के दीए जलाए ,समझौता किया सपनों से।
कभी सोती ,कभी जागती, सजा जीवन सपनों से।
'भावों 'को लिए बंटती रही ,टूटती रही ,टुकड़ों में ,
हृदय का विश्वास बढ़ा, मुस्कुरा उठी ,मां के सम्मान में।
वंशावली आगे बढ़ी ,बढ़ता गया ,मान उसका ,
तन के हिस्से हुए ?बनी जब ,सात बच्चों की माँ के ,
नारी होकर भी ,पुत्र की चाहत में किये समझौते,जीवन से।
मस्तक, दमक उठा, तीन पुत्रों की मां !उन्नत उसका ,भाल हुआ।
नेत्रों में , छवि देख उनकी ,भूला बैठी, दर्द ओ गम, जिंदगी के,
सोचती ,सभी अंग मेरे तन के, कैसे भुला दूं ?जब सींचा लहू से।
मां,बाँटती ,बेटी में संस्कार ! कैसे रहेगी ?बिन मेरे ,
सोच, विह्वल हो उठी ,उमड़ आते ,कुछ अश्रु नयन से।
बेटियां भी आएंगीं, खिल उठेगा ,अंगना मेरा ,महकेगी बगिया।
छोटी सी जिंदगी में, न जाने कितने भाव जिए,कितने रूप बदले पल -पल में ?
कभी जी उठती ,कभी बँट जाती ,कभी मुरझा कर सहम जाती।
नयन मूंद मुस्काती, सुनती पायल जो बजती, उसके अंगना में छन से,
आज बैठी ,निहारती ,नितांत अकेली ,उन सूनी अंखियन से।
