Tadap [part 98]

यह जिंदगी है ,कुछ रिश्ते मिलते हैं, दुख -दर्द भी देते हैं, तो कुछ सीखा भी जाते हैं , जैसे आज ऐश्वर्या जिंदगी में बहुत कुछ सीख रही है, रिश्तों  को समझ रही है। सकारात्मक दृष्टि से देखा जाए तो....... चंदा देवी के व्यवहार ने ,ऐश्वर्या को सतर्क रहना , अपने अधिकार के लिए सचेत होना और बहुत सी चीज ऐसी सिखा दी हैं, जिन पर कभी उसने ध्यान ही नहीं दिया था। या  यूं कह सकते हैं ? कि उसे जिंदगी जीना सिखा दिया है , किंतु एक प्रश्न ऐश्वर्या के मन में यह भी उठना है कि क्या जिंदगी को जीना सीखने के लिए दर्द आवश्यक है ? दुख मिलना जरूरी है। प्यार से भी तो इंसान सीख सकता है ,लेकिन जो चीज हमें आसानी से उपलब्ध हो जाती है ,हम उसका महत्व नहीं समझते हैं। दर्द को हम हृदय तक, महसूस करते हैं और उससे ,जब हमें जो भी उपलब्ध होता है, उसको दिल से लगा भी लेते हैं। अनेक परेशानियां, समस्याएं दोनों पति-पत्नी के सामने आ रही थी किंतु यह भी कह सकते हैं -प्रवीण में धैर्य ज्यादा था, या वह अपने रिश्तों के प्रति कोई भी विरोधी व्यवहार नहीं करना चाहता था। वह समझता था, परिवार से जुड़े रहना चाहता था इसीलिए गलतियों को भी नजरअंदाज कर देता था। ऐश्वर्या उससे कहती रह जाती थी। 


रिश्ते परिवार में यूं ही नहीं बने रहते ,यदि हर इंसान अपने अधिकार के लिए खड़ा रहे, अपने मान-सम्मान के लिए ज़िद पर अड़ा रहे, तो शायद रिश्ते ही ना रहें।  ये परिवार तभी तक जुड़े हुए दिखाई देते हैं ,जब कहीं न कहीं एक व्यक्ति ,उस परिवार के लिए त्याग कर रहा होता है। उसकी एक सकारात्मक सोच होती है, वह उस घर की छत बन जाना चाहता है वरना सभी दीवारें अलग-अलग ही खड़ी होती हैं,रक्त के रिश्तों की तरह जुडी अवश्य होती हैं।  इसी प्रकार, चंदा देवी के दो पुत्र हैं , उनमें चंदा देवी छोटे से अधिक प्रेम करती है, यह उनका मन ही जानता है कि इतना भेदभाव वे क्यों करती हैं ? इसीलिए छोटे की बहु भी  प्रिय है। ऐश्वर्या को समझ नहीं आता कि , उसने उनके साथ ऐसा क्या किया ?कि जो उसके साथ, वह ऐसा सौतेला व्यवहार करती हैं। उनके घर में पहला पोता हुआ है , वे स्वयं भी,अपनी सहेलियों के समूह के संग घूमने चली गयीं , जबकि उन्हें बहु पर ध्यान देना चाहिए था, वहां उनकी आवश्यकता थी। बड़े बुजुर्ग अपने अनुभवों को, अपने बच्चों से बांट लेते हैं किंतु ऐश्वर्या से, कोई भी ऐसा अनुभव उन्होंने साझा नहीं किया।

जब परिवार के एक बेटे का विवाह होता है ,और घर में बहु आती है, तब उससे उम्मीदें लगाई जाती हैं कि वो उस परिवार को और उस परिवार के लोगों को अपना समझे। इस घर का वंश चला ,घर में खुशहाली लाये। घर के बड़ों को सम्मान दे ,बुजुर्गों की सेवा करे ,बड़ों का कहना माने। क्या कभी किसी ने सोचा है ? बदले में उस परिवार से,उसे  क्या मिलता है ? परायापन ,उसे और उसके परिवार को ताने ,वो घर की बहु है ,नौकर नहीं ,उसमें में भी उसकी इच्छा हो या नहीं कार्य करना ही है। जब उस घर -परिवार का वारिश उन्हें देती है ,ऐसे में उसके उस कमजोर तन को उनके सहारे और प्रेम की आवश्यकता होती है। तब वो औरत ,जो आज उस घर की जेठानी ,देवरानी या फिर सास के रूप में वहां है ,वो भी उसका दर्द न ही समझती है ,न ही बांटती है। दुनिया के सामने ,दिखला देती हैं ,कि ''हम साथ -साथ हैं। '' ऐसे समय में ऐश्वर्या भी बिस्तर पर है करुणा को बुलाया नहीं ,स्वयं भी चलीं गयीं। ये किस जन्म की दुश्मनी है ?ऐश्वर्या सोचती रहती। 

 मां के चले जाने पर प्रवीण ने स्वयं अपने हाथों से सभी कार्य किये ,अभी करुणा भी नहीं आई थी। ऐसे समय ही होते हैं जब व्यक्ति को अपने और पराए लोगों का एहसास होता है, कि कौन हमारे साथ खड़ा है और कौन नहीं ? वह भी अनुभव कर रहे थे। ऐश्वर्या ने एक दो बार प्रवीण से कहा भी था, तुम अकेले ही सब संभाल रहे हो। 

तब प्रवीण ने जवाब दिया था -कोई बात नहीं, कुछ दिनों की ही तो बात है, मम्मी घूम कर आ जाएगीं,तब सब संभाल लेंगी।  किंतु हम जैसा सोचते हैं, ऐसा होता नहीं है हम जितना रिश्तों  को निभाना चाहते हैं , क्या वह रिश्ते निभ पाते हैं ?हम निभाना चाहते हैं तो क्या दूसरा भी निभाना चाहता है। ताली तो दोनों ही हाथों से बजती है। कुछ दिन बाद चंदा देवी आ गई और अब प्रवीण ने सोचा- वह स्वयं सब संभाल लेंगीं। 

 उसे अभी भी अपनी मां पर विश्वास था किंतु ऐसा कुछ भी नहीं हुआ,चंदा देवी आते ही बोलीं -मुझे घर के अन्य कार्य भी रहते हैं, कम से कम अपने परिवार और अपने बच्चों की  स्वयं देखभाल करें।

 प्रवीण शांत रहा और बोला-मम्मी क्या आप जानती हैं ?मैंने एक व्यापार करने का सोचा है, और मेरा एक मित्र है, जिसके साथ मिलकर मैं एक कारोबार की शुरुआत करना चाहता हूं। 

तब......  मैं क्या कर सकती हूं ?

आपको करना कुछ भी नहीं है, सिर्फ आपको मुझे कुछ पैसे देने होंगे , क्योंकि वह भी पैसा लगा रहा है, मुझे भी तो लगाना होगा। 

मेरे पास कोई पैसा नहीं है , स्पष्ट शब्दों में बोलीं। 

मैंने आपको कुछ पैसे दिए तो थे, प्रवीण सहजता से बोला। 

दिए थे, तो क्या, मुझ पर एहसान किया था ?तेरा  और तेरे परिवार का खर्चा नहीं हुआ है , यह जो तूने दो औलादें  पैदा करके रख दी हैं। उनका खर्च नहीं हुआ ,डॉक्टर का खर्चा नहीं हुआ। तब भी बहुत कुछ बच जाता है, वह कागज पर हिसाब लगाकर लाता है और बताता है कि अभी आपके पास इतना पैसा होना चाहिए उस कागज को देखते ही, उसे बिना पढ़े ही फाड़ देती हैं , अब तू  मुझसे  हिसाब लेगा प्रवीण के ''पैरों तले जमीन खिसक गई''। मैं व्यापार के लिए पैसा कहां से लाऊंगा ? शायद ऐश्वर्या ठीक कह रही थी - मुझे पैसा नहीं देना चाहिए था। किंतु घर में क्लेश न हो इसलिए मैंने वह पैसा उन्हें  दिया था आज मेरे पास पैसा भी नहीं रहा, और क्लेश भी समाप्त नहीं हुआ। वह ठगा  सा रह गया। उसे कुछ भी नहीं सूझ रहा था, वह कैसे ऐश्वर्या की नजरों का सामना करेगा ? उसके कितना कहने पर भी उसने, घर को बनाए रखने के लिए, कितने समझौते किए ? किंतु परिणाम कुछ भी, सामने नहीं आया। अपने आप से ही प्रश्न करता है -क्या मैं गलत था ? मुझे अपनी मां और अपने भाई पर विश्वास नहीं करना चाहिए था। सोचते हुए ,उसकी आंखों में आंसू आ गए, इतने अपने होकर भी ,यह रिश्ते कितना दर्द दे जाते हैं  ? तब प्रवीण ने सोचा-किसी से उधार मांग लूंगा।

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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