Tadap [part 97]

ऐश्वर्या को इतना तो, समझ में आ ही गया ,कि ये हमारे साथ कभी नहीं थीं ,न ही होंगी।  किन्तु उसने यह नहीं सोचा था -कि  आते ही करुणा के तेवर भी बदल जायेंगे। तब उसने सोचा -इसीलिए मुझसे कहती थीं ,'उसे आने दे ,तुझे तो मैं बताऊंगी।''यानि कि दोनों एक हो गयीं थीं।  इन्होने इस तरह की कोई चाल पहले से सोचकर रखी हुई थी । जिस ऐश्वर्या ने कभी भी, घर की बातों में ध्यान नहीं दिया था। बस ,अपने को और प्रवीण को आत्मनिर्भर देखना चाहती थी। उसे पता ही नहीं था, कि परिवार में इस तरह की भी कोई 'राजनीति' होती है।अभी तक तो वो चंदा देवी और उनके स्वभाव से ही जूझ रही थी किन्तु अब घर में नया खेल कहूं या व्यूह रचा जा रहा था। 


''  बरसाती अमावस्या '' आ रही थी। उसके लिए उन्हें गांव में जाना होता था, जहां वह विवाह के पश्चात ,एक रात्रि रही थी। वहां परिवार की सभी विवाहित महिलाएं मिलकर ''वटवृक्ष ''की पूजा करती थीं। ऐश्वर्या को भी ले जाया गया , हालांकि चंदा देवी ने, इस बात को नकारने का बहुत प्रयास किया था कि यह गांव में पूजन के लिए न जाए और बहाना  भी बनाया -'' अभी गर्मी बहुत है , वैसे भी यह गर्भवती है , इसकी तबीयत ठीक नहीं रहती किंतु गांव की बड़ी -बूढ़ियों ने , कहा - उसे गाड़ी में लेकर ही तो आएगी, कुछ देर के लिए ही लेकर आ जाना किंतु पूजन के लिए अवश्य लेकर आना। ऐश्वर्या, वहां चली तो गई, धीरे-धीरे महिलाओं में बातें होने लगीं और उसे इस बात का आभास होने लगा , कि चंदा देवी की प्रकृति ही ऐसी है। बातों ही बातों में ,कुछ उन्होंने हंसी -मजाक में भी बहुत सारी चीजें बता दीं। जैसे कि अपने से बड़ी 'जेठानियों को आपस में लड़वाना', 'इधर की बात उधर कर देना', 'उनमें झगड़ा करवा देना 'और एक की भली बनकर रहना, जब तक वह गांव में रही तब तक उन्होंने उनकी बहुत बातें आपस में साझा की। ऐसा नहीं कि वो ऐश्वर्या को बता रही थीं या उसे सुना रहीं थीं। जैसे किसी के किस्से स्मरण हो जायें और बातों ही बातों में बात निकली ,तो बहुत सी बातें ऐश्वर्या ने भी सुनी और समझी भी......  

गांव में इससे पहले भी ,ऐश्वर्या कई बार आ चुकी है किंतु उसने कभी इन बातों पर विशेष तौर पर ध्यान नहीं दिया था। उसे जरूरत ही, महसूस नहीं होती है ,उसे लगता था -गांव की बड़ी- बूढ़ि  हैं, आपस में बातें करती रहती हैं किन्तु चंदा देवी के विषय में कुछ नहीं कहती थीं। ऐश्वर्या को भी लगता ,अभी मुझसे बड़ी मेरी सास चंदा देवी सब संभाल लेंगी  किंतु जब उनके कारण परेशान हुई ,तब उसे एहसास हुआ कि मुझे भी समझना चाहिए, इनकी बातों का सार क्या है? हालांकि चंदा देवी पहले से ही काफी सतर्क रहती थीं  वह गांव की किसी भी महिला से उसे बात नहीं करने देती थीं ।

 वह कहते हैं न..... ''जाकै  पर ना फटे बिवाई , वह क्या जाने पीर पराई '' 

किंतु उस दिन, उन्हें गांव की किसी नई बहू को देखने जाना पड़ गया। तब ऐश्वर्या ने , परिवार की महिलाओं की बातें सुनी। उनकी सभी बातें सुनकर ,ऐश्वर्या ने इतना अंदाजा तो लगा ही लिया ''कि अंग्रेज चले गए, और चंदा देवी को यही छोड़ गए '' फूट डालो, शासन करो। '' उसे आश्चर्य होता, पांचवीं -छठी पास महिला कितना तेज दिमाग ले रही है ? यदि इन्होने कोई बड़ी  डिग्री ली होती , तो शायद अपनी राजनीति से'' माननीय मनमोहन सिंह ''को तो हरा ही सकती थीं। हो सकता है ,अपनी कोई नई पार्टी बना लेतीं। किन्तु ''शातिर दिमाग़ ''होने के लिए ,किसी डिग्री की आवश्यकता नहीं होती। ''

करुणा को उन्हें बुलाना नहीं था तो उन्होंने बुलाया नहीं। ऐश्वर्या का आठवां महीना चल गया था , उसने मन ही मन अपने आपको समझा लिया था ,जब करुणा  यहां नहीं तब क्या बड़ी बेटी नहीं हुई ? तो यह बच्चा भी हो जाएगा ,यही सोच कर ऐश्वर्या ने संतोष कर लिया था किंतु बीच-बीच में कभी-कभी प्रवीण को भी इस बात का एहसास कर देती ,'कि मैं गलत नहीं थी।' 

आठवां महीना पूर्ण होने को हुआ, तब चंदा देवी ने अचानक करुणा को बुलवा लिया, बिना किसी कारण के तो यह इस तरह नहीं बुलाएंगीं  इसका भी अवश्य ही कोई कारण होगा।  अब ऐश्वर्या को उनके किसी भी बात पर विश्वास नहीं रहा था। उसने उनके साथ रहकर बहुत कुछ जिंदगी में देखा और सीखा भी , किंतु उसका यह भ्रम जल्दी ही समाप्त हो गया क्योंकि जब उसे पता चला, कल को यदि बच्चा हो जाता है और मेहमान आते हैं ,तो पूछेंगे - छोटी बहू कहां है ? और बड़ी बहू ऐसे समय में, भी कार्य कर रही है। पहले ही योजना तैयार हो चुकी थी। बच्चे के आने में अभी भी समय था, किंतु एक दिन तो हद ही हो गई जब प्रवीण ने, करुणा के दहेज़ में लाये सोफे को , मेहमानों के कमरे में रख दिया। अचानक चंदा देवी को बहुत क्रोध आया और बोली -तूने किससे  पूछ कर यह यहाँ रखा ? 

इसमें पूछना क्या था -मेहमान आएंगे तो, उसकी आवश्यकता होगी , इसलिए मैंने यह यहां रख दिया कहते हुए प्रवीण उस पर बैठ गया तभी चंदा देवी बोलीं  -उठ खड़ा हो जा यहां से, यह छोटे का सोफा है उसकी बहू लाई है, उसके कमरे में ही रहेगा। प्रवीण लज्जित होकर ,उस सोफे से उठकर, अपने कमरे में चला गया। आज तो उसने स्वयं ऐश्वर्या से कहा- मैं जानता था, मम्मी को क्रोध आता है ,किसी भी बात की जिद कर लेती हैं, या किसी भी बात पर अड़ जाती हैं किंतु मुझे इतना एहसास नहीं हुआ कि  नई बहू के सामने भी मेरा इतना अपमान करेंगीं। ऐश्वर्या ने मन ही मन सोचा-'' तुम्हें आज अपने अपमान का एहसास हो रहा है मेरा तो यहां प्रतिपल अपमान में ही बीता है। ''

अबकी बार प्रवीण एक बेटे का बाप बन गया था। वह अत्यंत प्रसन्न था , वह खूब खुशियां मनाना चाहता था इसलिए मम्मी से बोला -सभी मेहमानों को बुला लीजिएगा अच्छी दावत करेंगे। पहले तो चंदा देवी चुप हो गई और बोली- अभी तो कुछ महीने पहले छोटे के  विवाह में खर्च हुआ है , डॉक्टर का इतना खर्चा , तुझे कमाई की नहीं सूझती, हमेशा खर्चे की बात सोचता है। प्रवीण अपना सा मुंह लेकर रह गया। उसमें इतना भी साहस नहीं था ,जो अपनी मम्मी से यह कह सके कि मैंने जो भी पैसे आपको दिए हैं , अभी बचे हैं उनमें से, यह खर्च हो सकता है। न जाने, क्या बहाना सोचकर लड़के का 'जसुटन '' करवाया। मेहमान आए भी और चले भी गए किंतु चंदा देवी के हाथ में , कुछ लिफाफे थे। अब ऐश्वर्या समझ गई कि इन्होंने क्या सोचा होगा ?

अभी ऐश्वर्या बिस्तर में ही थी, मेहमानों के सामने दिखला भी दिया कि उन पर काम का कितना भार है ?तभी चंदा देवी एक दिन अचानक बोलीं  -मैं घूमने जा रही हूं। 

उनकी बात सुनकर प्रवीण ने पूछा -ऐसे समय में [ जब ऐश्वर्या बिस्तर में है ] और साथ में दो छोटे बच्चे !आप कहां जा रही हैं ? कुछ समय के लिए तो रुक जाइए !

मुझे नहीं रुकना है, तुम बच्चे जनते रहोगे और मैं तुम्हारी बहुओं  की सेवा करती रहूंगी मुझे यही काम रह गया है ,उन्हें नहीं रुकना था तो नहीं रुकी। 

प्रवीण स्वयं, बच्चों के खाने- पिलाने का ख्याल रखता , छोटे की नैपी बदलता, और उनके कपड़े धोता। ऐसे समय में अचानक किसी ने उसके साथ  मिलकर व्यापार करने की बात की , उसकी दिलचस्पी उस व्यापार में जागी किंतु अब उसे दोेहरी मेहनत हो गई थी। घर के कार्य भी और व्यापार के लिए भी, वह बाहर  चला जाता ऐसे समय में ऐश्वर्या, परेशान होकर रह जाती। उसका मन ही जानता है कि वह कितनी तड़पती थी ?

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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