आज पूजा की आंखों में आंसू थे , न जाने क्यों ?चंपक ! कई दिनों से ,उससे मिलने नहीं आया है और न ही उससे फोन पर बात कर रहा है। उसकी मम्मी के तेवर देखते हुए तो लगता है, वह शायद हमारे, रिश्ते को स्वीकार नहीं करेंगी। इस विषय में उसने पहले कभी सोचा भी नहीं था। उसे लगता था-'' मेरे साथ चंपक है तो मुझे कुछ नहीं चाहिए ,'' मेरे पास सबकुछ हैं, किंतु ऐसा कुछ भी नहीं है। अब तो कई दिनों से चंपक भी दिखलाई नहीं दे रहा। न जाने कहां चला गया ? जब मुझे उसे ख़ुशख़बरी सुनानी थी,तब वह क्यों नहीं आ रहा है ? वह नहीं जानती थी ,जिसे वह ख़ुशख़बरी समझ रही है ,वही उसके लिए' जी का जंजाल बन' जाएगी या जीवन में ,बहुत बड़ा परिवर्तन ले आएगी। अनेक प्रश्नों से जूझती हुई वह चंपक के कॉलेज में उससे मिलने के लिए चल दी। अब तकअपने विषय में कुछ सोचा ही नहीं था किंतु अब सोच रही थी। पढ़ाई में भी मन नहीं लग रहा था, अब वह सोच रही थी, कि चंपक मिल जाए तो उससे जीवन में आगे कैसे बढ़ना है ? बात करेगी।
सबसे पहले तो ,जब वो सुनेगा ,कि मैं ....... कितना प्रसन्न हो जायेगा ?अपने पेट की तरफ देखते हुए सोचकर मुस्कुरा देती है। जब वह चंपक के कॉलेज में पहुँच जाती है, उसे ढूंढती है , कई छात्रों भी से पूछा - कोई कहता -चंपक बहुत दिनों से नहीं आया है, तो कोई कहता -आया था, हमने देखा भी था ,यहीं -कहीं होगा। हताश -निराश पूजा, उसे कॉलेज में ढूंढती फिर रही थी। आज उसे एहसास हो रहा था ,उससे कितनी बड़ी गलती हो गई है ? उसने चंपक से पहले ही क्यों बात नहीं कर ली ?क्यों , इस बात को लेकर वह टालती रही ? उसने महसूस ही नहीं किया, उसने सोचा था -जब तक चंपक मेरे साथ है सब कुछ सही और अच्छा ही होगा। कॉलेज की पढ़ाई पूर्ण होने के पश्चात मैं उससे स्वयं ही बात कर लूंगी।
सोचा तो बहुत कुछ था ,जब मेरी शिक्षा पूर्ण हो जाएगी ,तब हम दोनों मिलकर मेरे घर जायेंगे और मैं अपने घरवालों से कह दूंगी -मैं चंपक से प्यार करती हूँ ,और अब इसी से शादी भी करना चाहती हूँ , लेकिन अब इतना समय ही नहीं है , मुझे शीघ्र ही उससे मिलना होगा। उसे ढूंढते -ढूंढते थक गई और एक स्थान पर बैठकर सोचने लगी -ऐसी हालत में यदि मैं ,अपने घर गयी ,और मेरी हालत न बताने पर भी उन्हें पता चल गयी ,तब वो लोग पूछेंगे कौन है ? वो !तो मैं क्या जबाब दूंगी ?यही पूछेंगे ,तुझे हमने क्या ये सब करने के लिए भेजा था ? पापा तो अपनी बंदूक उठा लेंगे,हाय ! मैंने कितना गलत कर दिया ? ऐसी हालत में निराशा और परेशान होकर व्यक्ति, तब अपने विषय में सोचता है -कि हम कहां गलत थे और कहां सही थे ? इतनी समझदार होने के पश्चात भी, न जाने उसने यह गलती कैसे कर दी ? रह -रहकर उसका दर्द आंखों से बहने लगा किंतु कोई देख न ले तुरंत ही, उन अश्रुओं को पोंछ लेती।
तभी उसे दूर से कहीं परछाई सी दिखाई दी, जैसे वह चंपक ही है , इस मौके को बिना समय गंवाए वह तुरंत ही उस और दौड़ चली और उसने पीछे से आवाज लगाई -चंपक ! चंपक ! तुरंत ही तेजी के साथ उसने, पीछे से उसे रोकने के लिए ,उसके कंधे पर हाथ रखा। उस लड़के ने पीछे घूम कर देखा, किंतु वह चंपक नहीं था।
सॉरी ! कह कर वह पीछे हट गई , न जाने वह क्यों ?मुझसे आंख-मिचौली खेल रहा है ?
उस लड़के ने पूछा -आप'' चंपक ठाकुर'' को ढूंढ रही हैं।
पूजा को एक उम्मीद जगी और तुरंत ही बोली - हां !
कुछ देर के लिए आप मुझे ही चंपक समझ लीजिए, उससे आपका क्या रिश्ता है ? वह हंसने लगा। निराश होकर पूजा वहां से, हट गई। कैसे लोग हैं ? किसी के दर्द पर, हंसते हैं और जख्म देते हैं। कॉलेज में भटकते हुए उसे एक-दो घंटे हो गए थे। वह वापस जाने ही वाली थी, तभी उसे चंपक दिखलाई दिया। जो हंसते -मुस्कुराते हुए ,अपने दोस्तों के साथ आ रहा था। उसके साथ उसके दोस्तों को देखकर वह थोड़ा ठिठक गई, उसके करीब जाऊं या नहीं सोचने लगी। तुरंत ही उसके मन में विचार आया , यदि आज नहीं मिल पाई तो शायद कभी नहीं मिल पाऊंगी, इस विचार ने उसे आगे बढ़ने की हिम्मत दी और वह चंपक के सामने जाकर खड़ी हो गई। चंपक ने पहले उसे देखा और फिर अपने दोस्तों को देखा और धीरे से बोला - तुम यहां !!!!
तुम तो आए ही नहीं , तो मुझे ही आना पड़ गया।